जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू का यूं तो विवादों से पुराना रिश्ता है लेकिन इस बार एक कोर्स के स्ट्रक्चर को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है. दरअसल अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले 2 साल के कोर्स के छात्रों के लिए एक नए पेपर को अनुमति दी गई है.
17 अगस्त को यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल की एक बैठक हुई जिसमें इस विषय के प्रारूप पर अंतिम मुहर लगा दी गई. दोहरी डिग्री वाले जेएनयू के प्रोग्राम जिसमें इंजीनयरिंग के छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय संबंध यानि इंटरनेशनल रिलेशन पढाया जाता है, इसी में "काउंटर टेररिज्म यानि आतंकवाद विरोध" का एक नया विषय रखा गया है. ये पेपर यूं तो ऐच्छिक है, लेकिन इसमें इंजीनयरिंग के छात्रों को ये पढ़ाया जाएगा कि आतंकवाद से कैसे निपटा जाए और इसमें विश्व शक्तियों की भूमिका क्या हो? यहां तक बात तो ठीक थी लेकिन इस पेपर में जो विषय वस्तु रखी गई है.
असल में उसको लेकर विवाद शुरू हो गया है. इस विषय में धार्मिक आतंकवाद के मसले पर ये कहा गया है कि "इस्लामिक जिहादी आतंकवाद" ही "कट्टरवादी धार्मिक आतंकवाद" का एकमात्र रूप है. उन्हें ऐतिहासिक तौर पर कम्यूनिस्ट पृष्ठभूमि वाले देश मसलन चीन और सोवियत यूनियन प्रश्रय देते रहे हैं और इन्हीं के प्रभाव की वज़ह से कई कट्टर इस्लामिक देश प्रभावित भी हुए हैं.
इस विषय के प्रस्ताव को जब एकेडमिक काउंसिल के सामने लाया गया तो वहां भी कई सदस्यों ने इसका विरोध किया बावजूद इसके काउंसिल ने नए विषय पर अपनी मुहर लगा दी. आजतक ने इस कोर्स की रुपरेखा तैयार करने वाले प्रोफेसर अरविंद कुमार से बात की जो कि स्कूल ऑफ इंटरनेशन स्टडीज़ के प्रोफेसर और चेयरपर्सन भी हैं.
अरविंद कुमार ने इस कोर्स की जरुरत को लेकर आजतक के सवालों पर साफ-साफ कहा कि "ये हमारे उस कोर्स का हिस्सा है जहां बी-टेक करने के बाद छात्र अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बारे में पढ़ने आते हैं. इसलिए हम ऐसे विषय का चुनाव करते हैं जिसका अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ तकनीक से भी संबंध हो.
भारत के नजरिये से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एक महत्वपूर्ण विषय है. ऐसे समय में जब विश्व के कई देश भारत की सुरक्षा जरुरतों पर उतना ध्यान नहीं दे रहे जितना जरूरी है. ऐसे में ये विषय और अहम हो जाता है." लेकिन साथ ही जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि क्या आतंकवाद के विषय पर एक धर्म को ही केंद्र में रखना जरुरी है, तो उन्होंने जवाब दिया कि, "जिहाद एक वैश्विक चुनौती है. ऐसे समय में जब अफगानिस्तान पर तालिबान ने कब्जा कर लिया है तब इससे समसामयिक विषय और कोई नहीं हो सकता था. जिहाद को लेकर अलग-अलग देशों को आपसी सहयोग की जरुरत है, खास तौर पर दक्षिण एशिया के जियोपॉलिटिक्स पर इसका काफी प्रभाव है जो लोग इसको लेकर विवाद कर रहे हैं उन्हें ये भी देखना चाहिए कि इस विषय का हिस्सा साइबर और आर्थिक आतंकवाद को भी बनाया गया है."
सवाल इस पेपर की रुपरेखा पर तो है ही लेकिन जिस तरीके से एकेडमिक काउंसिल की मीटिंग में इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी गई उस पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. जेएनयू शिक्षक संघ ने तो यहां तक आरोप लगाया कि जिस स्कूल ऑफ इंजरनेशनल स्टडीज़ में इस विषय की रुपरेखा तैयार हुई उसके डीन को ऐसी कोई जानकारी ही नहीं थी साथ ही इंजीनयरिंग के डीन ये कह रहे हैं कि चूंकि ये विषय उनके क्षेत्र से बाहर का है इसलिए उन्होंने इसे मंजूरी दी है.
जेएनयू शिक्षक संघ की सचिव मौसमी बसु (जो कि स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में पढ़ाती भी हैं) ने आजतक से खास बातचीत में बताया कि "इस तरह धर्म को आंतकवाद से जोड़ा जाएगा तो राह चलते लोगों और एकडेमिशयन में क्या अंतर होगा. क्या म्यांमार और श्रीलंका में जो चल रहा है क्या हम उसे बौद्ध आतंकवाद कहते हैं? नहीं ना, हम आतंकवाद के मुद्दे को नए विषय में शामिल कर सकते हैं लेकिन ऐसा करने से पहले चर्चा होनी जरूरी है. इंजीनयरिंग के छात्रों को अगर अंतर्राष्ट्रीय संबंध पढ़ा जा रहा है तो उसमें विज्ञान से जुड़े टॉपिक जैसे वैक्सीनेशन और जेनेटिक इंजीनयरिंग जैसों को शामिल किया जा सकता है, तो ऐसे में इस विषय का चुनाव सवाल खड़ा करता है."
हालांकि अकादमिक मसलों पर यूनिवर्सिटी में फैसले लेने वाली कमेटी एकेडमिक काउंसिल ने नए विषय पर अपनी मुहर लगा दी है. लेकिन आने वाले समय में यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च बॉडी एग्जक्यूटिव काउंसिल की मुहर भी इसपर जरुरी होगी. अगर वहां भी इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो 20 सितंबर से शुरू होने वाले नए सत्र में छात्रों को इसे पढ़ाया जा सकेगा.