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एजुकेशन

जांबाज जवानों से कम नहीं थे आजादी के दीवाने ये भारतीय वैज्ञानिक

जांबाज जवानों से कम नहीं थे आजादी के दीवाने ये भारतीय वैज्ञानिक
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आज भारत का स्वतंत्रता दिवस है. करीब दो शताब्दियों के संघर्ष के बाद हिंदुस्तान को ब्रिटिश हुकूमत  से आजादी मिली थी. आजादी की लड़ाई में भारतीयों ने सिर्फ बंदूक से ही नहीं कलम से भी संघर्ष किया था. देश के हर वर्ग से जुड़े लोग आजादी को हासिल करने के लिए प्रयासरत थे. स्वतंत्रता के संघर्ष में मजदूर, किसान, छात्र, नेता, शिक्षक और जवान तो शामिल थे ही लेकिन उस समय के वैज्ञानिकों के मन में भी आजादी की लौ सुलग रही थी. इनमें से कई ने अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर किया तो कई ने देश सेवा के अप्रतिम उदाहरण पेश किए थे. विज्ञान लेखक देवेन मेवाड़ी कहते हैं कि हमारी पीढ़ियों को हमारे वैज्ञानिकों से दूर रखा गया है. उनके बारे में सिलेबस में बहुत कम जानकारी होती है, जबकि इनके योगदान और कहानियां काफी प्रेरणादायक हैं. आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ वैज्ञानिकों के देशप्रेम की कहानियों के बारे में-
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चंद्रशेखर वेंकटरमन

चंद्रशेखर वेंकटमरमन भारत के महान भौतिक विज्ञानी थे. रमन ने प्रकाश की गति और उस पर दूसरी चीजों के पड़ने वाले प्रभाव का गहन अध्ययन किया जिसे रमन प्रभाव कहा जाता है. इस खोज के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था. नोबेल पुरस्कार को लेने के दौरान कैसे वह अपने गरीब देश को याद कर भरी सभा में रोने लगे थे, इसका विवरण उन्होंने खुद दिया है. वेंकटरमन स्वीडन के स्टॉकहोम में नोबेल पुरस्कार लेने गए थे. यह पुरस्कार उन्हें वहां के राजा गुस्ताव ने दिया था. जिस सभा में यह पुरस्कार दिया जाना था, वहां सूट और टाई पहने हुए गणमान्य मौजूद थे. वेंकटरमन अपनी चिर परिचित वेशभूषा सिर में पगड़ी और बंद गले के कोट में थे. उन्होंने सभा में चारों ओर देखा तो उन्हें अपनी वेशभूषा का या अपनी मिट्टी से जुड़ा कोई भी शख्स नहीं दिखाई दिया. यह सोचकर वह थोड़ा भावुक हो गए. इसके बाद उन्होंने ऊपर की ओर देखा तो उन्हें ब्रिटेन का झंडा यूनियन जैक दिखाई दिया. उन्होंने सोचा कि मेरे गरीब देश का कोई नागरिक तो छोड़िये मैं अपने देश के झंडे के नीचे भी यह सम्मान नहीं ले सका. यह सोचते ही उनकी आंखों से आंसू बहने लगे. रमन कम उम्र में ही एनी बेसेंट के भाषणों और लेखों से दो-चार हो चुके थे और उन पर बेसेंट के भारत प्रेम का प्रभाव भी पड़ा. जर्मनी में 1927 में जब भौतिकी विश्वकोश लिखा जा रहा था तो रमन से वाद्ययंत्रों की भौतिकी पर एक लेख लिखवाया गया. इस भौतिकी कोश में रमन अकेले ही गैर-जर्मन लेखक थे. रमन को भारत रत्न और लेनिन शांति पुरस्कार भी मिला है.
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आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय

