संसद में दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून पास हुआ तो सबसे पहले विरोध की चिंगारी असम से उठी. सीएए के खिलाफ असम में युवा सड़क पर उतर आए थे, जिसमें आगे थी ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू). इस सीएए विरोध का झंडा उठाने वाले चेहरे असम विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने जा रहे हैं. ऐसे में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के समर्थन से बनी राजनीतिक पार्टी असम जातीय परिषद (एजेपी) ने सीएए विरोध का चेहरा रहे अखिल गोगोई की पार्टी राइजर दल के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरने जा रहे हैं.
असम जातीय परिष प्रमुख लुरिनज्योति गोगोई ने गुरुवार को ऐलान किया है कि उनके दल ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अखिल गोगोई के नेतृत्व वाले राइजर दल के साथ गठबंधन किया है. अखिल गोगोई के साथ गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (जीएमसीएच) में बातचीत के बाद लुरिनज्योति गोगोई ने कहा कि दो नयी क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन किया है और इस संबंध में औपचारिक घोषणा जल्द ही की जाएगी.
सीएए विरोध के चलते अखिल गोगोई दिसंबर 2019 से जेल में बंद है. एनआईए ने देशद्रोह विरोधी गतिविधियों के तहत उनकी संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार दिया था, लेकिन बीमारी के चलते गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में अखिल गोगोई इलाज के लिए भर्ती हैं. यहीं पर गुरुवार को लुरिनज्योति गोगोई ने उनसे मुलाकात करने के बाद साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.
हालांकि, राइजर दल ने पिछले महीने ही एजेपी प्रमुख लुरिनज्योति को पत्र लिख कर दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन करने का आग्रह किया था, जिस पर अब मुहर लगी है. लुरिनज्योति ने कहा कि हमने पहले सत्तारूढ़ बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो कर लड़ने की बात की थी. उन्होंने कहा कि उनकी बात असम गणपरिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ भी बातचीत कर रही है, जो सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ी है. उन्होंने कहा कि असम में हम यहां के क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं ताकि राज्य की अस्मिता को बचाया जा सके. हालांकि, उन्होंने कांग्रेस गठबंधन से भी दूरी बनाए रखने की बात कही है.
गौरतलब है कि असम जातीय परिषद (एजेपी) और राइजर दल दोनों ही पार्टियां साल 2019 में असम में सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शन में अहम भूमिका अदा की थी. असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट जो एनडीए के सहयोगी दल के तौर पर है, वो भी सीएए के खिलाफ है. इसीलिए एजेपी उन्हें भी अपने साथ मिलाने की कवायद में है ताकि एक मजबूत विकल्प के तौर पर विधानसभा चुनाव में अपने आपको पेश कर सकें.
असम में असमिया भाषा बोलने वाले 48 फीसदी के करीब हैं जबकि बांग्ला भाषा बोलने वाले तकरीबन 28 फीसदी हैं. वहीं, बोडो बोलने वाले 4.5 फीसदी और हिंदी बोलने वाले तकरीबन 6.7 फीसदी हैं. इसके अलावा अन्य भाषा बोलने वालों की तादाद इनसे कम है. यही वजह है कि असम के लोगों को लगता है कि नागरिकता कानून आने के बाद असम में बांग्ला बोलने वालों का वर्चस्व बढ़ जाएगा. असम में सीएए के विरोध की बड़ी वजह यही मानी जा रही है, जिसे अब चुनावी रणभूमि में भी आजमाने के लिए ये मैदान में उतर रहे हैं.