बच्चे जब तोतली भाषा में बोलना शुरू करते हैं तो माता-पिता और परिवार के लोगों की खुशी देखते ही बनती है. हर पेरेंट्स बच्चे के बोलने को लेकर उत्साहित रहते हैं. कई बार दो से ढाई साल में भी अगर बच्चे कोई मीनिंगफुल वर्ड नहीं बोल पाते तो पेरेंट्स चिंतित हो जाते हैं. ऐसे में आपको बच्चों के बोलना सीखने के पैटर्न के बारे में कुछ बातें जरूर पता होनी चाहिए. आइए बच्चों के विकास मामलों की विशेषज्ञ डेवलेपमेंटल बिहेविरल पीडिएट्रिशियन डॉ हिमानी नरूला से जानते हैं कि बच्चे कब बोलना शुरू करते हैं और पेरेंट्स को बच्चों को लेकर कब चिंता शुरू करनी चाहिए.
डेवलेपमेंटल बिहेविरल पीडिएट्रिशियन व Continua kids की सह संस्थापक व निदेशक डॉ हिमानी नरूला कहती हैं कि बच्चे के बोलना सीखने की एक समय सीमा होती है. एक साल यानी 12 महीने का बच्चा दादा, मामा, पापा जैसे शब्द बोलते हैं जो उनके लिए मीनिंगफुल न होकर सिर्फ बोलने की तरफ एक कदम भर होता है. इसी तरह छह माह बाद तक बच्चे थोड़ा बोलना सीख जाते हैं. बच्चों को बोलने के लिए प्रेरित करने के लिए माता-पिता को भी उनके साथ सहयोग बहुत जरूरी होता है.
डॉ हिमानी कहती हैं कि 18 महीने का बच्चा 5 से 6 मीनिंगफुल शब्द बोलता है. इसमें उनके आसपास के शब्द शामिल होते हैं, जो वो अपने माहौल से सीखते हैं, लेकिन इन शब्दों का एक अर्थ जरूर होता है. जैसे कि बच्चे अपने लिए दूध मांगने के लिए दूदू या बाय बाय जैसे शब्द बोलने लगते हैं. ये पूरी तरह उनके माहौल पर डिपेंड करता है कि वो किन शब्दों को कैच कर पाएं.
वहीं दो साल की उम्र तक बच्चों के पास 200 शब्दों की वेकुबलरी तैयार हो जाती है. इस उम्र तक वो दो शब्द मिलाकर बोलना शुरू करते हैं. इसमें वो पानी दे, दूदू दे जैसे शब्द बोलते हैं. ये एक सामान्य गुण होता है, दो साल की उम्र तक बच्चों में अपने आसपास से सीखे शब्दों की वैकुबलरी और दो शब्दों के फ्रेज बोलने की क्षमता विकसित हो जाती है.
वहीं तीन साल की उम्र तक बच्चे थ्री वर्ड फ्रेज बोलना सीख जाता है. इसमें वो नाउन और प्रोनाउन का इस्तेमाल करना सीख लेते हैं, मसलन अक्सर बच्चे तीन साल की उम्र तक मुझे दूदू दो, मुझे जाना है, पापा घर आओ जैसे शब्द बोलते हैं. लेकिन अगर तीन साल की उम्र तक बच्चा सोशलाइज नहीं कर रहा और कुछ बोल नहीं रहा तो आपको डॉक्टर से जरूर कंसल्ट करना चाहिए. डॉ हिमानी कहती हैं कि कोविड टाइम में भी बच्चों में देर से बोलने की समस्या सामने आई है.
डॉ हिमानी बताती हैं कि इस माहौल में बच्चे सोशल नहीं हो पा रहे. घर में आने जाने वालों और मिलने वाले बहुत कम हो गए हैं तो ऐसे में बच्चे टाटा बाय, बाय, नमस्ते हेलो नहीं कर रहे. वो ज्यादा लोगों से कम्यूनिकेट नहीं कर रहा इसलिए बच्चों में लेट बोलने की समस्या आ रही है. यहां तक कि कई पेरेंट्स ये शिकायत भी कर रहे हैं कि उनका बच्चा आई कॉन्टैक्ट कम करता है. ऐसे किसी भी असामान्य लक्षण पर आपको विशेषज्ञ से सलाह जरूर लेनी चाहिए.
बता दें कि जन्म से तीन माह की उम्र तक बच्चा अपने आसपास के लोगों की आवाजें पहचानने लगता है. वो अपनी पहचानी आवाज पर रिस्पांड करने की भी कोशिश करने लगता है. तीन माह की उम्र से ही वो खुद से बात कर रहे व्यक्ति का चेहरा देखता है. चार माह की उम्र तक बच्चा मुस्कुराकर या हंस कर आपसे जुड़ने की कोशिश करता है. वो सबसे पहले प, ब और म के बाद पूह, बूह और मूह जैसे हुंकार भरकर शब्द बोलकर कम्यूनिकेट करना शुरू करता है.
ऐसे करें शुरुआत
बच्चा वैसे तो खुद ही बोलना शुरू कर देता है, लेकिन इसके लिए आपका कम्यूनिकेशन और माहौल भी बड़ी भूमिका निभाता है. इसलिए जरूरी है कि पल-पल बढ़ रहे बच्चे से बात जरूर करें और उसके साथ बातचीत में हां में हां मिलाकर शामिल हों. आप जब उससे कुछ बात कहें तो रुककर बच्चे को रिऐक्ट करने का मौका जरूर दें. बच्चे के सामने लोरी या गीत गांए इससे वो आपकी आवाज से कनेक्ट होकर रिएक्ट करना सीखेगा.