केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में पहली बार हो रहे विधानसभा चुनाव के पहले चरण में बुधवार को 24 सीटों पर मतदान हुआ. जम्मू -कश्मीर में अंतिम चुनाव 2014 में हुआ था और तब यह राज्य हुआ करता था. 10 साल बाद हो रहे विधानसभा चुनाव में अपनी सरकार चुनने के लिए जम्मू कश्मीर की अवाम का जोश हाई नजर आ रहा है.
पहले चरण की 24 सीटों पर 61 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का उपयोग किया जो 2014 में हुई वोटिंग के लगभग बराबर है. 2014 में इन सीटों पर 61.3 फीसदी वोट पड़े थे. यह आंकड़ा जम्मू कश्मीर के पिछले सात विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा है. वोटिंग के ये आंकड़े अंतिम नहीं हैं और दूर-दराज के इलाकों और पोस्टल बैलट से हुई वोटिंग के आंकड़े आने के बाद इसमें बदलाव हो सकता है.
कहां हुई कितनी वोटिंग?
चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक किश्तवाड़ जिले में सबसे अधिक 77 फीसदी वोटिंग हुई है जबकि सबसे कम 46 फीसदी वोट पुलवामा में पड़े. खंड के नजरिये से देखें तो इंदरवाल खंड में टर्नआउट 80 फीसदी रहा जो 2014 चुनाव के 75.72 फीसदी से करीब चार फीसदी अधिक है. दूसरे नंबर पर 75.04 फीसदी के साथ किश्तवाड़ खंड रहा जहां टर्नआउट में 2014 के 78.23 फीसदी के मुकाबले करीब तीन फीसदी की गिरावट आई है. शांगस-अनंतनाग खंड में 2014 के मुकाबले इस बार करीब 16 फीसदी की गिरावट देखने को मिली.
साल 2014 के चुनाव शांगस-अनंतनाग खंड में 68.78 फीसदी लोगों ने मतदान किया था, इस बार टर्नआउट 52.94 फीसदी ही रहा. इसी तरह दमहाल हंजीपुरा खंड में 2014 के 80.92 फीसदी के मुकाबले 68 फीसदी, डोडा और डोडा पश्चिम खंड में 70.21 और 74.14 फीसदी मतदान हुआ. 2014 में इन खंडों में 79.51 फीसदी मतदान हुआ था. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कोकरनाग में 2014 के मुकाबले सात फीसदी से अधिक की गिरावट के साथ टर्नआउट 58 फीसदी रहा. घाटी की सीटों पर करीब 54 फीसदी वोटिंग हुई जो 2014 के टर्नआउट के लगभग बराबर ही है.
क्या कहता है वोटिंग ट्रेंड?
जम्मू और कश्मीर की 24 सीटों पर हाई वोटिंग ट्रेंड यह बताता है कि आजादी सेंटीमेंट कमजोर हुआ है. पहले अलगाववादियों का चुनाव मैदान में उतरना और अब मतदान का जोश, ये इस बात का संकेत है कि केंद्र शासित प्रदेश की अवाम अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी समस्याओं का हल चाहती है.
जम्मू कश्मीर का ये वोटिंग ट्रेंड क्या कहता है? इस पर राजनीति के जानकार भी यह कह रहे हैं कि नए कश्मीर के नए वोटिंग ट्रेंड को समझने के लिए 8 अक्टूबर तक इंतजार करना होगा. राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि दो बातें स्पष्ट हैं. पहली ये कि जैसा कहा जा रहा था कि लोग 370 हटाए जाने के फैसले का चुनाव बहिष्कार कर विरोध करेंगे, ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ. दूसरा ये कि अलगाववादी जो कभी चुनाव बहिष्कार के आह्वान करते थे, उनके चुनाव मैदान में उतरने से भी फर्क पड़ा है.
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बढ़े वोट को लेकर कहा जा रहा है कि जम्मू में इसका लाभ बीजेपी को मिल सकता है. अमिताभ तिवारी ने कहा कि जम्मू भी पूरा हिंदू बहुल नहीं है. इस रीजन के किश्तवाड़ जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी हिंदू से अधिक है जहां पहले चरण में मतदान हुआ था. हां, कश्मीर घाटी की सीटों पर निर्दलियों की भरमार और अलगाववादियों की कतार से नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की राह कठिन हुई है लेकिन जम्मू में बीजेपी और कांग्रेस ही मेन प्लेयर हैं. जम्मू के किश्तवाड़, रामबन समेत पांच जिलों में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के साथ ही कांग्रेस भी मेन प्लेयर है.
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जम्मू कश्मीर में 10 साल बाद चुनाव हो रहे हैं और पिछले करीब छाह साल से शासन की बागडोर राज्यपाल-उपराज्यपाल के हाथों में ही रही है. केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के नाते शासन को लेकर जनता की नाराजगी अगर वोट के रूप में सामने आती है तो जाहिर है, नुकसान बीजेपी का ही होगा. लेकिन जम्मू कश्मीर के इस चुनाव में तस्वीर अलग है. यह वोट नाराजगी के हैं या 10 साल बाद लौटे लोकतांत्रिक अधिकार के उत्साह के हैं या अलगाववादियों के मैदान में आने से अलगाववादी सेंटीमेंट को मिले नए विकल्प के हैं, यह चुनाव नतीजें आने के बाद ही पता चलेगा.