अन्नदाता के घर पैदा होने वाले ये बच्चे 'क' से कबूतर से पहले 'क' से किसान के मायने सीखते हैं. उनके लिए 'ख' से खरगोश से ज्यादा 'ख' से खेत का अर्थ बड़ा होता है. अब जब बच्चों के अभिभावक कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में बैठे हैं तो ऐसे में उनकी पढ़ाई-लिखाई और पहले की रूटीन वाली जिंदगी काफी बदल गई है. तस्वीरों में देखिए- गाजीपुर बॉर्डर सहित दिल्ली के अन्य बॉर्डर्स पर कैसे ये बच्चे अपना समय बचाकर पढ़ाई कर रहे हैं...
सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 83 दिनों से किसान दिल्ली के बॉर्डर्स पर आंदोलनरत हैं. 26 जनवरी को आयोजित ट्रैक्टर रैली में हिंसक घटनाओं के बाद आंदोलन की दिशा बदलती दिख रही थी. लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर पढ़ रहे बच्चों की यह तस्वीर कुछ और ही बयां करती है.
बता दें कि किसान आंदोलनों के समर्थन में कई गांवों में महापंचायत हो रही है. वहीं आंदोलन में पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी भागीदारी कर रही हैं. वहीं कुछ जगहों पर पूरे के पूरे किसान परिवार बच्चों समेत धरने पर हैं.
इन धरनों में बच्चे भी अपने अभिभावकों के साथ आए हुए हैं. ये बच्चे आंदोलन के साथ साथ अपनी पढ़ाई लिखाई पर भी ध्यान दे रहे हैं. इन बच्चों को वहां वालंटियर पढ़ा रहे हैं.
गाजीपुर बॉर्डर के अलावा दिल्ली के दूसरे बॉर्डर पर भी बच्चों की पढ़ाई के ऐसे दृश्य नजर आ जाते हैं. ये बच्चे अपने माता-पिता के साथ ही दिसंबर-जनवरी की ठंड सड़क पर खुले में बिता चुके हैं. अभिभावकों के सामने कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करने की जिम्मेदारी के अलावा बच्चों की पढ़ाई के नुकसान की भी चिंता है, जिसे कुछ इस तरह आंदोलन के बीच क्लास लगवाकर दूर किया जा रहा है.
कुछ अभिभावक दिन भर आंदोलन के बाद शाम को खुद ही अपने बच्चों के साथ साथ दूसरे बच्चों की भी पढ़ाई करा रहे हैं. अब यह आंदोलन कब तक चलेगा यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन किसी तरह बच्चों की पढ़ाई का रास्ता निकाला जा रहा है.
बॉर्डर्स पर चल रहे आंदोलनों में खाने पीने के लिए लंगर भी चल रहे हैं. ये लंगर समय से लोगों को भोजन मुहैया कराने का काम कर रहे हैं. इन लंगरों में लोग अपनी स्वेच्छा से काम करते हैं.