देश की राजधानी दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है. 70 विधानसभा सीटों की जंग में आम आदमी पार्टी, बीजेपी, कांग्रेस समेत तमाम दल उतरने को तैयार हैं. तमाम दल जनता से अलग-अलग चुनावी वादे और विकास के दावे कर रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव फरवरी 2020 में हुए थे. लेकिन इस खास स्टोरी सीरीज दास्तान-ए-दिल्ली में हम आपको चुनाव के लिए तैयार वर्तमान और आधुनिक दिल्ली से अलग इतिहास के झरोखे वाली दिल्ली से परिचित कराएंगे. जिसके हर पन्ने पर हैरान कर देने वाली कहानियां होंगी, ऐसी दिल्ली जिससे आज की युवा पीढ़ी शायद ही परिचित हो. तो आइए पलटते हैं साड्डी दिल्ली के इतिहास के अनजाने पन्नों को...
दिल्ली को छोड़कर दुनिया का शायद ही कोई ऐसा शहर हो जिसकी जमीन में जितनी परतें नहीं उतनी सभ्यताओं के निशान दबे पड़े हों. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां पर हर सल्तनत अपने उभार के साथ अपनी नई राजधानी बसाता गया और उस सल्तनत के मिटने के साथ-साथ उसकी पहचान भी मिट्टी में मिलती चली गई. तभी तो इस शहर की चौहद्दी में हर तरफ अलग-अलग राजधानियों के अवशेष बिखरे पड़े हैं.
दिल्ली का इतिहास महाभारत के जितना ही पुराना है. महाभारत काल में इसे इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था. इतिहासकारों का मानना है कि इसके बाद भी दिल्ली शहर 7 बार बसी और हर बार उजड़ी. विदेशी लुटेरे आते गए, शहर को लूटते-खसोटते गए, जमकर कत्लेआम किया लेकिन मिटा नहीं पाए. आज भी ये शहर पूरी बुलंदी के साथ देश की राजधानी है, इस देश की शान है. इसकी 7 ऐतिहासिक राजधानियों के नाम थे- किला राय पिथौरा या लालकोट, सिरी, तुगलकाबाद, जहांपनाह, फिरोज़ाबाद, शेरगढ़ या दिल्ली शेरशाही और शाहजहांनाबाद.
इस शहर के हर हिस्से की अपनी कहानी है. यहां देश के हर राज्य से लोग आते हैं और यहीं के होकर रह जाते हैं. सबके लिए ये साड्डी दिल्ली है... ऐसी दिल्ली जो अपने विशाल गोद में हर किसी को समा लेती है, संजो लेती है और सबके लिए यहां फलने-फूलने का पूरा मौका होता है. 2011 की जनगणना के अनुसार इस शहर की आबादी एक करोड़ 67 लाख है. इसकी आबादी औऱ कॉलोनियां लगातार फैलती ही जा रही हैं. दिल्ली की सड़कों से लेकर बाजारों तक आपको हर जगह भीड़ ही भीड़ दिख जाएगी. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक साल 2030 तक दिल्ली की आबादी करीब 3.60 करोड़ हो जाएगी.
ये तो हुई आज की दिल्ली की बात लेकिन क्या आपको पता है कि एक जमाने में न तो दिल्ली की सीमा इतनी बड़ी थी और न ही आबादी इतनी ज्यादा. तब दिल्ली भी देश की अकेली राजधानी नहीं थी और तब नई और पुरानी दिल्ली के बीच इतनी नजदीकी भी नहीं थी.
ये कहानी है 1930 के दशक की दिल्ली की. देश की आजादी से पहले दिल्ली जब बसाई जा रही थी, जब पुरानी दिल्ली से अलग नई दिल्ली आकार ले रही थी. तब खाली पड़े जंगल के इलाकों को काट-काटकर नई-नई बस्तियां बसाई जा रही थीं, नए-नए मकान बनाए जा रहे थे. तब नई दिल्ली का इलाका इतना सुनसान हुआ करता था कि कोई रहने आने को तैयार नहीं था.
प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उस समय की दिल्ली में आए राजेंद्र लाल हांडा ने तब की दिल्ली के बारे में अपनी किताब में कई हैरान कर देने वाले विवरण दिए हैं. तब की दिल्ली की कहानी सुनकर आपको यकीन नहीं होगा कि ये उसी दिल्ली और खासकर नई दिल्ली की बात हो रही है जहां आज भीड़ और महंगाई इतनी है कि आम आदमी जगह नहीं पा सकता.
