हरियाणा में वोटिंग का वक्त करीब आ गया है. 5 अक्टूबर को मतदान होना है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में बिल्कुल अलग लेकिन बेहद समान चुनावी रणनीति अपनाई है. कांग्रेस ने अपने अधिकांश टिकट जाटों को दिए हैं और बीजेपी ने सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों पर दांव लगाया है. इनमें ब्राह्मण, बनिया, पंजाबी/खत्री और राजपूत समाज से ज्यादातर उम्मीदवार हैं. बीजेपी ने करीब 40 प्रतिशत विधायकों के टिकट काट दिए हैं. वहीं, कांग्रेस ने अपने 2019 के अधिकांश विधायकों को दोबारा मौका दिया है.
दोनों पार्टियों के घोषणा पत्र बिल्कुल समान हैं. दोनों दलों ने महिलाओं को कैश में मदद, एलपीजी सिलेंडर में छूट और सरकारी नौकरियों के वादे किए हैं.
हरियाणा की राजनीति में जाति एक अहम भूमिका निभाती है. पार्टियों की अपनी सोशल इंजीनियरिंग रणनीतियां होती हैं. कांग्रेस करीब 50 फीसदी आबादी वाले जाटों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है. दूसरी ओर बीजेपी अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य श्रेणी के मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश कर रही है.
इंडियन नेशनल लोकदल ने बहुजन समाज पार्टी और जननायक जनता पार्टी ने आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है. दोनों ही क्षेत्रीय दल जाट वोटर्स के भरोसे हैं और एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं. खासकर 2024 के आम चुनावों में बड़ी संख्या में कांग्रेस का समर्थन करने वाले दलितों को इस बार अपने पाले में लाने के लिए प्रयासरत हैं.
कहां कितनी सीटें प्रभावित?
हरियाणा में 57 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां जाट आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है. रोहतक में 20, हिसार में 18 और करनाल में 8 सीटें हैं. 2019 के चुनावों में कांग्रेस ने 20, बीजेपी ने 19 और अन्य ने 18 सीटें जीतीं. 49 सीटों पर जाटव (अनुसूचित जाति) की आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है. इनमें हिसार में 11, अंबाला और रोहतक में 9-9 और गुरुग्राम में 8 सीटें हैं. 2019 में बीजेपी ने इनमें से 21 सीटें जीतीं. कांग्रेस ने 15 और अन्य ने 13 सीटें जीतीं.
25 सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है. इनमें से रोहतक में 8 सीटें, अंबाला में 6 और करनाल और फरीदाबाद में 4-4 सीटें हैं. 2019 में बीजेपी ने 13 सीटें जीतीं. कांग्रेस ने 8 सीटें जीतीं और अन्य ने 4 सीटें जीतीं. 17 सीटें ऐसी हैं जहां पंजाबी/खत्री/अरोड़ा आबादी 10 प्रतिशत से ज्यादा है. अंबाला और हिसार में 4-4, और रोहतक और फरीदाबाद में 3-3 सीटें हैं. 2019 में ये सीटें बीजेपी के खाते में गईं. बीजेपी ने 13 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक और अन्य को तीन सीटें मिलीं.
10 सीटों पर अहीर आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है. इनमें से गुरुग्राम डिवीजन में 9 सीटें हैं. इन सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. 2019 में बीजेपी ने 9 सीटें जीतीं थीं और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी. 10 सीटें ऐसी हैं, जहां गुर्जर आबादी 10 प्रतिशत से ज्यादा है. इनमें से फरीदाबाद डिवीजन में पांच सीटें हैं. 2019 में बीजेपी ने ऐसी 6 सीटें, कांग्रेस ने तीन और एक अन्य ने जीती थी.
बीजेपी की सामान्य श्रेणी (ब्राह्मण/खत्री) और ओबीसी-प्रभावित सीटों (गुर्जर/अहीर) पर जबरदस्त पकड़ देखी गई. जबकि कांग्रेस जाट-प्रभावित सीटों पर स्पष्ट बढ़त हासिल नहीं कर सकी, जिससे 2019 में उसे हार का सामना करना पड़ा. राज्य में कुल 90 सीटें हैं. इनमें से 58 पर सीटों पर ब्राह्मण, राजपूत, सैनी, गुज्जर, अहीर और पंजाबियों/खत्रियों की आबादी है और ये बड़ा वर्ग बीजेपी का समर्थन करता आ रहा है. जबकि कांग्रेस को जाट और मुस्लिम आबादी से समर्थन मिलते देखा गया है. इन सीटों पर दलित किंगमेकर हैं.
2014 में बीजेपी ने कुल 47 सीटों पर जीत हासिल की. इनमें 40 सीटें इसी इलाके में हासिल कीं. 2019 में बीजेपी ने कुल 40 सीटों पर जीत दर्ज की और 31 सीटें इसी इलाके में इस बड़े वर्ग के समर्थन से हासिल कीं. कांग्रेस ने 2019 में कुल 31 सीटें जीतीं और 19 सीटें अपने परंपरागत वोट बैंक के सहारे जीतीं. 2024 के आम चुनावों में भी इन 20 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही.
32 सीटें ऐसी हैं, जहां जाट-मुस्लिम का दबदबा है. वहां ब्राह्मण, राजपूत, सैनी, गुज्जर, अहीर और पंजाबियों/खत्रियों से ज्यादा जाट और मुस्लिम की आबादी है. 2024 के आम चुनावों में वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने 26 सीटों पर बढ़त बनाई.
सदन की संरचना क्या है?
