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CBSE 10वीं की बोर्ड परीक्षा दो बार होनी चाहिए या नहीं? उम्र से लेकर तनाव तक... एक्सपर्ट्स ने बताए फायदे और नुकसान 

CBSE 10th board exams twice: एक्सपर्ट ने कहा, "ग्रेड 10 के छात्रों के लिए कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होनी चाहिए. कक्षा 12 में केवल एक स्कूल-लीविंग परीक्षा होनी चाहिए और आप बच्चे का उसके प्रोजेक्ट और उसके पोर्टफोलियो और पूरे साल छात्र द्वारा किए जाने वाले काम के माध्यम से लगातार मूल्यांकन कर सकते हैं."

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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

CBSE Class 10 board exams twice: सीबीएसई बोर्ड परीक्षाएं साल में दो बार कराने को लेकर लंबे समय से चर्चा कर चल रही थी. अब केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इसे लेकर ड्राफ्ट स्कीम जारी कर दी है, जो अगले साल 2026 से लागू हो सकती है. सीबीएसई फिलहाल 10वीं बोर्ड परीक्षा साल में दो बार कराने पर विचार कर रहा है. हालांकि 10वीं के छात्रों को दोनों या किसी एक परीक्षा में उपस्थित होने का विकल्प होगा. इस प्रस्ताव पर कई शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं की प्रतिक्रियाएं आई हैं, जिन्होंने साल में दो बार 10वीं बोर्ड परीक्षा के फायदों के साथ नुकसान भी बताए हैं.

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क्या एक के बाद एक लगातार परीक्षाएं राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के मूल्यों के विरुद्ध हैं?

असेसमेंट एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि केवल तीन घंटे की परीक्षा पर निर्भर रहकर बच्चे का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. एक दिन की परीक्षा कई कारणों से बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकती है. परीक्षा के दिन, बच्चे की तबियत बिगड़ सकती है या किसी भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षणिक समस्या का सामना कर रहा हो सकता है जो तीन घंटे की परीक्षा के परिणामों को प्रभावित कर सकती है.

10वीं की बोर्ड परीक्षा होनी चाहिए या नहीं?

DLF Foundation Schools की अध्यक्ष और कार्यकारी निदेशक डॉ. अमिता मुल्ला वट्टल ने कहा, "ग्रेड 10 के छात्रों के लिए कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होनी चाहिए. कक्षा 12 में केवल एक स्कूल-लीविंग परीक्षा होनी चाहिए और आप बच्चे का उसके प्रोजेक्ट और उसके पोर्टफोलियो और पूरे साल छात्र द्वारा किए जाने वाले काम के माध्यम से लगातार मूल्यांकन कर सकते हैं. लेकिन साथ ही, ड्राफ्ट स्कीम में बताया गया है कि "बोर्ड परीक्षाओं को 'आसान' भी बनाया जाएगा, इसका मतलब है कि वे महीनों की कोचिंग और याद करने के बजाय मुख्य रूप से मूल क्षमताओं/योग्यताओं का परीक्षण करेंगे; कोई भी छात्र जो स्कूल की क्लास में जाकर बेसिक एफर्ट करता है, वह बिना किसी अतिरिक्त कोशिश के संबंधित विषय की बोर्ड परीक्षा में पास हो सकता है और अच्छा प्रदर्शन कर सकता है."

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क्या वोकेशनल कोर्स चुनने वालों के लिए पहली परीक्षा अधिक फायदेमंद होगी?

प्रमुख शिक्षाविद् जवाहर सूरीसेट्टी ने बताया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों को तैयारी के लिए अच्छा मौका मिलेगा क्योंकि वे फरवरी में परीक्षा के पहले राउंड का विकल्प चुन सकते हैं. लेकिन कई लोग इससे अलग सोचते हैं. कई शिक्षाविदों ने इंडिया टुडे को बताया कि 10वीं बोर्ड के परिणाम का एकमात्र उद्देश्य कक्षा 11 में एक स्पेशल स्ट्रीम का चयन करना है. उन्हें लगता है कि शिक्षकों द्वारा साइकोमेट्रिक टेस्ट के आधार पर स्ट्रीम का चयन किया जा सकता है. इसलिए, कक्षा 10 के लिए केवल एक वैकल्पिक परीक्षा (CSBE Optional Exam) होनी चाहिए और केवल वही छात्र इसमें शामिल होने चाहिए जो इसे चुनना चाहते हैं. सीखो और कमाओ (learn-and-earn) प्रोग्राम जैसे कुछ वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए, एक छात्र को बोर्ड के परिणाम की आवश्यकता होती है.