भारत के ही एक और महान वैज्ञानिक थे आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय. प्रफुल्ल चंद्र राय भारत के महान रासायनिक शास्त्री थे. प्रफुल्ल महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे और उनकी तरह सादा-जीवन उच्च विचार के आदर्शों पर चलते थे. उनकी मेहनत, निष्ठा और देशप्रेम से महात्मा गांधी भी काफी प्रभावित थे. वह अक्सर युवाओं और छात्रों को उनका उदाहरण दिया करते थे. गांधी उनकी वेशभूषा देखकर कहते थे कि ऐसे सादगी भरे इंसान को देखकर लगता ही नहीं कि यह इतना महान वैज्ञानिक होगा. आचार्य प्रफुल्ल के मन में आजादी की लौ हमेशा जलती रहती थी. उन्होंने देश की आजादी को हमेशा विज्ञान से ऊपर रखा. उनका मानना था कि विज्ञान मानव जगत की सेवा के लिए है और इसकी राह राजनीतिक स्वतंत्रता से होकर जाती है, वरना विज्ञान का फायदा देशवासियों को न मिलकर उन पर राज करने वालों को मिलेगा. वह अपने छात्रों से अक्सर कहते थे कि विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है लेकिन स्वराज नहीं. अत्यंत मेधावी और एडिनबरा यूनिवर्सिटी से पढ़े राय को शिक्षा सेवा में अंग्रेजों के भेदभाव के कारण जगह नहीं दी गई. प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी इन्हें काफी कम वेतन मिलता था. उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो अंग्रेजों ने ताना दिया कि आप इतने मेधावी हैं तो अपना शोध क्यों नहीं करते. इसके बाद उन्होंने अपने कमरे में ही प्रयोगशाला बना डाली जिसे आज आज बंगाल केमिकल के नाम से जाना जाता है. एक ही कमरे में उन्होंने अपना जीवन बिता दिया और विज्ञान की सेवा के दौरान उन्हें शादी करने का समय भी नहीं मिला. वह रसायन के साथ ही इतिहास भी के अध्येता थे और उन्होंने हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री नामक विश्व विख्यात किताब लिखी. बंगाल के 1922 के अकाल में उन्होंने चंदा कर तीन लाख रुपये जमा किए थे. उस जमाने में कहा जाता था कि अगर गांधी के पास दो प्रफुल्ल और होते तो स्वराज जल्दी मिल जाता.
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जगदीश चंद्र बसु

जगदीश चंद्र बसु भौतिकी, जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान के गहन अध्येता थे. रेडियो तरंगों के साथ ही उनकी पेड़-पौधों और भौतिकी के क्षेत्र में भी कई मौलिक खोजें हैं. बताना जरूरी है कि बसु पेटेंट सिस्टम के खिलाफ रहे ताकि वैज्ञानिक प्रयोग आम जन के काम आ सकें. जगदीश चंद्र बसु का नाम देश के सर्वाधिक चर्चित वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है. उन्होंने ही पहली बार दुनिया को यह बताया था कि पेड़-पौधों में भी जान होती है और वे भी सुख-दुख का अनुभव कर सकते हैं. जगदीश चंद्र बसु उच्च शिक्षित बंगाली परिवार से आते थे. उनके पिता अंग्रेजी शासनकाल में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और वह अंग्रेजी भाषा का महत्व जानते थे. लेकिन उन्होंने तय किया कि जगदीश की शुरुआती पढ़ाई बांग्ला भाषा में ही होनी चाहिए. अत्यंत मेधावी होने के बावजूद वह सिविल सर्विस में इसलिए नहीं गए कि उन्हें अंग्रेजों के आदेशों को मानकर अपने ही देशवासियों पर ज्यादती करनी पड़ेगी. इसके बजाए उन्होंने उच्च शिक्षा सेवा में जाने की राह चुनी. उस समय उच्च शिक्षा सेवा में एक ही पद पर भारतीयों को अंग्रेजों की तुलना में एक तिहाई वेतन मिलता था. बसु ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और अपने अधिकारियों को इस बारे में लिखा. लोगों ने उनसे कहा कि कुछ बदलाव नहीं होगा. बसु ने कम वेतन लेने से इनकार कर दिया. कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि जिद छोड़ दें. लेकिन बसु ने इस सिस्टम में बदलाव लाने की ठान ली थी. उन्हें बिना वेतन काम करते हुए तीन साल हो गए थे. आखिरकार अंग्रेजों को उनकी न्यायोचित जिद के आगे झुकना पड़ा और उनकी मांगें मान ली गई. उन्हें तीनों साल का पूरा वेतन एक साथ दिया गया.
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मेघनाद साहा

