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लेक्चरर की लॉकडाउन में छूटी नौकरी, घर चलाने के लिए बना खेत‍िहर मजदूर

सांगली जिले की जाट तहसील के एक छोटे से गांव निगड़ी के रहने वाले इस युवा लेक्चरर ने 2018 में युवा लेखन में साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार भी जीता था.

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Representational Image
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इसी मार्च तक नवनाथ गोरे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक कॉलेज में लेक्चरर थे. लेकिन COVID-19 में लगे लॉकडाउन ने उनकी कॉन्ट्रैक्ट जॉब छीन ली. आजकल वो अपना घर चलाने के लिए ख‍ेत‍िहर मजदूर का काम कर रहे हैं. 

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सांगली जिले के जाट तहसील के एक छोटे से निगड़ी गांव के रहने वाले नवनाथ गोरे 32 साल के हैं. उन्हें साल 2018 में युवा लेखकों के लिए साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार मिला था. आज कठ‍िन समय में ये पुरस्कार उनके लिए सांत्वना भर रह गया है. कोरोना वायरस के प्रकोप ने उन्हें खेत‍िहर मजदूर बनने पर विवश कर दिया. 

कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते पूरी दुनिया में लाखों लोगों की नौकरी छीनी है. इसी कड़वी सच्चाई का सामना कर रहे नवनाथ गोरे के सामने अपने परिवार के पालन पोषण के लिए कोई रास्ता नहीं बचा है. वो अपना परिवार चलाने के लिए गृह जिले में एक खेत मजदूर के रूप में काम करने का फैसला ले चुके हैं. 

गोरे ने कोल्हापुर जिले के शिवाजी विश्वविद्यालय से मराठी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है. वहां से पोस्ट-ग्रेजुएशन के दिनों में उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘फ़ेसती’ लिखना शुरू किया. पुस्तक 2017 में प्रकाशित हुई और उन्होंने अगले साल साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार जीता. 

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इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में नवनाथ गोरे ने कहा कि पुरस्कार जीतने के बाद, मुझे अहमदनगर जिले के एक कॉलेज से नौकरी का प्रस्ताव मिला.जहां मैंने कॉन्ट्रैक्ट बेस पर व्याख्याता के रूप में काम करना शुरू किया जहां मुझे प्रति माह 10,000 रुपये मिलते थे. 

गोरे बताते हैं कि इस साल फरवरी में, मेरे पिता का निधन हो गया था. मेरी मां और एक 50 वर्षीय भाई जो फिजिकली चैलेंज्ड है, दोनों की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई. अपने पिता की मौत के बाद, गोरे फरवरी में घर चले गए. लेकिन अपने शिक्षण कार्य पर वापस नहीं जा सके क्योंकि COVID-19 संक्रमण को देखते हुए मार्च के अंत में लॉकडाउन लगा दिया गया था. 

उन्होंने कहा कि फरवरी में अपने गांव वापस आया था अब क्योंकि मेरी नौकरी संविदा पर थी, इसलिए कॉलेज से आय भी रुक गई. कोई आय नहीं होने के कारण, हमारे लिए घर चलान मुश्किल था. इसलिए मेरे सामने खेत मजदूर के रूप में काम करना मजबूरी बन गई. 

गोरे अब काम के लिए लंबी दूरी की यात्रा करते हैं. उन्होंने बताया कि अगर पूरा दिन काम करते हैं तो वो लगभग 400 रुपये डेली कमा लेते हैं. गोरे कोल्हापुर में अपने छात्र दिनों को याद करते हैं, जहां अपने स्नातकोत्तर के बाद, वे अपने परिवार का समर्थन करने के लिए एक एटीएम केंद्र में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करते थे. 

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गोरे ‘फेसाती’ शीर्षक से अपना नॉवेल लिखा था. इसमें ऐसे एक युवा की कहानी है, जो सभी बाधाओं को पार करके किसी तरह अपनी शिक्षा पूरी करता है. इस किताब में किसानों की दुर्दशा को भी दर्शाया गया है. उन्होंने बताया कि मैंने 2014 में उपन्यास का पहला ड्राफ्ट पूरा किया था. मैं उस समय अपने गांव में रहता था, तब से मैंने व्यक्तिगत अनुभव प्राप्त किए. किताब के ड्राफ्ट को पूरा करने में मुझे लगभग 18 महीने लगे. मुझे खुशी है कि उपन्यास को अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी. 

इस बीच, गोर की दुर्दशा से प्रभावित होकर, महाराष्ट्र के मंत्री विश्वजीत कदम, जो भारती विद्यापीठ का प्रबंधन भी करते हैं, ने कहा कि उन्होंने पुणे स्थित शैक्षणिक संस्थानों के समूह से उनकी नौकरी की पेशकश की है. मंत्री ने कहा कि उन्होंने गोरे से बात की और लेखक को यह भी आश्वासन दिया कि उनकी साहित्यिक प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाएगा. 

 

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