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तेजस्वी की CM उम्मीदवारी पर पत्ते क्यों नहीं खोल रही कांग्रेस? जानिए विधानसभा चुनाव को लेकर क्या है रणनीति

बिहार में आगमी विधानसभा चुनाव को लेकर आरजेडी तेजस्वी सरकार का नारा दे रही है. इसकी एक सबसे बड़ी वजह ये है कि प्रदेश में नीतीश कुमार के सामने विपक्षी विकल्प के तौर पर तेजस्वी ही खड़े दिखते हैं.

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तेजस्वी यादव के साथ राहुल गांधी (फाइल फोटो)
तेजस्वी यादव के साथ राहुल गांधी (फाइल फोटो)

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election) में 6 महीने का वक्त बचा है. चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दल अभी से ही तैयारी में जुट गए हैं. एक तरफ सत्ताधारी एनडीए गठबंधन ने नीतीश सरकार की वापसी के लिए बिहार के सभी जिलों में एनडीए का संयुक्त कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित कर लिया है, तो वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ राज्य के हर जिले में संवाद कार्यक्रम कर चुके हैं.

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बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब कांग्रेस भी संगठन को सशक्त बनाने और अपने पुराने वोटबैंक को साधने की रणनीति बैठकों में बना रही है. लोकसभा चुनाव के बाद बदली हुई परिस्थितियों में बिहार में बीजेपी अब नीतीश कुमार के नेतृत्व पर हर दिन मुहर लगाते नजर आ रही है. बीजेपी का केंद्र से लेकर राज्य स्तर तक का हर छोटा–बड़ा नेता विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा करता दिखता है.

वहीं, दूसरी तरफ महागठबंधन खेमे में आरजेडी तेजस्वी सरकार के नारे के साथ आगे बढ़ती दिख रही है. आरजेडी के तेजस्वी सरकार के नारे को वाम दलों का भी समर्थन है लेकिन कांग्रेस के तेवर इन दिनों बदले नजर आते हैं. कांग्रेस ने खुले तौर पर तेजस्वी यादव की सीएम उम्मीदवारी को फिलहाल अपनी सहमति नहीं दी है. 

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तेजस्वी पर पत्ते नहीं खोल रही कांग्रेस

बिहार में आगमी विधानसभा चुनाव को लेकर आरजेडी तेजस्वी सरकार का नारा दे रही है. इसकी एक सबसे बड़ी वजह ये है कि प्रदेश में नीतीश कुमार के सामने विपक्षी विकल्प के तौर पर तेजस्वी ही खड़े दिखते हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव जिस तरह सत्ता पाने से चूक गए थे, उसके बाद आरजेडी को ये भरोसा है कि इस बार तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनेगी. राज्य में तेजस्वी सरकार बनेगी या नहीं इसका फैसला तो जनता चुनाव में करेगी लेकिन तेजस्वी को महागठबंधन की तरफ से सीएम का चेहरा बनाए जाने की आरजेडी की प्लानिंग पर कांग्रेस ने पानी फेर दिया है.

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बिहार में कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु खुले तौर पर कह चुके हैं कि तेजस्वी यादव को सीएम कैंडिडेट बनाया जाने पर कोई भी फैसला महागठबंधन में शामिल दलों की बैठक में सामूहिक सहमति से लिया जाएगा. अल्लावरु के मुताबिक, महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री का कोई चेहरा जरूरी है या नहीं इस पर भी फैसला घटक दलों के साथ मिल बैठकर सबकी सहमति से होगा. जाहिर है कांग्रेस फिलहाल तेजस्वी के चेहरे कर अपने पत्ते खोलने से बच रही है. तेजस्वी के चेहरे को लेकर बिहार कांग्रेस प्रभारी का ये बयान दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के साथ हुई बैठक के ठीक बाद आया. इसकी टाइमिंग को लेकर भी सियासी गलियारे में चर्चा है.

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तेजस्वी के चेहरे से परहेज क्यों?

