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एजुकेशन न्यूज़

US Election: वो पांच शब्द जिनका अर्थ जाने बिना आप नहीं समझ पाएंगे अमेरिकी चुनाव

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अमेरिका में राष्‍ट्रपति चुनाव नवंबर के पहले सोमवार को शुरू होता है. ये चुनाव भारत के चुनावों से काफी अलग होता है. इस चुनाव में एक शब्द आता है इलेक्टर. आइए जानते हैं क्या होता है इलेक्टर, ऐसे ही यूएस की चुनावी डिक्शनरी के इन पांच शब्दों का मतलब हम आपको यहां बता रहे हैं. 

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क्या होता है इलेक्टर और इलेक्टोरल कॉलेज

अमेरिकी नागरिक इलेक्‍टर का चुनाव करते हैं जो अमेरिका में खड़े होने वाले राष्‍ट्रपति के प्रत्‍याशी का समर्थन करते हैं. इसको वहां पर इलेक्‍टोरल कॉलेज कहा जाता है. पॉपुलर वोट के जरिए 50 राज्यों में 538 इलेक्टर्स चुने जाते हैं. इनसे इलेक्टोरल कॉलेज बनता है. राष्ट्रपति बनने के लिए 270 इलेक्टरल कॉलेज वोट चाहिए. जिस राज्य की जितनी ज्यादा आबादी, उसके उतने ज्यादा इलेक्टोरल वोट. हर राज्य से दोनों सदनों के लिए जितने सांसद चुने जाते हैं, उतने ही उसके इलेक्टर्स होंगे. कुछ लोग इसे गलत प्रक्र‍िया भी कहते हैं क्योंकि कैलिफोर्निया में 55 तो व्योमिंग में सिर्फ 3 इलेक्टर्स हैं. साल 2016 में ट्रम्प को 306 इलेक्टर्स का समर्थन मिला, लेकिन हिलेरी के लिए आंकड़ा 232 रहा, इससे वो चुनाव हार गईं. 

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पॉपुलर वोट
जैसा कि पहले आपने जाना कि अमेरिकी चुनाव में वहां का मतदाता सबसे पहले इलेक्टर्स चुनते हैं जिनसे इलेक्टोरल कॉलेज बनता है. अब ये इलेक्टोरल कॉलेज राष्ट्रपति चुनता है. लेकिन पॉपुलर वोट को समझने के लिए आपको ये जानना होगा कि जनता यानी मतदाता जो पॉपुलर वोट की तरह अपना प्रतिनिधि इलेक्टर चुनते हैं. लेकिन आगे ये जरूरी नहीं होता कि जनता जिसे इलेक्टर चुन रही है, वो उसके पसंद के कैंडिडेट यानी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को वोट देगा या नहीं. 

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प्राइमरी और कॉकस

पार्टी का उम्मीदवार तय करने के लिए दो तरह से चुनाव किए जाते हैं पहला प्राइमरी और दूसरा कॉकस. इसमें पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए खड़ा हो सकता है, उसे सिर्फ अपने समर्थकों का साथ चाहिए होता है. प्राइमरी चुनाव राज्य सरकारों के अंतर्गत कराए जाते हैं जोकि खुले और बंद रूप से भी कराए जा सकते हैं. यानी अगर राज्य सरकार चुनती है कि खुले रूप से चुनाव करेगी तो उसमें पार्टी के समर्थक के साथ-साथ आम जनता भी मतदान कर सकती है. वहीं अगर बंद रूप से मतदान होता है तो सिर्फ पार्टी से जुड़े समर्थक ही उम्मीदवार के लिए वोटिंग करते हैं.

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कॉकस सिस्टम

अब अगर बात कॉकस सिस्टम की करें तो यह चुनाव पार्टी की तरफ से ही कराए जाते हैं इसमें पार्टी के समर्थक एक जगह इकट्ठे होते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करते हैं. राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए खड़े हो रहे व्यक्ति की बात सुनते हैं उसके बाद उसी सभा में हाथ खड़े कर एक उम्मीदवार को समर्थन दे दिया जाता है हालांकि ऐसा बहुत ही कम राज्यों में होता है. अमेरिकी चुनावी सिस्टम में एक वोटर को चुनाव से पहले कुछ समय के लिए एक पार्टी के लिए रजिस्टर करना पड़ता है तभी वह इस तरह के प्राइमरी या कॉकस चुनावों में हिस्सा ले सकता है. 

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नेशनल कन्वेंशन और उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार

एक बार जब प्राइमरी इलेक्शन खत्म हो जाता है तो यह तस्वीर साफ हो जाती है कि दोनों पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन बनेगा. लेकिन इसका आधिकारिक ऐलान नेशनल कन्वेंशन में होता है, डेमोक्रेट्स का नेशनल कन्वेंशन हमेशा जुलाई में होता है और रिपब्लिकन पार्टी का अगस्त के महीने में. यहां पर पार्टी की सर्वोच्च टीम उम्मीदवार का ऐलान करती है, फिर राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपने समर्थकों के सामने एक भाषण देते हुए उम्मीदवारी को स्वीकार करता है और इसके साथ अपनी मर्जी से चुने हुए उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का ऐलान करता है. और यहां से अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की असली प्रक्रिया शुरू होती है जब पार्टी की ओर से चुना गया राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार पूरे देश में प्रचार करने के लिए निकलता है.

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बता दें कि इंडियन टाइमिंग के अनुसार मंगलवार रात फाइनल वोटिंग हुई. इस बार रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प और डेमोक्रेट पार्टी के जो बाइडेन मैदान में हैं. अब देखना है कि व्हाइट हाउस तक पहुंचने में कौन कामयाब होता है. फ‍िलहाल पूरी दुनिया की न‍िगाहेंं यूएस के नतीजोंं पर लगी हैंं.

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