कुछ लोगों की जिंदगी संर्घष से भरी होती है. ऐसी ही जिंदगी है, ग्वालियर के डॉक्टर विक्रम सिंह की. इनकी जिंदगी बचपन से ही संर्घष भरी रही है. लेकिन सभी परेशानियों का सामना करते हुए आज ये जिंदगी के उस मुकाम पर हैं जहां पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं है. आज के समय में ये ग्वालियर के सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर हैं, और लोगों का इलाज कर रहे हैं.
बचपन से ही परेशानियों का किया सामना
9वीं क्लास से ही विक्रम चल नहीं पाते हैं. जिस स्कूल में वो पढ़ते थे एक दिन उस स्कूल के प्रिंसीपल ने उनके पिता को बुलाया. उनसे कहा आप अपने बेटे को यहां से ले जाएं, अब ये यहां नहीं पढ़ सकता. इस बात से उनके पिता बहुत दुखी और परेशान हुए. पूछने पर उनके प्रिंसीपल ने बताया कि वो दौड़ नहीं सकते इसलिए हम इनको अपने स्कूल में नहीं पढ़ा सकते. आप इसे किसी दूसरे स्कूल में एडमिशन करवा दीजिए. लेकिन विक्रम ने हार नहीं मानी और दूसरे स्कूल में पढ़ाई शूरू कर दी. इस घटना से वो इतने आहत हुए कि उन्होंने मन लगाकर पढ़ाई की और आज ग्वालियर के सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर हैं.
आज भी संघर्ष जारी
उनकी लाइफ में आज भी संघर्ष जारी हैं. अपनी बीमारी के चलते वो हॉस्पिटल के अंदर नहीं जा पाते. बाहर कार में बैठ कर ही मरीज का इलाज करते हैं. मरीज अंदर से पर्चा बनवाकर बाहर आते हैं और वहां कार में डॉक्टर विक्रम को दिखाते हैं. बता दें कि सुबह घर से दो लोगों की मदद से कार में बिठाया जाता है और फिर ड्राइवर उन्हें लेकर हॉस्पिटल पहुंचता है. जहां वे हॉस्पिटल के बाहर कार में बैठते हैं और मरीज देखते हैं. वे अपनी रोज की ड्यूटी के दौरान 80 से 100 मरीज देखते हैं.
4 साल तक बीमारी का पता ही नहीं चल पाया
शुरुआत में करीब 4 साल तक डॉ. विक्रम की बीमारी का पता नहीं चल पाया था. करीब छह महीने तक डॉक्टर बोन टीवी की दवाइयां देते रहे. गलत दवाओं और पेन किलर दवाओं के कारण उनकी किडनी पर भी असर हो गया.डॉ. विक्रम को 9वीं क्लास में पता चला कि वो लाइलाज बीमारी जुवेनाइल रुमिटॉयड आर्थराइटिस से पीड़ित हैं. इसकी वजह से वो चल नहीं सकते. पीएमटी की तैयारी करते वक्त कई बार हड्डियों के जोड़ में बहुत दर्द रहता था. ऐसे में उन्होंने पेनकिलर लेकर पढ़ाई की. उन्होंने पहली ही कोशिश में प्रीमेडिकल टेस्ट पास कर लिया.