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मंगलवार को दिल्ली में कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी. इसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ-साथ राहुल गांधी भी शामिल हुए थे. बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, नए प्रभारी कृष्ण अल्लावरु समेत बिहार से आने वाले कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता, विधायक और सांसद इस बैठक पर शामिल थे. चुनावी रणनीति को लेकर बुलाई गई इस बैठक में जाहिर तौर पर सभी पहलुओं को लेकर चर्चा हुई और तेजस्वी यादव के चेहरे को लेकर बिहार कांग्रेस प्रभारी ने इस बैठक के ठीक बाद बयान दिया. ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर तेजस्वी के चेहरे से कांग्रेस फिलहाल क्यों परहेज करती नजर आ रही है? 

बिहार कांग्रेस से जुड़े अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, तेजस्वी यादव के सीएम उम्मीदवारी को लेकर भी बैठक में चर्चा हुई. इस बात पर सहमति तो बनी कि बिहार में विधानसभा चुनाव हर हाल में राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन में लड़ा जाए. राष्ट्रीय स्तर पर भले ही इंडिया गठबंधन का स्वरूप बिगड़ चुका हो लेकिन बिहार में महागठबंधन का जो स्वरूप है. उसे बरकरार रखते हुए एनडीए और बीजेपी को शिकायत देने के रणनीति पर आगे बढ़ा जाए. 

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कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर इसे लेकर बयान भी जारी किया लेकिन तेजस्वी यादव को सीएम फेस बनाए जाने पर आखिर कांग्रेस क्यों परहेज करती नजर आई? सियासी जानकारों का मानना है कि जिस तरह कांग्रेस ने पिछले दिनों बिहार में नेतृत्व परिवर्तन किया और दलित तबके से आने वाले राजेश राम को प्रदेश की कमान दी, साथ ही साथ कन्हैया कुमार जैसे युवा चेहरे को बिहार में यात्रा के लिए उतारा, उससे पार्टी की प्लानिंग साफ तौर पर पुराने आधार वोटर्स के बीच खुद को मजबूत करने की नजर आ रही है. भूमिहार जाति से आने वाले कन्हैया कुमार के जरिए कांग्रेस बिहार में अपने पुराने सवर्ण वोट बैंक को वापस लाने की तैयारी में नजर आ रही है, तो वहीं दूसरी तरफ दलित वोट बैंक को साधने के लिए राजेश राम को अध्यक्ष बनाया गया है.

बिहार में जब कांग्रेस मजबूत हुआ करती थी, तब उसके लिए सवर्ण और दलित वाला समीकरण सबसे मजबूत फैक्टर हुआ करता था. अगर वाकई कांग्रेस से अपने पुराने दिनों की वापसी के लिए इसी समीकरण को साधने की कोशिश में आगे बढ़ाने की तैयारी में है तो जाहिर तौर पर तेजस्वी यादव को सीएम कैंडिडेट घोषित किए जाने से परहेज इसकी बड़ी वजह हो सकती है. तेजस्वी यादव भले ही मौजूदा वक्त में A टू Z वाली पॉलिटिक्स की बात करते हो लेकिन यह सभी जानते हैं कि उनके पिता लालू प्रसाद यादव के दौर से MY यानी मुस्लिम और यादव वाला समीकरण आरजेडी के साथ जुड़ रहा है.

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मौजूदा वक्त में भी MY फैक्टर आरजेडी के साथ मजबूती के साथ खड़ा दिखता है. तेजस्वी के तमाम प्रयोगों के बावजूद सवर्ण तबके को आरजेडी का फेवरेट नहीं माना जाता. बिहार में यादवों और दलितों के बीच जमीनी स्तर पर जो रिश्ते हैं, वह भी दलितों को आरजेडी के साथ पूरी मजबूती से खड़ा नहीं करता. ऐसे में अगर कांग्रेस बिहार चुनाव में सवर्णों और दलितों को साधने की तैयारी में है, तो तेजस्वी यादव के चेहरे से उसे नुकसान हो सकता है. शायद यही वजह है कि बिहार कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरु खुले तौर पर कह रहे हैं कि पहले चुनाव जीतना जरूरी है, जनता जब हमें जीत दे देगी तो मुख्यमंत्री के चेहरे पर फैसला हो जाएगा. कांग्रेस की कोशिश यहां यह नजर आती है कि बगैर सीएम का चेहरा सामने किए वह नए वोटर्स अपने साथ जोड़ पाए. इसका फायदा महागठबंधन को हो और जब सरकार बने तो तेजस्वी के नाम पर सामूहिक सहमति से फैसला हो. तेजस्वी के चेहरे पर फिलहाल असहमति की बड़ी वजह यही मानी जा सकती है कि उन्हें सीएम कैंडिडेट घोषित करने से कांग्रेस की पूरी चुनावी प्लानिंग को झटका लग सकता है.

