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जम्मू कश्मीर में बीजेपी का 35:10 फॉर्मूला कितना प्रैक्टिकल? किन फैक्टर्स से पार्टी को घाटी में उम्मीद

जम्मू कश्मीर चुनाव में बीजेपी ने जम्मू रीजन की 35 और कश्मीर घाटी की 10 सीटों पर जीत की उम्मीद जताई है. जम्मू कश्मीर में बीजेपी का 35:10 का फॉर्मूला कितना प्रैक्टिकल है?

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जम्मू-कश्मीर भाजपा प्रमुख रविंदर रैना ने चुनाव में पार्टी की जीत का भरोसा जताया, चुनाव-पूर्व गठबंधन की संभावना को खारिज किया
जम्मू-कश्मीर भाजपा प्रमुख रविंदर रैना ने चुनाव में पार्टी की जीत का भरोसा जताया, चुनाव-पूर्व गठबंधन की संभावना को खारिज किया

जम्मू कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राम माधव को चुनाव प्रभारी बनाया है. जम्मू कश्मीर में बीजेपी के चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे राम माधव ने दावा किया है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी और अगली सरकार राष्ट्रवादियों की बनेगी. उन्होंने जम्मू रीजन में 35 सीटें जीतने दावा किया है और कश्मीर घाटी में भी 20 सीटों पर चुनाव लड़ने का जिक्र करते हुए सफलता की उम्मीद जताई है. बीजेपी के नेता घाटी में भी 10 सीटें जीतने की उम्मीद जता रहे हैं. सवाल है कि जम्मू कश्मीर में बीजेपी का 35:10 का फॉर्मूला कितना प्रैक्टिकल है?

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जम्मू और कश्मीर, किस रीजन में कितनी सीटें

जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं. 47 सीटें कश्मीर और 43 सीटें जम्मू रीजन में हैं. परिसीमन से पहले की बात करें तो 2014 के चुनाव तक 87 सीटें हुआ करती थीं जिनमें 37 सीटें जम्मू और 46 सीटें कश्मीर में थीं. चार सीटें लद्दाख में भी थीं. राज्य के दर्जे में बदलाव के बाद लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है. इसके बाद हुए परिसीमन में जम्मू में छह, कश्मीर में एक सीट बढ़ी है.

35:10 का फॉर्मूला कितना प्रैक्टिकल

जम्मू और कश्मीर के नाम में शामिल इन दोनों की सियासत का मिजाज भी अलग रहा है. जम्मू रीजन में जहां बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां मजबूत रही हैं तो वहीं घाटी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों का गढ़ रहा है. राम माधव जम्मू की 35 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं. हिंदू बहुल माने जाने वाले जम्मू रीजन के पांच जिले ऐसे भी हैं जहां मुस्लिम आबादी अधिक है. ऐसे जिलों की लिस्ट में डोडा, राजौरी, पुंछ, रामबन, किश्तवाड़ शामिल हैं. रियासी जिले में हिंदू और मुस्लिम, दोनों की ही आबादी करीब-करीब बराबर है.

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रियासी को छोड़ भी दें तो जम्मू रीजन के इन पांच मुस्लिम बाहुल्य जिलों में 2014 के विधानसभा चुनाव तक 13 सीटें हुआ करती थीं जो अब बढ़कर 16 पहुंच गई है. इनमें से राजौरी जिले की तीन और पुंछ जिले की दो, कुल पांच सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं जहां बीजेपी को आरक्षण का प्रावधान करने की वजह से एज मिलने की उम्मीद है. बची 11 सीटों पर पार्टी के लिए चुनावी लड़ाई आसान नहीं होगी. हालांकि, 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इन जिलों की छह सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन तब कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रें और पीडीपी, ये सभी पार्टियां अलग-अलग ताल ठोक रही थीं और मुस्लिम वोट बंट गए थे.