मेघनाद साहा एक खगोलशास्त्री थे और उन्होंने साहा समीकरण का सिद्धांत दिया था जो तारों की गति, उम्र, उनमें रासायनिक प्रक्रियाओं और दूसरी गणनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ. मेघनाथ साहा काफी गरीब पृष्ठभूमि से आते थे. अपनी प्राइमरी की पढ़ाई के लिए उन्हें घर से दूर जाना पड़ा. उनके पास उस जमाने में भी रहने, खाने और पढ़ाई के पैसे नहीं थे. लेकिन उनके मन में पढ़ाई की ऐसी लगन थी कि वह किसी के घर पर रहकर जानवरों को चारा देते, नहलाते और दूध निकालते. बचे हुए समय में पढ़ाई करते. मेधावी होने की वजह से उन्हें स्कूल में छात्रवृत्ति मिल जाती थी, जिससे उनका पढ़ाई पर खर्च नहीं होता. तब ढाका भारत में हुआ करता था. वह पांचवीं कक्षा में पूरे ढाका जिले में प्रथम आए और उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिल गई. एक दिन उनके स्कूल में गवर्नर वैमफील्ड फुलर का दौरा तय हुआ. सभी विद्यार्थियों को सख्त ताकीद की गई कि कपड़े धोकर, साफ होकर यूनिफॉर्म में आएं. फुलर आया तो उसने देखा कि मेघनाद के पैरों में जूते नहीं हैं. गरीब मेघनाद के जूते न पहनने को गवर्नर का अपमान समझा गया. हकीकत यह थी कि मेघनाद के पास जूते ही नहीं थे. उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया और छात्रवृत्ति भी रोक दी गई. लेकिन हुनर अपना रास्ता तलाश ही लेता है. मेघनाद का तब तक इतना नाम हो चुका था कि उन्हें दूसरे स्कूल ने अपने यहां पढ़ने का न्योता दे दिया और साथ में छात्रवृत्ति भी दी. साहा बाद में सुभाष चंद्र बोस के भी करीब आए.
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अन्नामणि

अन्नामणि एक भौतिक और मौसम वैज्ञानिक थीं. वह केरल के एक संभ्रांत ईसाई परिवार से आती थीं. वह केरल में अछूतों के अधिकारों के लिए चले वायकोम आंदोलन से काफी प्रभावित हुई थीं. उन पर आजादी के आंदोलन का भी काफी प्रभाव था. गांधी से प्रभावित होकर उन्होंने हमेशा खादी के कपड़े ही पहने. वह पढ़ने की इतनी धुनी थीं कि उन्होंने केवल आठ साल में स्कूल की लाइब्रेरी की सभी किताबें पढ़ ली थीं. उनके घर में रिवाज था कि आठवें जन्मदिन पर हीरे के कर्णफूल (Earrings) दिए जाते थे. जब उनके घरवालों ने उनसे इयररिंग्स पसंद करने को कहा तो अन्नामणि ने कहा कि उन्हें यह गिफ्ट नहीं चाहिए. घरवालों ने आश्चर्य के साथ पूछा फिर क्या चाहिए. अन्नामणि ने जवाब दिया कि उन्हें एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका (विश्वकोश) चाहिए. उस जमाने में उनके लिए इसे लंदन से मंगाया गया. आठ साल की उम्र में उन्हें इस विश्वकोश के बारे में जानकारी थी, जो आज भी स्नातक कर चुके कई लोगों को नहीं होती. अन्नामणि ने 12 साल की उम्र में अपने स्कूल की लाइब्रेरी की सभी अंग्रेजी किताबें भी पढ़ ली थीं. बाद में उन्होंने मौसम वैज्ञानिक बनकर देश के लिए 100 से भी ज्यादा उपकरण बनाए जिनसे मौसम की सटीक गणना और अनुमान लगाया जाता है. भारतीय मौसम विज्ञान की आधुनिकता उनकी ही देन है. यही नहीं, अन्नामणि दुनिया की पहली वैज्ञानिक थीं जिन्होंने ओजोन परत की चर्चा की. आज इसी परत को देखकर वायुमंडल में कई तरह के अध्ययन होते हैं.
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