टीचर्स पर होगा दो बार परीक्षाओं का दबाव, छुट्टियों पर पड़ेगा असर

सीबीएसई द्वारा नई दो-एग्जाम सिस्टम के लिए सुझाया गया कैलेंडर भी बहस का विषय है. अगर इस नए सिस्टम को शामिल किया जाता है तो दो बैक-टू-बैक एग्जाम होंगे. कई लोगों का मानना ​​है कि टीचर्स को भी उचित अवकाश की जरूरत है. टीचिंग कम्युनिटी पर दबाव बहुत अधिक होगा. सामाजिक और अभिभावकों का दबाव शिक्षकों पर भी होगा, साथ ही सिलेबस का तनाव और परीक्षाओं के बदलते पैटर्न के कारण भी शिक्षकों की छुट्टियां कम हो जाएंगी.

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क्या प्रैक्टिकल एग्जाम भी दो बार होंगे?

कई विशेषज्ञों का मानना ​​है कि दूसरी बोर्ड परीक्षा शुरू होने से संसाधनों पर बोझ कई गुना बढ़ जाएगा. एग्जाम सेंटर बनाने होंगे, बैंकों को बताना होगा और प्रश्नपत्र बनाने होंगे. दो बार बोर्ड परीक्षा के मॉडल में प्रैक्टिकल एग्जाम्स को कैसे संभाला जाएगा, इस पर सवाल उठ रहे हैं - क्या स्टूडेंट्स प्रैक्टिकल एग्जाम के लिए फिर से उपस्थित हो सकते हैं या पहले के प्रैक्टिकल एग्जाम के नंबर ही फाइनल समझे जाएंगे. प्रक्रिया के बारे में अभी भी कन्फ्यूजन है. एक स्टूडेंट कितने पेपरों के लिए फिर से उपस्थित हो सकता है?

क्या 14 साल की उम्र में इतनी परीक्षाएं कराना ठीक है?

अमिता मुल्ला वट्टल ने स्पष्ट किया कि "कोविड के बाद खासतौर पर अचानक से की गई प्रतिक्रियाओं पर फिर से विचार करना होगा और काफी सोच-विचार के साथ फिर से काम करना होगा. बहुत से टीचर्स ऑफलाइन एजुकेशन एक्टिविटीज में रुचि नहीं रखते हैं और हमें अच्छे टीचर्स मिलना मुश्किल हो रहा है." उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि कृपया परीक्षा की दुनिया में जो हो रहा है, उस पर विचार करें. एक तरफ, हम कह रहे हैं कि छात्र को क्रिएटिव और कल्पनाशील होना चाहिए. क्या 14 साल की उम्र में परीक्षा एक कल्पनाशील प्रणाली है? वह भी दो परीक्षाएं? एक ही काफी है, आत्महत्या के मामले सामने आ रहे हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दो परीक्षाओं के बाद क्या होगा."

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वर्क-लाइफ बैलेंस महत्वपूर्ण होगा

कई शिक्षकों और अभिभावकों को लगता है कि कुछ महीनों के भीतर दो परीक्षाओं से बैलेंस बिगड़ सकता है. पहली बोर्ड परीक्षा के बाद भी स्कूलों, शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों के लिए कोई राहत नहीं होगी. उन्हें तुरंत दूसरी परीक्षा के लिए काम करना शुरू करना होगा जो मई में होनी है. तनाव भी होगा. पहली परीक्षा के बाद, परिणाम घोषित किए जाएंगे, और अगर कोई छात्र अच्छा प्रदर्शन नहीं करता है, तो प्रक्रिया का दूसरा राउंड शुरू होगा. प्रमुख शिक्षाविद् जवाहर सुरीसेट्टी इस पर कहते हैं , "अगर किसी छात्र को छह पेपर देने हैं, तो वह दो परीक्षाओं के बीच के प्रेशर मैनेज कर सकता है. पहली परीक्षा में, वह 4 पेपर दे सकता है और अगले चक्र के लिए 2 पेपर छोड़ सकता है."

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