सीट शेयरिंग को लेकर रस्साकशी

महागठबंधन में सीएम उम्मीदवार के तौर पर तेजस्वी यादव के चेहरे पर कांग्रेस की असहमति का एक दूसरा पहलू भी हो सकता है. बिहार चुनाव में भले ही 6 महीने का वक्त हो लेकिन सीट बंटवारे को लेकर अभी से ही खींचतान कई देखने को मिल रही है. तेजस्वी यादव के नाम पर कांग्रेस से जिस तरह अपने पत्ते छिपाए हैं, वह महागठबंधन में ज्यादा विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की कांग्रेस की प्लानिंग का एक हिस्सा हो सकता है. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आरजेडी से 70 सीट लिए थे, हालांकि इसमें केवल 19 पर ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई थी. बीते विधानसभा चुनाव के जब नतीजे सामने आए थे तब आरजेडी ने खुले तौर पर कांग्रेस को महागठबंधन की सरकार नहीं बनने के लिए दोषी ठहराया था.

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कांग्रेस के ऊपर यह आरोप लगाया था कि जीत की स्थिति में नहीं होने के बावजूद उसने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार दिए. तेजस्वी यादव आगामी विधानसभा चुनाव में यह गलती नहीं दोहराना चाहते. तेजस्वी की तैयारी कांग्रेस से ज्यादा वाम दलों को तरजीह देने की है, साथ ही साथ मुकेश सहनी भी महागठबंधन का हिस्सा हैं. ऐसे में कांग्रेस को इस बार 70 सीट दिया जाना आसान नहीं होगा. कांग्रेस भी इस बात को भली भांति समझ रही है, शायद यही वजह है कि कांग्रेस के नेता अभी से यह कहने लगे हैं कि बीते विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा उससे कम पर आगामी विधानसभा चुनाव में वह कैंडिडेट नहीं देगी. 

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मामला 70 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी से जुड़ा हुआ है, ऐसे में कांग्रेस को ये लगता है कि तेजस्वी यादव के चेहरे पर असहमति जताकर कांग्रेस आरजेडी के ऊपर दबाव भी बन सकती है. संभव है कि सीएम कैंडिडेट को लेकर पत्ते नहीं खोल कांग्रेस ने सीट बंटवारे को लेकर गठबंधन के अंदर दावा पेश की रणनीति अपनाई है.

तेजस्वी सरकार के नारे का क्या होगा?

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बिहार में इस बार विधानसभा चुनाव भी दो गठबंधनों के बीच आमने-सामने की लड़ाई होगी. एनडीए ने नीतीश सरकार की वापसी का दावा किया है तो वहीं आरजेडी हर हाल में तेजस्वी सरकार चाहती है लेकिन कांग्रेस के रुख से क्या तेजस्वी सरकार वाले नारे को महागठबंधन चुनाव में लेकर जा पाएगा? यह बड़ा सवाल बना हुआ है. सवाल यह भी की तेजस्वी अगर महागठबंधन का चेहरा नहीं होंगे तो कौन होगा? 

जाहिर है जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा और सीट शेयरिंग को लेकर महागठबंधन के अंदर बातचीत जमीनी स्तर पर आगे बढ़ेगी तमाम सवालों का जवाब भी मिलते जाएंगे लेकिन फिलहाल तेजस्वी के बहाने ही सही कांग्रेस ने महागठबंधन में अपना कद बढ़ाने वाली राजनीति शुरू कर दी है.

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