जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के पहले चरण में कई ऐतिहासिक पहलू सामने आए. पहले चुनावों का बहिष्कार कर चुके दक्षिण कश्मीर के लोग ने इस बार बड़ी संख्या में मतदान में हिस्सा लिया. पहले चरण में करीब 61% वोटिंग दर्ज हुई, जो लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है. तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर वो कौन से कारण रहे जिसके कारण वहां के लोगों का मतदान प्रक्रिया में विश्वास फिर से जगा?
बीते 2 साल में बेहतर हुई सुरक्षा की स्थिति
अनुच्छेद 370 हटने के बाद भाजपा सरकार ने कश्मीर के लिए एक नया सुरक्षा सिद्धांत अपनाया. इसके तहत सख्त कदम उठाए गए ताकि कश्मीर में पिछले 35 सालों से जारी हिंसा के चक्र को तोड़ा जा सके. सुरक्षा एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति दी गई, जिसमें अलगाववादी, पत्थरबाज और आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शामिल थी. एनआईए, ईडी, एसआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने साथ मिलकर फंडिंग नेटवर्क्स पर भी प्रहार किया, जो हिंसा के लिए ऑक्सीजन का काम कर रहे थे. खासकर दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजों और आतंकियों के ओवर ग्राउंड नेटवर्क को निशाना बनाया गया. इस ऑपरेशन ने सुरक्षा स्थिति में बड़ा सुधार लाया, जिससे चुनावों के लिए बेहतर और सुरक्षित माहौल बना. इसके परिणामस्वरूप सभी दलों ने सक्रिय चुनाव अभियान चलाया और इसका परिणाम रिकॉर्ड मतदान के रूप में आज सबके सामने है.
10 साल बाद विधानसभा चुनाव
जम्मू-कश्मीर ने अपना आखिरी विधानसभा चुनाव 2014 में देखा था. 2018 में पीडीपी-भाजपा सरकार गिरने के बाद से केंद्र शासित प्रदेश में कोई चुनी हुई सरकार नहीं थी. 10 साल के इस लोकतांत्रिक अंतराल ने आम आदमी पर खासा असर डाला. लोगों ने महसूस किया कि चुनाव प्रक्रिया और इनमें उनकी भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है, खासकर उनके रोजमर्रा के प्रशासनिक मुद्दों को हल करने के लिए.
बहिष्कार की राजनीति का अंत
1990 के दशक की शुरुआत से ही जम्मू-कश्मीर (खासकर घाटी) में हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों द्वारा चुनाव बहिष्कार की अपील की जाती थी. इससे हर चुनाव, चाहे वह लोकसभा का हो या विधानसभा का, प्रभावित हुआ. इसका सबसे ज्यादा असर श्रीनगर और दक्षिण कश्मीर में दिखता था.
जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया
जमात-ए-इस्लामी, जो पहले चुनाव बहिष्कार का समर्थन करता था, ने 2019 में यूएपीए के तहत बैन होने के बाद अपने रुख में बदलाव किया. इस संगठन ने लोकसभा चुनाव में भाग लिया और अब जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवारों के जरिए हिस्सा ले रहा है. जमात के इस बड़े बदलाव ने भी दक्षिण कश्मीर में बड़े पैमाने पर मतदान में योगदान दिया.
विकास की कमी और बेरोजगारी
10 साल से लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर रहने के बाद जम्मू-कश्मीर के लोगों ने महसूस किया कि एक लोकप्रिय रूप से चुनी गई सरकार का क्या महत्व होता है. लोगों के प्रतिनिधियों को उनके काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. वे आसानी से लोगों के संपर्क में रहते हैं और जनता की सेवा करने का संकल्प लेते हैं. ये सुविधाएं नौकरशाही द्वारा चलाई जाने वाली सरकार में संभव नहीं थीं. जिससे लोगों ने इस बार बड़ी संख्या में चुनाव में हिस्सा लिया.