असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी एक बार फिर एकतरफा जीत दर्ज करती नजर आ रही है. असम में बीजेपी गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रहा है जबकि कांग्रेस गठबंधन एक बार फिर अपने पुराने आंकड़े पर सिमटता दिख रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा और 5 साल में हुए विकास कार्य बीजेपी की वापसी का अहम कारण बने जबकि कांग्रेस गठबंधन की सत्ता में वापसी के लिए प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के अरमानों पर पानी फिरता नजर आ रहा है. असम में न तो प्रियंका गांधी का चेहरा चला और न ही भूपेश बघेल की चाल.
असम विधानसभा चुनाव की कुल 126 सीटों पर चुनाव हुए हैं. सुबह साढ़े दस बजे तक 113 सीटों पर आए रुझानों में बीजेपी गठबंधन 76 सीटों पर बढ़त बनाए हुए जबकि कांग्रेस गठबंधन को 36 सीटें मिलती दिख रही हैं. वहीं, अन्य के खाते में 2 सीटें मिलती नजर आ रही है. ऐसे में एक तरह से बीजेपी पिछले चुनाव की तरह ही नतीजे दोहराती नजर आ रही है. वहीं, कांग्रेस का इस बार एआईयूडीएफ, बीपीएफ और लेफ्ट पार्टी के साथ गठबंधन करना काम नहीं आया.
असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कमान प्रियंका गांधी ने संभाल रखी थी. छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल को उन्होंने असम चुनाव की जिम्मेदारी दे रखी थी. बघेल असम में डेरा जमाए हुए थे और उन्होंने अपने राज्य के तमाम नेताओं को लगा था. इसके बावजूद बघेल की चाल काम नहीं आ सकी थी जबकि प्रियंका गांधी का चेहरा भी पार्टी के काम नहीं आ पाया. हालांकि, प्रियंका गांधी ने यहां पूरी ताकत झोंक दी थी, फिर भी पार्टी जीत नहीं सकी.
2016 की तरह इस बार नतीजे
बता दें कि पिछले 2016 के विधानसभा चुनाव में नतीजे कुछ ऐसे ही थे. बीजेपी को 60 और उसकी सहयोगी असम गण परिषद को 14 और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट को 12 सीटें मिली थीं. वहीं, कांग्रेस को 26, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को 13, और निर्दलीय को एक सीट पर जीत मिली थी. हालांकि, इस बार बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट बीजेपी के बजाय कांग्रेस के साथ मैदान में उतरी थी.
इस बार के चुनाव में नतीजे ऐसे ही आते नजर आ रहे हैं. ये हाल तब है जब सीएए के खिलाफ असम में लोगों का जबरदस्त गुस्सा था. इसके अलावा चाय बागानों की मजदूरों की दिहाड़ी को कांग्रेस ने सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था. इसके बावजूद असम में बीजेपी दोबारा से सत्ता में वापसी करती दिख रही है. बोडोलैंड और ऊपरी असम से ज़्यादा फायदा हुआ. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि लोग सरकार के खिलाफ वोट देने निकले थे. कांग्रेस मजबूत गठबंधन बनाने के बावजूद 50 सीटों के इर्द-गिर्द नहीं पहुंच पा रही है.
बीजेपी को ऊपरी असम में भारी बढ़त
बीजेपी असम के ऊपरी इलाके, मध्य क्षेत्र और उत्तर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत बनाए रखने में कामयाब दिख रही है. वहीं, बराक घाटी और निचले असम के मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन को सीटें मिल रही हैं. असम के ऊपरी हिस्से में बीजेपी का जीतना यह बता रहा है कि सीएए का कोई सियासी असर नहीं दिख रहा है.
कांग्रेस असम विधानसभा चुनाव में उम्मीद लगाए हुए थी कि सीएए के खिलाफ हुए आंदोलनों, चाय बागानों के मजदूरों की नाराजगी, बेरोजगारी, महंगाई के मुद्दों के कारण उसे असम में राजनीतिक मदद मिलेगी. इसके अलावा एआईयूडीएफ और बीपीएफ जैसे अहम दलों के साथ आने के कारण भी कांग्रेस सत्ता में अपनी वापसी की उम्मीद कर रही थी, लेकिन नतीजे से कांग्रेस की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है. कांग्रेस यह मानकर चल रही थी कि मुस्लिम वोट एकमुश्त मिलेंगे, लेकिन बीजेपी के ध्रुवीकरण के आगे उसके सारे समीकरण फेल होते दिख रहे हैं.
असम में विकास का मुद्दा हावी रहा
इंडिया टुडे-एक्सिस-माय-इंडिया के एग्जिट पोल के मुताबिक असम के 69 फीसदी लोग मानते हैं कि बीजेपी ने अच्छा काम किया है जबकि 6 फीसदी लोग मानते हैं कि राज्य में सीएए नहीं लागू किया जाए. इसके अलावा 19 फीसदी लोगों ने राज्य के विकास कार्यों को देखते हुए बीजेपी को वोट किया है. नतीजे में भी इसका असर दिख रहा हो और बीजेपी एक बार फिर सत्ता में वापसी करती दिख रही है.
इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर प्रभु चावला ने कहा था कि असम के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और राज्य में पांच सालों में हुए विकास कार्यों पर बीजेपी को वोट दिया है. कांग्रेस भले ही असम में कई दलों के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी रही हो, लेकिन उनके पास राज्य में न तो कोई चेहरा था और न ही कोई नारा था. इतना ही नहीं, कांग्रेस गठबंधन ने चुनाव अभियान भी बहुत आखिर में शुरू किया, लेकिन तब तक बीजेपी ने काफी बढ़त बना ली थी.
वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर कहते हैं कि दिल्ली से बैठे लोग असम की जमीनी हकीकत को नहीं समझ पा रहे थे. असम में बीजेपी की सत्ता में लौटना एक बड़ा सियासी संकेत है और उसके सियासी मायने भी है. सीएए विरोध के बाद भी बीजेपी का जीतना काफी अहम है. वहीं, बीजेपी की जीत से कांग्रेस के आंतरिक राजनीति पर भी असर पड़ेगा.
वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल कहते हैं कि तरुण गोगोई का न होना कांग्रेस की हार का कारण बना है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी असम की राजनीति में कोई सियासी असर साबित नहीं कर पाए हैं. कांग्रेस को बदरुद्दीन अजमल के साथ गठबंधन करने का भी कोई फायदा नहीं मिल सका. बीजेपी ने असम में किसी चेहरे को आगे नहीं किया और नरेंद्र मोदी के नाम और काम पर उतरी थी, जिसका राजनीतिक तौर पर उसे फायदा मिला है.