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि बीजेपी के जम्मू में 35 सीटें जीतने के लक्ष्य में इस रीजन के मुस्लिम बाहुल्य जिलों की सीटें ही सबसे बड़ी बाधा हैं जहां पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस अच्छा प्रदर्शन करते आए हैं. पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी घाटी की पार्टी कहे जाने वाले दल जम्मू रीजन में जो चार से सात सीटें जीतते आए हैं, वह इन्हीं जिलों की सीटों में से हैं. बीजेपी अगर हिंदू मेजॉरिटी वाली सीटों पर स्वीप करती है, आरक्षित सीटें जीत लेती है और तीन मुस्लिम मेजॉरिटी वाली सीटें जीतती है तो इस नंबर तक पहुंच पाएगी जो प्रैक्टिकल नहीं लगता.

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कश्मीर रीजन में सफलता की उम्मीद का आधार क्या

कश्मीर घाटी में बीजेपी कभी किसी चुनाव में कोई सीट नहीं जीत सकी है. इस बार पार्टी को घाटी में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है तो उसके भी अपने आधार हैं. लोकसभा चुनाव में कश्मीर की पिच पर उतरने से परहेज करने वाली बीजेपी ने इस बार घाटी की 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कही है. पार्टी अपने उम्मीदवार तो उतार रही है लेकिन घाटी के मिजाज को देखते हुए एक दूसरे प्लान पर भी काम कर रही है. घाटी में बीजेपी की उम्मीद का आधार क्या है?

1- निर्दलियों के समर्थन की रणनीति

कश्मीर में बीजेपी अपने उम्मीदवार उतारने के साथ ही ऐसे निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन की रणनीति पर चल रही है जिनके जीतने की संभावनाएं अधिक हों. इस बार के चुनाव में इंजीनियर राशिद की पार्टी से लेकर गुलाम नबी आजाद की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी तक, कई छोटी पार्टियां भी चुनाव मैदान में उतरी हैं.

ये पार्टियां घाटी में मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार की पॉलिटिक्स को हिट कर रही हैं, नए विकल्प की बात कर रही हैं. निर्दलीय उम्मीदवारों की भरमार भी मुकाबले को बहुकोणीय बना रही है. हाल ही में उमर अब्दुल्ला ने निर्दलीय उम्मीदवारों के उतरने को बीजेपी की रणनीति बताते हुए हमला बोला था. घाटी में बीजेपी की संभावनाएं इंजीनियर राशिद, सज्जाद लोन, गुलाम नबी आजाद की पार्टियों के प्रदर्शन पर भी टिकी हैं. ये दल जितनी मजबूती से लड़ेंगे, नेशनल कॉन्फ्रेंस की अगुवाई वाले गठबंधन के बहुमत से दूर रहने की संभावनाएं उतनी ही अधिक होंगी.

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2- लोकसभा चुनाव में उमर-महबूबा की हार

लोकसभा चुनाव में अब्दुल्ला परिवार के उमर अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की महबूबा मुफ्ती, दोनों को ही शिकस्त झेलनी पड़ी. उमर अब्दुल्ला को निर्दलीय इंजीनियर राशिद ने हरा दिया था. घाटी की दो प्रमुख पार्टियों के दो प्रमुख नेताओं की हार को नए कश्मीर की जनता के बदले मिजाज और नए विकल्प की तलाश से जोड़कर देखा गया. अगर गैर पीडीपी, गैर नेशनल कॉन्फ्रेंस उम्मीदवार विधानसभा के लिए निर्वाचित होते हैं तो ये भी बीजेपी के लिए मुफीद बताया जा रहा है.

3- युवा वोटर्स का मिजाज

बीजेपी की उम्मीदों का आधार युवा वर्ग भी है. पुराने लोगों का जुड़ाव पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस से है लेकिन युवा वर्ग विकास, रोजगार और नए विकल्प की बात कर रहा है. युवा वोटर्स के मिजाज को देखते हुए भी बीजेपी को अपने लिए उम्मीदें नजर आ रही हैं.

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