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मां बनाती थी देसी दारू, लोग मंगाते थे नमकीन, फिर ऐसे बने IAS

मां बनाती थी देसी दारू, लोग मंगाते थे नमकीन, फिर ऐसे बने IAS
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ये कहानी है आदिवासी भील समुदाय के उस युवा की, जिसने तमाम विसंगतियों को हराकर जीत हासिल की. ये हैं UPSC 2013 बैच के आईएएस अफसर डॉ राजेंद्र भरुड़, जो आज  मिसाल बनकर लाखों युवाओं के लिए नजीर हैं. छोटी उम्र में पिता के देहांत के बाद मां ने देसी दारू बनाकर उन्हें पढ़ाया-लिखाया. उन्होंने भी दिन रात की मेहनत से वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसका सपना लाखों युवा देखते हैं. आइए जानते हैं उनकी पूरी कहानी.
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राजेंद्र भरुड़ का जन्म 7 जनवरी 1988 को महाराष्ट्र के धुले जि‍ले के आदिवासी भील समुदाय में हुआ था. जब वो मां के पेट में थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था. लोगों ने मां से कहा कि वो गर्भपात करा ले क्योंकि पहले से ही उन पर तीन बच्चों को पालने का पूरा भार आ गया था. लेकिन मां ने ऐसा करने से इनकार कर दिया.
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डॉ राजेंद्र की मां बताती हैं कि जब वो 2-3 साल का था तो उन्होंने देसी दारू बनानी शुरू की. मैं दारू बनाकर बेचती थी. ये थोड़ा बड़ा हुआ तो वहीं बैठकर पढ़ता था. लोग इससे चखना (नमकीन वगैरह) लाने को कहते थे. मैं मना करती थी कि वो नहीं जाएगा, वो अभी पढ़ रहा है.
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मां ने कहा कि उस समय बहुत खराब पर‍िस्थ‍ितियां थीं. कई बार तो कुछ खाने को भी नहीं मिलता था. सूखी रोटी खा खाकर दिन निकाले हैं. एक झोपड़ी में रहकर किसी तरह कम कमाई में खर्च चलता था. लेकिन मेरा बेटा दिन में 24 घंटे पढ़ाई करता था. उसी शराब के पैसे से उसकी किताबें आती थीं.
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अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि बचपन में कई बार कुछ शराबी लोग उनके मुंह में शराब की कुछ बूंदे डाल देते थे. बार-बार ऐसा होता रहा तो उन्हें इसकी आदत सी हो गई थी. अक्सर उन्हें सर्दी जुकाम आदि होने पर दवा की जगह शराब ही पिलाई जाती थी. बड़ा हुआ तो सबसे ज्यादा मुझे लोगों का ये ताना चुभता था जब वो कहते थे कि शराब बेचने वाले का बेटा शराब ही बेचेगा. मैंने तब ही ठाना था कि एक दिन इस बात को सिरे से झुठला दूंगा.





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वो बताते हैं कि चूंकि काम शराब का था तो पीने वालों का रवैया भी वैसा ही था. वो लोग अक्सर मुझसे कहते कि मुझे स्नैक्स लाकर दो, मैं उस समय बच्चा था तो उनकी बात माननी पड़ती थी. लेकिन अक्सर लोग मुझे इस काम के बदले कुछ न कुछ पैसे दे देते थे. उन्होंने इस पैसे से अपने लिए किताबें खरीदीं और पढ़ाई नहीं रुकने दी.
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इसी मेहनत और लगन का नतीजा था कि उनके 10वीं में 95 फीसदी और 12वीं में 90 फीसदी नंबर आए. इसके बाद साल 2006 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी तो यहां भी सीट मिल गई. उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई मुंबई के सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज से की जहां उन्हें बेस्ट स्टूडेंट के अवॉर्ड से नवाजा गया.
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डॉक्टरी पूरी करने के बाद उनके मन में समाज के लिए और भी बेहतर कर पाने का सपना जागा तो उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की. यूपीएससी परीक्षा में पहले उन्हें आईपीएस कैडर मिला फिर अगले प्रयास में 2013 में उन्हें आईएएस कैडर मिल गया. वर्तमान में वो महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले के डिस्ट्र‍िक्ट कलेक्टर हैं. आईएएस बनने के बाद उन्होंने अपनी मां को समर्पित एक किताब भी लिखी है. अब उनके परिवार में उनकी मां और पत्नी के अलावा एक बच्चा है. डॉ राजेंद्र कहते हैं कि मुझे ऐसा लगता है कि आदमी अगर अपनी परिस्थितियों को ज्यादा न सोचते हुए कड़ी मेहनत से प्रयास करता है तो वो कुछ भी हासिल कर सकता है.

All Photo: FACEBOOK
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