2019 के चुनावों में 25 जाट विधायक चुने गए. ये वर्ग सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली माना जाता है. जाट समुदाय विधानसभा की 28 प्रतिशत ताकत का प्रतिनिधित्व करता हैं. दलित 17 और मुस्लिम/ सिख समुदाय से 9 विधायक चुने गए, जो सदन की कुल संख्या का 19 प्रतिशत और 10 प्रतिशत हैं. इन दोनों समुदायों की जनसंख्या क्रमशः 20 प्रतिशत और 12 प्रतिशत है.
कांग्रेस के सबसे ज्यादा 9 जाट विधायक चुने गए, उसके बाद बीजेपी और जेजेपी से पांच-पांच जाट विधायक चुनाव जीते. सामान्य श्रेणी के 24 विधायक चुने गए. यानी विधानसभा की कुल संख्या का 27 प्रतिशत. 15 ओबीसी विधायक चुने गए. यानी सदन की संख्या का 17 प्रतिशत. आधे से ज्यादा विधायक या तो जाट हैं या सामान्य वर्ग से.
2019 में बीजेपी के पास ब्राह्मण, बनिया और पंजाबी/खत्री विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा संख्या 18 रही. साथ ही ओबीसी समुदाय से 9 विधायक चुने गए थे.
कांग्रेस को जाट और बीजेपी को सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों पर भरोसा
कांग्रेस और उसकी सहयोगी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (एक सीट) ने 29 जाट उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने सिर्फ 15 जाट उम्मीदवार उतारे हैं. दूसरी ओर बीजेपी ने सामान्य वर्ग के 35 उम्मीदवारों को टिकट दिया है. जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 15 सामान्य उम्मीदवारों को टिकट दिया है. ओबीसी और अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के मामले में दोनों पार्टियों ने लगभग बराबर संख्या में टिकट दिए हैं.
कांग्रेस ने पांच मुस्लिम और चार जाट सिख उम्मीदवारों को टिकट दिया है. वहीं, बीजेपी ने दो मुस्लिमों और एक जाट सिख को उम्मीदवार बनाकर उतारा है. सामान्य वर्ग में बीजेपी ने ब्राह्मणों और पंजाबी खत्रियों को 11-11 टिकट दिए हैं.
बीजेपी ने अपने 39 प्रतिशत टिकट सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने 32 प्रतिशत टिकट जाटों को दिए हैं. दोनों ने स्पष्ट रूप से अपने वोट बैंक को भी ध्यान में रखा है और एससी वर्ग को 19 प्रतिशत टिकट और ओबीसी को 21-22 प्रतिशत टिकट दिए हैं.
2024 के आम चुनावों में 68 प्रतिशत एससी और 51 प्रतिशत ओबीसी ने इंडिया ब्लॉक का समर्थन किया था. ये दोनों समुदाय 2024 के विधानसभा चुनाव में किंगमेकर की भूमिका में उभर सकते हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि दलित वोट कांग्रेस, बसपा और आजाद समाज पार्टी के बीच बंट जाएंगे. जबकि नायब सिंह सैनी के सीएम चेहरे के रूप में होने से कांग्रेस की जाति जनगणना की पिच बेअसर हो जाएगी और उसे 2024 में खोए हुए ओबीसी वोट वापस मिल जाएंगे.
14 सीटों पर दोनों पार्टियों के पास जाट उम्मीदवार हैं. प्रत्येक 13 सीटों पर सामान्य-बनाम-सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार और ओबीसी-बनाम-ओबीसी के बीच मुकाबला है. एससी उम्मीदवारों के लिए 17 सीटें आरक्षित हैं. 12 सीटों पर जाट बनाम सामान्य वर्ग, चार पर जाट बनाम ओबीसी और आठ सीटों पर सामान्य बनाम ओबीसी मुकाबला है. सिर्फ दो सीटों पर मुस्लिम बनाम मुस्लिम मुकाबला होने जा रहा है. सिर्फ एक सीट पर सिख बनाम सिख मुकाबला हो रहा है. एक सीट पर मुस्लिम बनाम ओबीसी मुकाबला है. दो सीटों पर मुस्लिम बनाम सामान्य वर्ग का मुकाबला है और तीन सीटों पर सिख बनाम सामान्य वर्ग का मुकाबला है.
पिछले रुझानों के आधार पर सामान्य वर्ग/ ओबीसी विधायकों के बीजेपी के टिकट पर जीतने की संभावना ज्यादा है. जबकि जाट और दलित विधायकों के कांग्रेस के टिकट पर चुने जाने की संभावना ज्यादा है. कांग्रेस को जीत के लिए जेजेपी, इनेलो और अन्य के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगानी होगी और रिजर्व सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करना होगा.
कांग्रेस को मौजूदा विधायकों पर भरोसा, बीजेपी को नए चेहरों से उम्मीद
कांग्रेस ने 2019 में 31 सीटों पर चुनाव जीता और इस बार 29 मौजूदा विधायकों को टिकट देकर भरोसा जताया है. जबकि बीजेपी ने अपने 40 में से 15 विधायकों के टिकट काट दिए हैं और नए चेहरों पर दांव लगाया है. कांग्रेस मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा कर रही है, जबकि बीजेपी सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने के लिए नए मुख्यमंत्री और नए चेहरों पर भरोसा कर रही है. दोनों पार्टियों ने बेरोजगारी (सरकारी नौकरियां), महंगाई (सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर और महिलाओं को कैश में मदद) और कृषि संकट (MSP) से निपटने के वादे किए हैं.