बिहार के खेती किसानी वाले परिवार के बेटे आदर्श कुमार ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU)में दाखिला लिया है. पांच साल मगध यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर चुके आदर्श कहते हैं कि जेएनयू में दाखिला लेना मेरी मजबूरी है. 22 साल की उम्र में जब मुझे अपने सपने पूरे कर लेने चाहिए, तब मैंने यूजी कोर्स में दाखिला लिया है. इसके पीछे मेरे हालात और मगध यूनिवर्सिटी की पूरी कार्यप्रणाली को मैं वजह मानता हूं. आइए जानते हैं छात्र आदर्श कुमार की बिहार के गांव से जेएनयू तक पहुंचने तक की पूरी कहानी.
आदर्श कुमार बिहार भोजपुर जिले के छपरापुर गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता सत्येंद्र कुमार और बड़े भाई बड़े भाई प्रीतम कुमार दिहाड़ी किसान हैं. मां हाउसवाइफ है. कमजोर आयवर्ग के इस परिवार के छोटे बेटे आदर्श ने बचपन में ही आर्मी अफसर बनने का सपना देखा था, जिसके लिए वो लगातार तैयारी करते रहे. आदर्श ने aajtak.in से बताया कि मैंने मेरे गांव से सटे नरायनपुर के सरकारी स्कूल से दसवीं की पढ़ाई की. दसवीं में मेरे 75 प्रतिशत नंबर आए थे.
पांच साल बाद भी डिग्री नहीं
उसके बाद फतेहपुर संडा कॉलेज, अरवल में 11वीं में दाखिला लिया. यहां से 12वीं की पढ़ाई की. यहां भी कॉलेज में पढ़ाई होती नहीं थी तो बाहर कोचिंग पढ़ते थे. खैर जैसे तैसे कोचिंग से पढ़कर साइंस स्ट्रीम में 58 प्रतिशत नंबर से 12वीं की परीक्षा पास की. इसके बाद ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए मगध यूनिवर्सिटी से मैथ ऑनर्स में दाखिला ले लिया. यहां मेरा ग्रेजुएशन का मैरा बैच साल 2018 से 2021 का था. यहां पांच साल होने वाले हैं लेकिन अभी सिर्फ पार्ट वन हुआ हैं.
मैं काफी परेशान हो गया था. मैं ग्रेजुएट लेवल के एग्जाम क्वालीफाइ हो जाता था लेकिन जब डिग्री ही नहीं तो इसका क्या फायदा. इसके लिए यूनिवर्सिटी में प्रोटेस्ट वगैरह भी किया, पुलिस से लाठी डंडे खाए. फिर भी कुछ नहीं हुआ. यहां यूनिवर्सिटी में परमानेंट वाइस चांसलर रहेगा, तभी कोइ डिसीजन वो ले सकेगा. जब कोई स्थायी वाइस चांसलर नहीं है तो कौन छात्रों का सोचे.
यही वजह है कि यहां सेशन इतने लेट चल रहे हैं. जो कोर्स 2021 में कंपलीट हो जाना चाहिए था, वो अभी तक पहले सेशन में है. यही नहीं साल 2017-20 सेशन के 90 हजार छात्रों का रिजल्ट भी अभी नहीं दिया. जब ऐसे हालात बन गए तो किसी तरह माइग्रेशन लेकर सीयूइटी का एग्जाम दिया. अब यहां जेएनयू में जापानी लैंग्वेज में एडमिशन ले लिया है.
दिल्ली में पहले मजदूरी कर चुका हूं...
आज मैं जेएनयू के एकेडमिक माहौल में पढ़ाई करने को लेकर बहुत गौरवान्वित और खुश हूं. इससे पहले साल 2018 में 12वीं पास करके दिल्ली आया था. यहां मुझे एनडीए का एसएसबी देना था. लेकिन अंग्रेजी इतनी कमजोर थी कि वो इंटरव्यू निकाल नहीं सका. इसलिए मैंने तय किया कि यहां रहकर तैयारी करूं. दिल्ली में रहना-खाना काफी महंगा था तो बिहार के लोगों से संपर्क किया जो यहां रहते हैं. उनके साथ फैक्ट्री में काम किया, लेकिन मजदूरी के साथ ज्यादा दिनों तक तैयारी संभव नहीं हो सकी. इसके बाद घर चला गया. गांव में खेतों में भी धान कटाई के सीजन में मेरा वहां रहना जरूरी होता है. आगे भी जब फसल कटाई का सीजन आएगा तो मुझे जाना पड़ेगा.
डिफेंस अफसर बनना चाहता था, अब IAS बनना है सपना
पहले मैं डिफेंस अफसर बनना चाहता था, लेकिन एनडीए के लिए तो उम्र ज्यादा हो गई. अब आगे यूपीएससी की तैयारी करूंगा. इससे पहले अग्निवीर से भी ट्राई किया था. अब चाहता हूं कि मैं यूपीएससी से तैयारी करके सिविल सर्वेंट बनूं ताकि अपने जैसे जरूरतमंदों के लिए नजीर बन सकूं.
डीयू में कोर्स महंगा, इसलिए नहीं लिया एडमिशन
गणित ऑनर्स की पांच साल पढ़ाई के बाद आदर्श ने जेएनयू में जापानी लैंग्वेज में दाखिला लिया है. इस पर आदर्श कहते हैं कि असल में मैं डीयू में एडमिशन लेना चाहता था. जब पता किया तो पाया कि यहां फाइव इयर्स इंटीग्रेटेड प्रोग्राम की फीस काफी ज्यादा है, रहना खाना भी अलग से था. फिर अचानक जेएनयू में एडमिशन का ख्याल आया क्योंकि सुन रखा था कि यहां फीस और खाने का खर्च कम है. यहां फीस 268 रुपये और खाने का मंथली खर्च 3000 के आसपास है, जोकि 2000 की स्कॉलरशिप में मिल जाता है. इस तरह घर वालों से दो हजार रुपये मंगा लूंगा तो उसी में खर्च चल जाएगा.