इंटरनेशनल मीडिया में पनामा नहर चर्चा में है. पनामा नहर के खबरों में आने की वजह है डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान. दरअसल, अमेरिका के होने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि पनामा नहर में लगने वाले टैक्स को कम किया जाना चाहिए, वर्ना इसे अमेरिका में शामिल कर लिया जाएगा. इसके बाद पनामा के राष्ट्रपति ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि ये हमेशा पनामा में ही रहेगी. ऐसे में सवाल है कि आखिर पनामा नहर कहां है, क्यों इतनी जरूरी है, जिसके लिए कहा जाता है कि इससे पनामा, अमेरिका ने अपनी इकोनॉमी को सुधार लिया है.
डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?
सबसे पहले आपको बताते हैं कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा है? ट्रंप ने पनामा को धमकी दी है कि अगर वो अमेरिकी जहाजों से मनचाहा शुल्क लेना जारी रखता है, तो वो पनामा नहर को अमेरिका को वापस करने की मांग करेंगे. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ' पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, 'पनामा की ओर से लिए जा रहे शुल्क हास्यास्पद हैं, विशेष रूप से यह जानते हुए कि अमेरिका ने पनामा को असाधारण उदारता दिखाई है. अगर इस उदारता के सिद्धांतों, नैतिक और कानूनी, का पालन नहीं किया जाता है, तो हम पनामा नहर को पूरी तरह से और बिना किसी सवाल के हमें वापस करने की मांग करेंगे.'
क्या बोले पनामा के राष्ट्रपति?
डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने कहा है कि पनामा की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है और नहर के प्रशासन पर चीन का कोई प्रभाव नहीं है. साथ ही उन्होंने कहा है कि पनामा से होकर गुजरने वाले जहाजों से लिया जाना वाला शुल्क एक्सपर्ट्स की ओर से निर्धारित है. मुलिनो ने कहा कि नहर का जर्रा-जर्रा पनामा का है और यह हमारा ही रहेगा.
कहां है ये पनामा नहर?
पनामा नहर 82 किलोमीटर लंबी है, जो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है. अमेरिका के लिए इस नहर का काफी महत्व है, क्योंकि अमेरिका का 14 फीसदी कारोबार पनामा नहर के जरिए होता है. इसके साथ ही कई देश समुद्र व्यापार पनामा के जरिए ही करता है. इतना ही नहीं, ये नहर कई देशों के समुद्री व्यापार में अहम भूमिका निभाती है और दुनिया का 6 फीसदी समुद्री व्यापार इसी नहर से होता है.
अभी किस के पास है अधिकार?
पनामा नहर का नियंत्रण अभी पनामा के पास है. इसका मैनेजमेंट पनामा कैनाल अथॉरिटी की ओर से किया जाता है. पनामा के पास पूरी तरह से ये नहर साल 1999 में आई थी. इससे पहले इस पर अमेरिका का अधिकार था. वैसे तो 1881 में फ्रांस ने इसे बनाना शुरू किया था और फिर 1904 से इस नहर को अमेरिका ने बनाया. 1914 में इस नहर को बना लिया गया और अमेरिका का ही इस पर नियंत्रण था और 1977 में इसे हैंडओवर करने का समझौते पर साइन किया गया. फिर 1999 में ये नहर पूरी तरह से पनामा के पास चली गई.
कैसे बनी थी ये नहर
वैसे तो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाले इस जलमार्ग को बनाने का सपना 16वीं शताब्दी की शुरुआत से है. साल 1513 में वास्को नुनेज़ डी बाल्बोआ ने यहां रास्ता बनाने का सोचा था, जहां एक पट्टी दोनों महासागरों को अलग करती है. इसके बाद रोमन सम्राट चार्ल्स वी (स्पेन के चार्ल्स I) ने यहां एक रास्ता बनाने के लिए एक आंदोलन शुरू किया. फिर चार्ल्स ने पनामा के क्षेत्रीय गवर्नर को चाग्रेस नदी के बाद प्रशांत महासागर तक जाने वाले मार्ग का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया. इसके बाद लंबी प्रोसेस के बाद पहले फ्रांस और फिर अमेरिका ने इसे बनाया.
इसे बनाने में अमेरिका के 375,000,000 डॉलर खर्च हुए थे. ये उस वक्त अमेरिका के इतिहास का सबसे पहले कंस्ट्रक्शन था और इसमें सबसे ज्यादा पैसे खर्च हुए थे. इसे बनाने में 5609 लोगों की जान चली गई थी.
कैसे नहर बना इनकम का सोर्स?
पनामा के अधिग्रहण में आने के बाद पनामा को इसका काफी फायदा हुआ. इसका पनामा के टोटल नॉन टैक्स रेवेन्यू में 75.1 फीसदी का योगदान है. नहर पनामा के खजाने में करीब 2.5 बिलियन डॉलर की मदद करता है. साथ ही नहर का पनामा की जीडीपी में भी 3.5 फीसदी का योगदान है.साथ ही इससे 55 हजार नौकरियां मिली है और 2.9 फीसदी लोगों को इससे ही नौकरी मिलती है. सरकार की 23.6 फीसदी कमाई भी पनामा से ही होती है. इस नहर ने पनामा की अर्थव्यवस्था में 1990 के बाद काफी बड़ा योगदान दिया है.
अमेरिका को भी मिला फायदा
इस नहर के निर्माण ने अमेरिका को अलग ताकत दी थी, लेकिन अमेरिका ने इसे लेकर बड़ा रिस्क भी लिया था. दरअसल, इससे बनाने का काम आसान नहीं था और इसे बनाने में काफी खर्च हुआ था.लेकिन इसे बनाने के साथ ही अमेरिका पहली बार दोनों महासागरों पर नियंत्रण हासिल करने जा रहा था. युद्ध के समय यह महत्वपूर्ण था. हवाई शक्ति नहीं होने की वजह से दुश्मन से समुद्र के रास्ते ही लड़ते थे और इसमें अमेरिका अहम रोल में था. इसे संयुक्त राज्य अमेरिका को पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने की एक भू-राजनीतिक रणनीति माना जाता है.
ये ट्रांसपोर्ट के खर्च को काफी कम करता है और इससे अमेरिका को काफी फायदा हुआ है. इसका कारण ये है कि यहां से आने जाने वाले शिप में 72 फीसदी अमेरिका से जुड़े होते हैं, जो या तो अमेरिका से रवाना होते हैं या अमेरिका जा रहे होते हैं. ऐसे में इसने अमेरिका के समुद्री व्यापार को काफी बढ़ा दिया है.