बचपन में गांव-मोहल्ले की गलियों में गिल्ली डंडा खेलते हुए अक्सर बच्चों को देखा होगा हालांकि अब तो गिल्ली डंडा खेलने का चलन बहुत कम हो गया है. अब ना के बराबर ही बच्चे गिल्ली डंडा खेलते हुए नजर आते हैं लेकिन अब मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में गिल्ली डंडा छात्रों को पढ़ाया जाएगा
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के फिज़िकल एजुकेशन की बोर्ड ऑफ स्टडीज़ की बैठक में इस पर फैसला हुआ है. शारीरिक शिक्षा में अब गिल्ली-डंडा भी शामिल हो गया है. नई शिक्षा नीति के तहत चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कालेजों में संचालित बीए शारीरिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तय हो गया है. कला संकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी का कहना है कि पहली बार पाठ्यक्रम में परंपरागत खेलों को भी शामिल किया है. इनमें छात्र गिल्ली-डंडा जैसे खेलों के विषय में पढ़ेंगे और उनका अभ्यास भी करेंगे.
यही नहीं अब हस्तिनापुर सेंक्चुरी को भी भूगोल के छात्र पढ़ सकेंगे. देश विदेश के भूगोल के साथ पहली बार स्थानीय भूगोल को भी चौधरी चरण सिंह विवि के छात्र पढ़ेंगे. विश्वविद्यालय के सिलेबस में पहली बार हस्तिनापुर सेंक्चुरी को भी शामिल किया गया है. जिसमें छात्रों को एक केस स्टडीज के तौर पर इसे समझाया जाएगा.
बोर्ड आफ स्टडीज की बैठक में बीए भूगोल का पाठ्यक्रम भी तय कर लिया गया है. स्थानीय स्तर पर विश्वविद्यालय 30 फीसदी सिलेबस में बदलाव कर सकते हैं. इसी के तहत चौधरी चरण सिंह विवि की ओर से कैंपस और कॉलेज दोनों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम तय किया गया है.
इससे पहले मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय द्वारा सीएम योगी के हठयोग बाबा रामदेव ओशो और चौधरी चरण सिंह की किताबों को स्नातक स्तर पर पढ़ाए जाने का निर्णय लिया गया था. कई छात्र छात्राएं तो ऐसे हैं जिन्होंने गिल्ली डंडे जैसे खेल के बारे में सुना तक नहीं है. ऐसे में पाठ्यक्रम में इस बदलाव उन्हें क्षेत्रीय खेलों के बारे में भी जानने का मौका मिलेगा.