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बम से भी हुआ था गांधी पर हमला, हत्यारों की 7 कोश‍िशें हुई थीं फेल

बम से भी हुआ था महात्मा गांधी पर हमला, हत्यारों की 7 कोश‍िशें हुई थीं फेल
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आज 30 जनवरी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है. आज ही के दिन नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या करके मानवता के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ा था. दुनिया को अंहिसा का पाठ पढ़ाने वाले बापू की हत्या की पहले भी सात बार कोश‍िशें की गई थीं. लेकिन  पहले 7 बार ये कोश‍िशें नाकाम रहीं. आइए जानें महात्मा गांधी की हत्या के इन प्रयासों के बारे में.
बम से भी हुआ था महात्मा गांधी पर हमला, हत्यारों की 7 कोश‍िशें हुई थीं फेल
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गांधीजी के भारत में आने के बाद पहली बार उनकी हत्या का प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया. मौका था पूना में गांधीजी एक सभा का. वो सभा को संबोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था. गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये.
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हत्या का ये प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था. बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू की तस्वीरें बनी थीं, ऐसा पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है. उस वक्त साल 1934 में तो पाकिस्तान नाम तक का कोई जिक्र नहीं था, फिर 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहां से पैदा होता.
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गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में हुआ. जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गए थे.तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा. पहले दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे. इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया. मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया. शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ लपका.
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तब पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड़ लिया. पुलिस-रिकॉर्ड में नाथूराम का नाम नहीं है लेकिन मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जांच करने वाले कपूर-कमीशन के सामने नाथूराम का नाम अपने बयान में दिया था, इनमें से भीलारे गुरुजी अभी जिन्दा हैं.
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गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी वर्ष सितम्बर में वर्धा में किया गया था. तब गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे.
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गांधीजी बम्बई न जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहुंचा. इसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था. इस गुट के पास से भी छुरा मिला जो उनकी मोटर टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था. बचाव पक्ष ने बयान में कहा था.
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गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया. तब गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बड़ा पत्थर रखा गया था. उस रात भी ड्राइवर की सूझ-बूझ से गांधीजी की जान बच गई.
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30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने कहा कि परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुंह से सकुशल वापस आया हूं. उन्होंने ये भी कहा कि मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाया, किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया.
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तब नाथूराम गोडसे पूना से अग्रणी नाम की मराठी पत्रिका निकालता था. एक इंटरव्यू में गांधीजी ने 125 वर्ष जीने की इच्छा जताई थी. इसी पर 'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा 'पर जीने कौन देगा?'
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इससे साफ है कि वो गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत था. 'अग्रणी' का ये अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है. फिर 20 जनवरी, 1948 को मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर प्रार्थनागसभा में बम फेंका. फिर 30 जनवरी, 1948 का वो मनहूस दिन भी आया जब नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी.

Source: http://www.hindi.mkgandhi.org/g_hatya.htm

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