प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन किया है. नालंदा के नए कैंपस के साथ ही अब भारत के उन विश्वविद्यालयों की भी चर्चा हो रही है, जिन्होंने पूरी दुनिया को ज्ञान की रोशनी दी है और इसमें तक्षशिला का नाम भी अहम है. दुनिया का सबसे पहला विश्वविद्यालय कहे जाने वाला तक्षशिला उस वक्त भारत की शान था, जब दूसरे देशों ने इतने बड़े विश्वविद्यालय बनाने के बारे सोचा नहीं होगा. तो जानते हैं तक्षशिला के बारे में और जानने की कोशिश करते हैं कि ये नालंदा से कितना अलग था...
क्या है तक्षशिला का इतिहास?
प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्र तक्षशिला की स्थापना राजा भरत ने की थी और अपने पुत्र 'तक्ष' को प्रशासक बनाने की वजह से इसका नाम तक्षशिला पड़ा. इसे इंसानी सभ्यता की सबसे पहली पाठशाला के रुप में भी जाना जाता है, जो 700 बीसी यानी ईसा के जन्म से 700 साल पहले बनाई गई थी. अगर मौजूदा समय की बात करें तो ये आज के पाकिस्तान के रावलपिंडी (पंजाब) में स्थित है, जो कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था. इसे पाकिस्तान में टैक्सिला के नाम से जाना जाता है.
उस दौर में यहां कौशल नरेश प्रसेनजित, पतंजलि, पाणिनी, चरक, चाणक्य, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिम्बिसार के राजवैध जीवक जैसे महापुरुषों ने यहां से शिक्षा ली थी. यहां पढ़ाई करने की उम्र 16 साल थी. यहां संस्कृत में भी शिक्षा दी जाती थी और ब्राह्मी के साथ खरोष्ठी दोनों लिपियों का लेखन में प्रयोग किया जाता था. यह उस दौर में शिक्षा का प्रमुख केंद्र बना रहा था.
तक्षशिला चाणक्य की वजह से ज्यादा जाना जाता है. कहा जाता है कि चाणक्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र की रचना तक्षशिला में ही हुई थी. चाणक्य (या कौटिल्य), मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त और आयुर्वेदिक चिकित्सक चरक ने तक्षशिला में पढ़ाई की थी. यहां लॉ स्कूल, मेडिकल स्कूल और सैन्य विज्ञान स्कूल के साथ ही वेदों और अठारह कलाओं के बारे में पढ़ाया जाता था, जिसमें तीरंदाजी, शिकार और हाथी विद्या जैसे कौशल शामिल थे.
क्या था खास?
अगर इस विश्वविद्यालय की खास बातों पर जोर दिया जाए तो यहां कोई फीस स्ट्रक्चर नहीं था और पढ़ाई के लिए फीस नहीं गुरु दक्षिणा ली जाती थी. साथ ही यहां कोई कोर्स नहीं था और टीचर अपने हिसाब से पढ़ाई करवाते थे. तक्षशिला में कोर्स के नाम पर 8 साल तक पढ़ाई होती थी, जिसमें सिर्फ ज्ञान पर फोकस होता था. कोई डिग्री नहीं थी, बस आश्रम की पढ़ाई के बाद लोग यहां 16 साल की उम्र में यहां दाखिला लेते थे. फिर पढ़ाई के बाद गुरु को दक्षिणा देनी होती थी, जो शिष्य अपने हिसाब से देते थे. कहा जाता है कि यहां कुछ लोगों को दिन में तो कुछ को रात में पढ़ाई करवा जाती थी.
नालंदा से क्या था अलग
अब बात करते हैं तक्षशिला और नालंदा में क्या फर्क था. एक तो तक्षशिला, नालंदा से भी पुराना विश्वविद्यालय था और नालंदा का कैंपस काफी ज्यादा बड़ा था. नालंदा विश्वविद्यालय में तक्षशिला विश्वविद्यालय की तुलना में ज़्यादा विषयों में पढ़ाई होती थी.कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि नालंदा में सभी को फ्री में पढ़ाई और रहने की जगह दी जाती थी. तक्षशिला विश्वविद्यालय की शिक्षा प्रणाली नालंदा विश्वविद्यालय की तरह व्यवस्थित नहीं थी.
नालंदा में कोर्स के हिसाब से पढ़ाई होती थी, जबकि तक्षशिला में टीचर पर निर्भर करता था. नालंदा में पढ़ाई के लिए कई किताबें थी और यहां पढ़ाई के लिए काफी बड़ी लाइब्रेरी भी थी. साथ ही नालंदा में डिग्री, कोर्स के हिसाब से पढ़ाई होती थी, लेकिन तक्षशिला में किसी सीमा में नहीं बल्कि ज्ञान के हिसाब से पढ़ाई होती थी.
कैसे हुई खत्म?
तक्षशिला को खत्म करने पर किसी एक आक्रांता का नाम नहीं आता है. तक्षशिला शहर शिक्षा के साथ व्यापार की नजर से भी काफी अहम थी, जिस पर कई हमलावरों की नजर रही. अगर इसे विनाश की बात करें तो इसे 7वीं सदी से पहले खत्म कर दिया गया था. दरअसल, कुछ रिपोर्ट में कहा जाता है कि 5वीं ईस्वीं में चीन से बौद्ध भिक्षु फाहियान ने इस विश्वविद्यालय को देखा था और 7वीं ईस्वीं में भिक्षु श्यानजांग को यहां मलबा ही दिखा. कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि मध्य-एशियाई खानाबदोश जनजातियों ने, मुस्लिम आक्रांताओं और शक और हूण आदि ने इसे खत्म कर दिया था.