यूक्रेन ने रूस पर चेर्नोबिल परमाणु प्लांट पर हमले का आरोप लगाया है. इस दावे के बाद एक बार फिर से पूरी दुनिया सहम गई है. क्योंकि चेर्नोबिल से एक ऐसा हादसे का इतिहास जुड़ा है, जिसके बारे में सोचकर भी डर लगता है. ऐसे में जेलेंस्की के इन दावों के बीच पूरे विश्व को ये डर सताने लगा है कि कहीं फिर से वो इतिहास न दोहराया जाए, जो आज से 39 साल पहले चेर्नोबिल परमाणु प्लांट में हुआ था.
चेर्नोबिल दुर्घटना इतिहास की सबसे भीषण परमाणु आपदा मानी जाती है. 26 अप्रैल, 1986 की सुबह चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा स्टेशन में विस्फोट हुआ था. इसके बाद इसके काफी भयावह परिणाम सामने आए थे. चेर्नोबिल, यूक्रेन और बेलारूस के बीच सीमा के करीब है. चलिए जानते हैं क्या है इसका इतिहास.
इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना
26 अप्रैल, 1986 को चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा स्टेशन में एक सुरक्षा परीक्षण किया गया था. इसे इतना सामान्य माना गया कि प्लांट के निदेशक ने वहां आने की भी जहमत नहीं उठाई. यह टेस्ट जल्द ही नियंत्रण से बाहर हो गया, क्योंकि अप्रत्याशित बिजली बनने और भाप के निर्माण के कारण कई विस्फोट हुए, जिससे परमाणु रिएक्टर फट गया. ये इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना मानी जाती है.
सालों तक फैलता रहा था रेडिएशन
इतिहास की सबसे खराब परमाणु दुर्घटना मानी जाने वाली चेर्नोबिल आपदा में 31 लोगों की तुरंत मौत हो गई थी. इसमें 28 कर्मचारी और अग्निशामक शामिल थे, जो सफाई के दौरान तीव्र रेडिएशन से मारे गए थे. विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के कारण कैंसर से हजारों लोगों की असमय मृत्यु हुई. सालों तक इसका रेडिएशन फैलता रहा.
1977 में चर्नोबिल परमाणु रिएक्टर की रखी गई थी नींव
26 सितम्बर 1977 को यूक्रेन (तत्कालीन सोवियत संघ का हिस्सा) के कीव से लगभग 65 मील उत्तर में स्थित चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा स्टेशन ने ग्रिड को बिजली की आपूर्ति शुरू की गई. इस समय तक, चेर्नोबिल साइट में चार 1,000 मेगावाट के रिएक्टर बन चुके थे. साथ ही दो अतिरिक्त रिएक्टर निर्माणाधीन थे.
एक सुरक्षा टेस्ट के दौरान हुआ था हादसा
25 अप्रैल 1986 को चेर्नोबिल के संचालकों ने वहां के सुरक्षा परीक्षण की तैयारी के लिए रिएक्टर नंबर 4 में बिजली कम करना शुरू कर दिया. इसे उन्होंने रखरखाव के लिए नियमित शटडाउन के साथ मेल खाने के लिए समयबद्ध किया था. परीक्षण का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि बिजली की विफलता की स्थिति में, संयंत्र की अभी भी घूम रही टर्बाइन आपातकालीन जनरेटर चालू होने से पहले कम अंतराल के दौरान कूलेंट पंपों को चालू रखने के लिए पर्याप्त बिजली का उत्पादन कर सकती है या नहीं.
कम अनुभवी कर्मचारियों को किया गया था तैनात
विडंबना यह है कि यही सुरक्षा परीक्षण रिएक्टर के विनाश का कारण बनी. इसी दिन रिएक्टर नंबर 4 की आपातकालीन कोर कूलिंग प्रणाली को टेस्ट में बाधा डालने से रोकने के लिए बंद कर दिया गया. हालांकि इससे दुर्घटना नहीं होती. लगभग उसी समय, उस क्षेत्र की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए परीक्षण और शटडाउन को अस्थायी रूप से विलंबित कर दिया गया.
शटडाउन नहीं हो सका था रिएक्टर
फिर ऑपरेटरों को परीक्षण और शटडाउन जारी रखने की अनुमति मिल गई. अब तक, कम अनुभवी नाइट शिफ्ट वाले कर्मचारी काम पर लगाए गए थे. जिन्हें कथित तौर पर टेस्ट करने के बारे में उचित निर्देश कभी नहीं मिले. 26 अप्रैल, 1986 को रिएक्टर में बिजली की आपूर्ति उस स्तर से बहुत नीचे गिर गई जिस पर रिएक्टर को स्थिर माना जाता है. ऑपरेटर प्लांट के सुरक्षा दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए अधिकांश नियंत्रण छड़ों को हटाकर रिएक्शन करते हैं , फिर भी उन्हें बिजली बढ़ाने में परेशानी हुई.
बिजली सप्लाई बंद होने पर भी जारी रहा टेस्ट
अचानक बिजली सप्लाई स्थिर हो गई. फिर भी रिएक्टर के टेस्ट सुपरवाइजर ने टेस्ट जारी रखने का आदेश दिया. स्वचालित आपातकालीन शटडाउन प्रणाली और अन्य सुरक्षा सुविधाएं बाद में बंद कर दी गई. टेस्ट शुरू होते ही अचानक अप्रत्याशित बिजली उत्पादन शुरू हो गया. तब एक ऑपरेटर ने आपातकालीन शटडाउन बटन दबाया, लेकिन नियंत्रण छड़ें कोर में प्रवेश करते ही जाम हो गई.
26 अप्रैल की रात हुआ था पहला विस्फोट
इसके बाद पहला विस्फोट हुआ. जिसके तुरंत बाद कम से कम एक और विस्फोट हुआ. इस विस्फोट ने रिएक्टर की 1,000 टन की छत को उड़ा दिया. देर रात घने अंधेरे में रिएक्टर से आग का गोला निकलने लगा और चारों तरफ रेडिएशन फैल गया.
प्लांट में बिजली गुल हो गई. हवा धूल और ग्रेफाइट के टुकड़ों से प्लांट भर गया और विकिरण बाहर निकलने लगा दीवारें और उपकरण ढह गए और दर्जनों जगह आग लग गई. इससे पड़ोसी रिएक्टर के ऊपर भी आग लग गई. इसके बाद सोवियत अधिकारियों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने चर्नोबिल में प्रवेश और निकास को बंद कर दिया.