साल 1939 की नई दिल्ली के बारे में राजेंद्र लाल हांडा लिखते हैं-
'सेकंड वर्ल्ड वॉर छिड़ने(1939) के छः महीने पहले नई दिल्ली कितनी शान्त और स्वच्छ थी, इसकी कल्पनामात्र से ही आज सुख मिलता है. उन दिनों अत्यधिक भीड़भाड़ तो कहीं भी नहीं थी, पर नई दिल्ली में केवल भीड़ का अभाव ही नहीं अखरता था, सबसे अधिक मकानों और बंगलों की खेती अखरती थी. क्नॉट प्लेस से डेढ़-दो मील तक किधर ही चले जाइए, सुन्दर बिजली की लालटेनें और उनके पीछे विशाल बंगले ही दिखाई देते थे. बहुत से बंगलों में शायद कोई रहता भी नहीं था.
पीडब्ल्यूडी के एक कर्मचारी से मुझे पता चला कि 1937-38 में उन्हें एक विशेष समस्या का सामना करना पड़ता था. और शहरों में तो लोग घर ढूंढते हैं लेकिन नई दिल्ली में सरकार ने इतने मकान बना दिए थे कि घरों के लिए आदमी ढूंढे जाते थे. सरकारी कर्मचारियों को कई तरह से प्रेरित और बाध्य किया जाता था कि वे सरकारी क्वार्टरों में रहें. साउथ रोड, किचनर रोड, औरंगजेब रोड आदि सड़कें तो सूनी रहती थीं.'
राजेंद्र लाल हांडा आगे लिखते हैं-
'1939 में नई दिल्ली की जनसंख्या 40 हजार थी. यह नहीं भूलना चाहिए कि यह जनसंख्या सर्दियों के दिनों की थी. गर्मियों के दिनों में तो आबादी 20,000 से भी कम रह जाती होगी. उन दिनों धान की खेत की तरह नई दिल्ली की बहार भी मौसमी होती थी. गर्मी में प्रायः सभी दफ्तर और कनॉट प्लेस के दुकानदार शिमला चले जाया करते थे. और तो और कई स्कूल भी इस आवागमन में बाबू लोगों के साथ होते थे.'
ये विवरण आजादी के पहले का है जब दिल्ली जाड़े के मौसम में देश की राजधानी होती थी और अंग्रेजी शासन गर्मी में शिमला राजधानी में शिफ्ट हो जाया करता था.
हांडा लिखते हैं कि तब दिल्ली की सबसे बड़ी खासियत यहां की सफाई होती थी. क्या गलियां, क्या सड़कें सब तीर की तरह सीधीं और स्लेट की साफ हुआ करती थीं. मक्खी या मच्छर नाम की चीज यहां होती ही नहीं थी. पुराने शहर के लोग अक्सर कहा करते थे कि नई दिल्ली में वो रहे जिसे मक्खी से भी वैर हो. यहां की म्यूनिसिपल कमेटी का सबसे अहम काम था सड़कों पर झाड़ू दिलाना और नालियों में मिट्टी का तेल छिड़कते रहना.
बम्बई, कराची, मद्रास आदि किसी भी शहर से आने वाले लोग नई दिल्ली की स्वच्छता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे. नई दिल्ली में रहना या दुकान करना गौरव की बात समझी जाती थी. शायद इसी लिए कश्मीर गेट उजड़ गया और वहां के सभी व्यापारी कनॉट प्लेस में आ जमे. पुरानी दिल्ली के कुछ धनी लोग भी यहां रहने लगे थे. फिर भी नई दिल्ली मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों की बस्ती थी. जो कि पूरी आबादी के तीन-चौथाई थे.
दिल्ली का ये स्वरूप अगले कई साल तक ऐसा ही शांतिपूर्ण रहा. फिर द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने, अंग्रेजी राज के खात्मे और देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के कारण दिल्ली की तस्वीर बदलती चली गई, फिर आधुनिकता आई और अब वर्तमान दिल्ली हमारे सामने हैं जिसमें कई शेड्स हैं और हर शेड साड्डी दिल्ली का हिस्सा है. दिल्ली अपनी गोद में आए हर किसी को समाती जा रही है, बल्कि आसपास के इलाके भी जो कि अलग राज्य के हिस्से हैं उन्हें भी दिल्ली-एनसीआर के रूप में ही पहचान मिली है.