महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 20 नवंबर को चुनाव होने हैं लेकिन जिस एक सीट को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है वर्ली विधानसभा सीट. वर्ली विधानसभा सीट पर उद्धव ठाकरे की अगुवाई शिवसेना यूबीटी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच सीधा मुकाबला है. दोनों सेना का सीधा मुकाबला वैसे तो कई सीटों पर है लेकिन वर्ली सीट की फाइट इसलिए भी खास है क्योंकि यहां से उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे खुद चुनाव मैदान में हैं जिनके सामने शिंदे की सेना ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा को उतारा है.
आदित्य के सामने मिलिंद ही क्यों?
एकनाथ शिंदे की पार्टी ने जब से वर्ली सीट से अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया है, चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि आदित्य के सामने मिलिंद देवड़ा ही क्यों? शिवसेना (शिंदे) किसी और चेहरे पर भी तो दांव लगा सकती थी. आखिर एकनाथ शिंदे की शिवसेना की रणनीति क्या है? इसे पांच पॉइंट में समझा जा सकता है.
1- वर्ली के लिए देवड़ा का चेहरा नया नहीं
मिलिंद देवड़ा मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट से सांसद् रहे हैं. वर्ली विधानसभा सीट भी देवड़ा परिवार का गढ़ मानी जाने वाली मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट के तहत ही आता है. चुनाव का स्वरूप भले ही दूसरा है लेकिन मिलिंद देवड़ा का चेहरा वर्ली सीट के लिए नया नहीं है. हालिया लोकसभा चुनाव में भी मिलिंद देवड़ा को पार्टी ने इस सीट के लिए प्रभारी बनाया था.
2- परसेप्शन की लड़ाई में एज लेने की कोशिश
मिलिंद देवड़ा को आदित्य ठाकरे के खिलाफ शिवसेना का टिकट एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे की पार्टियों में चल रहे परसेप्शन वार से जोड़कर भी देखा जा रहा है. शिवसेना (शिंदे) ने मिलिंद देवड़ा को उतारकर यह संदेश तो दे ही दिया कि ठाकरे के खिलाफ भी वह मजबूती से चुनाव लड़ रही है, यह संदेश भी स्पष्ट है कि पार्टी ने स्थानीय स्तर पर अपने सबसे मजबूत चेहरे को उतारा है जो राष्ट्रीय राजनीति में भी एक्टिव रहा है, केंद्रीय मंत्री रहा है. आदित्य ठाकरे दूसरी ही बार चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में शिवसेना (शिंदे) की कोशिश देवड़ा के चेहरे के जरिये परसेप्शन की लड़ाई में एज हासिल करने की है.
3- ठाकरे परिवार को एक सीट पर उलझाने की रणनीति
एकनाथ शिंदे की रणनीति ठाकरे परिवार को एक सीट पर उलझाने की भी हो सकती है. आदित्य ठाकरे के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार, बड़ा चेहरा होने की वजह से ठाकरे परिवार को इस प्रतिष्ठापरक सीट पर अधिक समय देना पड़ सकता है. कोंकण रीजन शिवसेना का मजबूत गढ़ रहा है और इसी रीजन में मुंबई, ठाणे भी आते हैं. शिवसेना में बगावत के बाद से ही ठाकरे परिवार का जोर शिंदे को उनके गढ़ ठाणे में ही घेरने की रही है. अब शिंदे की रणनीति ठाकरे परिवार को वर्ली विधानसभा क्षेत्र में ही उलझाने की हो सकती है.
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4- माहिम से वर्ली का ट्यून सेट करने की कोशिश
एकनाथ शिंदे की पार्टी ने वर्ली सीट से पहले मिलिंद देवड़ा की उम्मीदवारी का ऐलान किया और फिर मुंबई बीजेपी अध्यक्ष आशीष शेलार का यह बयान आ गया कि हमें राज ठाकरे के बेटे अमित का समर्थन करना चाहिए. अमित ठाकरे माहिम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं जहां से शिंदे की पार्टी ने मौजूदा विधायक सदा सरवणकर को उम्मीदवार बनाया है. शिंदे की पार्टी ने अमित के खिलाफ उम्मीदवार वापस लेने या नहीं लेने को लेकर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा है लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी ऐसा कर सकती है.
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इसके पीछे दो तर्क दिए जा रहे हैं. एक ये कि माहिम सीट वर्ली के करीब ही है. वर्ली विधानसभा क्षेत्र में राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का मजबूत आधार रहा है. पिछले चुनाव में राज की पार्टी ने आदित्य ठाकरे का बिना शर्त समर्थन किया था लेकिन शिवसेना यूबीटी ने अमित ठाकरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिया है. ऐसे में शिंदे की पार्टी अमित के समर्थन में अपना उम्मीदवार वापस लेती है तो इसका फायदा पार्टी को वर्ली में मिल सकता है. दूसरा, शिंदे की पार्टी के इस कदम से यह संदेश भी जा सकता है कि उनकी अदावत सिर्फ उद्धव ठाकरे से है, ठाकरे परिवार से नहीं.
5- असली-नकली शिवसेना की लड़ाई में वर्ली अहम
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे की पार्टियों में एक लड़ाई असली और नकली शिवसेना की भी चल रही है. असली-नकली शिवसेना की इस लड़ाई में वर्ली सीट अहम हो गई है. बाकी सीटों के नतीजे चाहे जैसे रहें, शिवसेना (शिंदे) अगर वर्ली के रण में आदित्य ठाकरे को पटखनी दे जाती है तो यह भी ठाकरे परिवार के लिए बहुत बड़ा झटका होगा. वर्ली में जीत असली-नकली शिवसेना की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाएगा और शायद यह भी एक वजह है कि शिंदे की पार्टी ने वर्ली की व्यूह रचना पर फोकस कर दिया है.