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मच्छर के काटने से होता है मलेरिया, जानें कैसे पड़ा ये नाम

जानें, मलेरिया क्या है, कैसे होता है, इसके लक्षण और इससे जुड़ी अन्य विशेष जानकारियां जो आपको शायद पता न हों.

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मच्छर के काटने से होता है मलेरिया
मच्छर के काटने से होता है मलेरिया

कोरोना से बहुत पहले से दुनिया के तमाम देश मलेरिया के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. कोरोना ने जहां एक तरफ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है, लाखों जानें गई हैं. वैज्ञानिक कोरोना की दवाएं और वैक्सीन बनाने में जुटे हैं. वहीं मलेरिया से भी पूरे विश्व में हर साल लाखों लोग मरते हैं. ये बीमारी मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से होती है. 

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जानें मलेरिया की बेसिक जानकारी

मलेरिया मादा मच्छर एनाफिलीज के काटने से फैलता है. इस मच्छर में प्लास्मोडियम नाम का परजीवी (प्रोटोजोआ) पाया जाता है जिसके कारण मच्छर के काटने से ये रक्त में कई गुणा बढ़ता है और फिर इंसान के शरीर को बीमार कर देता है. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को बुखार, कंपकंपी लगना, पसीना आना, तेज सिरदर्द, शरीर में टूटन के साथ जी मिचलाने और उल्टी होने तक के लक्षण आते हैं. इसमें रोगी को बार-बार बुखार आता है. लेकिन ये लक्षण आने के बावजूद इसमें मरीज को प्रोटोजोआ का पता लगाना बहुत जरूरी करता है. मादा एनाफिलीज में सिर्फ एक नहीं बल्कि करीब आठ तरह के प्रोटोजोआ होते हैं.

ये हैं मुख्य परजीवी (प्रोटोजोआ), जिनके कारण होता है मलेरिया

प्लास्मोडियम फैल्सीपेरम (P. Falciparum): ये परजीवी बेहद खतरनाक बुखार के लक्षण देता है, बुखार इतना खतरनाक होता है कि कई बार मरीज की इससे मृत्यु का खतरा भी बना रहता है. कई बार रोगी में सन्नपात (अनकॉन्श‍िएस नेस) की स्थिति आ जाती है. वो क्या बोल रहा है, ये भी उसे पता नहीं चलता. इसके कारण बहुत तेज ठंड लगती है और सिरदर्द और उल्टियां भी होती हैं. 

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ये परजीवी क्वाडीटियन मलेरिया उत्पन्न करता है जो अक्सर दिन के समय में आक्रमण करता है. मैलिंग्नेट टर्शियन मलेरिया में 48 घंटों के बाद प्रभाव देता है. इसमें व्यक्ति की जान भी जा सकती है.

प्लास्मोडियम वाइवैक्स (P. Vivax): आमतौर पर लोगों को इसी परजीवी के कारण मलेरिया बुखार के लक्षण आते हैं. वाईवैक्स परजीवी ज्यादातर दिन के समय आता है. यह बिनाइन टर्शियन मलेरिया उत्पन्न करता है जो हर तीसरे दिन अर्थात 48 घंटों के बाद प्रभाव प्रकट करता है. इसमें भी कमर, सिर, हाथ, पैरों में दर्द, भूख ना लगना, कंपकपी के साथ तेज बुखार आने के लक्षण होते हैं.

प्लास्मोडियम ओवेल (P. Ovale): यह परजीवी भी बिनाइन टर्शियन मलेरिया उत्पन्न करता है.

प्लास्मोडियम मलेरी (P. malariae): इस प्रोटोजोआ से क्वार्टन मलेरिया होता है, इसमें मरीज को हर चौथे दिन बुखार आता है. मतलब 72 घंटे में सिर्फ एक बार बुखार आता है. जब किसी व्यक्ति को ये रोग होता है तो उसके यूरिन से प्रोटीन जाने लगता है जिसके कारण शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है और सूजन आने लगती है.

प्लास्मोडियम नोलेसी ( P. knowlesi): यह आमतौर पर दक्षिणपूर्व एशिया में पाया जाने वाला एक प्राइमेट मलेरिया परजीवी है. इसमें भी ठंड लगकर बुखार आता है.

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ये है इसका रोचक इतिहास

मलेरिया इटालियन भाषा के शब्द माला एरिया से निकला है, इसका हिंदी भावार्थ बुरी हवा है. इस बीमारी का सबसे पुराना वर्णन चीन (2700 ईसा पूर्व) से मिलता है जहां इसे दलदली बुखार (Marsh Fever) भी कहा जाता था. फिर साल 1880 में मलेरिया का सबसे पहला अध्ययन चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरिन वैज्ञानिक ने किया.

ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान

- तेज ठंड लगकर बुखार आना
- बुखार उतरने पर पसीने का आना
- पेट की दिक्कत और उल्ट‍ियां
- बेहोशी का होना, खून की कमी, एनीमिया
- लो ब्लड शुगर
- थकान, सरदर्द, मसल्स पेन

कुछ ये होता है मलेरिया फैलने की प्रक्रिया

जब किसी हेल्दी पर्सन को मादा एनाफिलीज मच्छर काटता है तो उसके खून में मलेरिया के जर्म्स चले जाते हैं. मलेरिया का कोई भी प्रोटोजोआ खून में पहुंचते ही हीमोजॅाइन टॅाक्सिन बनाने लगता है. ये टॉक्सिन एक तरह का जहर है जो मानव शरीर के लिए काफी खतरनाक है. जैसे ही प्रोटोजोआ लिवर में पहुंचता है ये कई गुना तेजी से बढ़ने लगता है. इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो जाती है कि ये इंसान के रेड ब्लड सेल (लाल रक्त कोशिका) में भी घुस जाते हैं. ये एक सेल को नष्ट करके दूसरे में पहुंचते हैं, एक के बाद एक रेड ब्लड सेल पर ये हमला करते हैं. इस वजह से इंसान अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता से इस परजीवी से लड़ नहीं पाता. मनुष्य में मलेरिया के लक्षण तुरंत नहीं आते, ये छह से आठ दिन बाद लक्षण देता है. 

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