रोहित (बदला हुआ नाम) भोपाल के एक नामी कॉलेज से एमए की पढ़ाई कर रहे हैं. एक रात वो इंटरनेट पर कुछ सर्च कर रहे थे. तभी उनको पोर्न पॉडकास्ट का पता चला. बस उसी दिन से उन्होंने पोर्न पॉडकास्ट सुनना शुरू कर दिया. धीरे धीरे ये पॉडकास्ट जैसे दिलोदिमाग पर छाने लगे. रोहित कॉलेज में भी कानों से हेडफोन नहीं हटाते थे. सुबह जगने से लेकर देर रात सोने तक पोर्न ऑडियो जैसे उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया. जब उनके रोजमर्रा के काम और कॉलेज की पढ़ाई पर असर पड़ने लगा तो उन्होंने ये लत छोड़ने की सोची. लेकिन चाहकर भी वो ये आदत छोड़ नहीं पा रहे थे. अगर दो मिनट भी ऑडियो न सुनें तो बेचैनी और घबराहट महसूस होने लगती.धीरे-धीरे ये आदत उनके लिए समस्या बन गई. वो भूख न लगना, रोना, अनिद्रा या सोते से अचानक जाग जाना जैसे लक्षणों का शिकार होने लगे.
रोहित का इलाज कर रहे मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने aajtak.in से बताया कि रोहित की तरह ही उनके पास एक और मामला भी है. वो कहते हैं कि पोर्न एडिक्शन की समस्या काफी पुरानी है, लेकिन ये मेरे सामने एकदम नई स्टडी है. डॉ त्रिवेदी ने बताया कि ये दोनों ही छात्र 19-20 साल के हैं. इन दोनों के प्राथमिक निदान में ही सामने आया है कि ये दोनों पोर्न ऑडियो के आदी होने के कारण तनाव से जूझ रहे हैं.
ये लत इतनी गंभीर है कि यह उनके सामान्य जीवन को प्रभावित कर रही है और उन्हें अवसाद और चिंता में धकेल रही है. ये राज्य के विभिन्न शहरों से हैं. मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने आगे बताया कि मैंने अपने लंबे करियर में अब तक पोर्न ऑडियो एडिक्शन का एक भी मामला नहीं देखा था. न ही साइंटिफिक लिट्रेचर में ऐसी स्थिति के बारे में पढ़ा है.
डॉ सत्यकांत ने बताया कि तनाव से जूझ रहे इन टीनेजर्स को हमने सबसे पहले काउंसिलिंग देना शुरू किया. उन्हें कॉग्निटिव बिहैविरल थेरेपी के जरिये जीवन को आसान बनाने के तरीकों को समझाया जा रहा है. इस एडिक्शन के साथ साथ एंजाइटी के लक्षणों को देखते हुए दवाएं भी दी जा रही हैं.
क्यों हो जाता है पोर्न ऑडियो का एडिक्शन
एम्स के मनोचिकित्कस डॉ अनिल शेखावत कहते हैं कि इंसान के मस्तिष्क में एक रिवार्ड सिस्टम एरिया होता है, जो रूटीन एक्टिविटी में, चाहे वो कुछ अच्छा खाना-पीना हो, शॉपिंग हो, सेक्स हो, सभी में खुशी देता है. ये रिवार्ड सिस्टम ह्यूमन सर्वाइवर के लिए जरूरी होता है. इसमें हमें खुशी या प्लेजर मिलता है. किसी को शॉपिंग करके तो किसी को टीवी देखकर खुशी मिलती है. किसी को ड्राइविंग तो किसी को साइकिलिंग-योगा-जिम से ये प्लेजर मिलता है. लेकिन इन सबसे अलग इंसानी मनोविज्ञान में इंसान को जो हाइएस्ट प्लेजर देता है, उसे वो बार बार करना चाहता है.
उस एक्टिविटी को करने में उसके दिमाग में न्यूरो केमिकल डोपामिन रिलीज होता है. जो शरीर को चुस्ती-फुर्ती और खुशी का अहसास देता है. रोजमर्रा के छोटे छोटे कामों में लो मात्रा में ये रिलीज होता है. लेकिन जब आप कोई नशा करते हैं या सेक्सुअल एक्टिविटी करते हैं तो डोपामिन ज्यादा रिलीज होता है और इससे एक्स्ट्रीम प्लेजर होता है. लेकिन अगर आप इसे एडिक्शन बना लेते हैं तो जो भी एक्टिविटी होती हैं, उसके अराउंड घूमने लगती है. ठीक जैसे शराब के लोग आदी हो जाते हैं या कई लोग जिमिंग या कुछ लोग पोर्न के आदी हो जाते हैं.
अभी चूंकि सेक्स एडिक्शन को साइकेट्री की टेक्स्ट बुक में डाला नहीं गया है, इसलिए पोर्न ऑडियो-वीडियो या सेक्स या कोई भी नॉर्मल माने जाने वाले बिहैवियर के एडिक्ट होने पर उनके इलाज की व्यवस्था नहीं है. लेकिन फिर भी डॉक्टर ऐसे मरीज आने पर काउंसिलिंग आदि से ऐसे एडिक्शन से बाहर निकलने में मदद करते हैं. डॉ शेखावत कहते हैं कि अब तक हुई तमाम स्टडी में ये बात सामने आई है कि जो लोग पहले से तनाव का शिकार हैं. उनके निजी जीवन में कई समस्याएं हैं, वो ही इस तरह के एडिक्शन की ओर ज्यादा खिंचते हैं.
इस एडिक्शन से कैसे उबरें
डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने कहा कि स्कूल और कॉलेज के सिलेबस में सेक्स एजुकेशन को शामिल करने की जरूरत है. वर्तमान समय में युवाओं के लिए अश्लील सामग्री ही यौन शिक्षा का एकमात्र स्रोत है. ऑडियो प्लेटफॉर्म या किसी वेबसाइट पर प्रतिबंध लगाना समस्या का हल नहीं है. इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी किशोर पीढ़ी के साथ संवाद बढ़ाएं, उनसे हर तरह की समस्याओं पर बात करें. उनकी तरफ से जब भी बात करने का ऑफर मिले, उसे टालें नहीं बल्कि एक अवसर समझकर बात करें. बच्चों को किसी तरह की बात के लिए डांटने या नैतिक शिक्षा देने के बजाय उसे अपने उदाहरणों और अनुभवों से समझाना आसान रहता है.