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राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को नई-नवेली पार्टियों से नुकसान? क्या त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ रहा है जम्मू-कश्मीर

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कई छोटी पार्टियों और निर्दलीयों के मैदान में उतरने से प्रमुख दलों की संभावनाएं कमजोर हो रही हैं. इसके कारण वहां त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ये पार्टियां किंगमेकर की भूमिका में नजर आ सकती हैं.

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पिछले एक दशक में जम्मू-कश्मीर में कोई विधानसभा चुनाव नहीं हुआ है.
पिछले एक दशक में जम्मू-कश्मीर में कोई विधानसभा चुनाव नहीं हुआ है.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव 2024 के सभी चरणों के लिए नामांकन की अंतिम तारीख खत्म हो गई है. अब वहां पहले चरण की वोटिंग भी समाप्त हो चुकी है. उम्मीदवार अब बचे हुए दो चरणों के चुनाव के लिए वोट मांगने में जुटे हुए हैं. एक दशक के बाद केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले पहले चुनाव में कई पूर्व अलगाववादी, छोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में कूद पड़े हैं. जिसके बाद इस बार भी जम्मू-कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा की आशंका जताई जा रही है. 

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इससे पहले 2002, 2008 और 2014 में जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं ने बंटा हुआ जनादेश दिया था. जिसके बाद दो पार्टियों को साथ आकर सरकार बनानी पड़ी थी. 2002 में जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस, 2008 में जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस, और 2014 में भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई थी.

इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने एक मजबूत चुनावी गठबंधन बनाया है. अब्दुल्ला परिवार की कश्मीर घाटी में अच्छी पकड़ है और कांग्रेस जम्मू क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में 90 विधानसभा क्षेत्रों में से 41 में बढ़त हासिल की थी, जो कि 46 के बहुमत के आंकड़े से पांच कम है.

कई पार्टियों के बीच मुकाबला

जम्मू-कश्मीर की चार प्रमुख पार्टियों में से सिर्फ नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी मैदान में हैं. पीडीपी 60 सीटों पर और भाजपा 62 सीटों पर चुनावी मैदान में है.

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सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस 22 सीटों पर, और इंजीनियर राशिद की अवामी इत्तेहाद पार्टी (AIP) 34-35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. गुलाम नबी आजाद की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और आपनी पार्टी 30 से अधिक सीटों पर मैदान में है. प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार 10 सीटों पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं.

इंजीनियर राशिद की लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला पर जीत, महबूबा मुफ़्ती की हार और पीडीपी की कमजोरी ने घाटी की परंपरागत पार्टियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, और अब वो भाजपा पर आरोप लगा रही हैं कि वह प्रॉक्सी उम्मीदवारों का इस्तेमाल कर रही है.

इंजीनियर राशिद की पार्टी ने जमात-ए-इस्लामी के साथ रणनीतिक गठबंधन किया है. AIP दक्षिण कश्मीर में जमात के उम्मीदवारों का समर्थन करेगी और जमात AIP का समर्थन पूरे केंद्र शासित प्रदेश में, खासकर उत्तर कश्मीर में करेगी. यह नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी दोनों के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं, क्योंकि पहले जमात पीडीपी का समर्थन करती थी. नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का कहना है कि कोई नहीं जानता कि यह क्या हो रहा है और यह कुछ ताकतों द्वारा प्रेरित असामान्य गतिविधि है.

छोटी पार्टियां मुख्य उम्मीदवारों के खेल को बिगाड़ने और किंगमेकर बनने की तैयारी में लगी हुई हैं.

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2002 में जम्मू-कश्मीर में प्रति सीट लगभग आठ उम्मीदवार थे. 2008 में यह संख्या लगभग दोगुनी होकर 15.6 हो गई और 2014 में घटकर 9.1 रह गई. 16 सितंबर तक 908 उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार किए जा चुके थे. यह प्रति सीट 10.1 उम्मीदवार है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इनमें से लगभग 44 प्रतिशत निर्दलीय हैं. यह संख्या नाम वापसी की अंतिम तारीख तक घट सकती हैं.

पहले, हर चुनाव में लगभग 200 उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा पाते थे, जिसका मतलब है कि प्रत्येक सीट पर 2.2 से 2.3 उम्मीदवार ही चुनाव जीतने की स्थिति में होते थे. चूंकि यह संख्या दो से अधिक है, इसका मतलब है कि मुकाबला एक से अधिक पार्टियों के बीच हो रहा है.

किसी सीट पर प्रमुख उम्मीदवार वह होता है जिसने अपने निर्वाचन क्षेत्र में कुल डाले गए वोटों में से कम से कम 16 फीसदी हिस्सा हासिल किया हो. यदि किसी सीट पर केवल एक प्रमुख उम्मीदवार होता है, तो इसका मतलब है कि कोई अन्य उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा सका. यदि किसी सीट पर दो प्रमुख उम्मीदवार होते हैं, तो इसका मतलब है कि यह एक द्विपक्षीय मुकाबला है. यदि तीन या अधिक प्रमुख उम्मीदवार होते हैं, तो यह त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबला होता है.

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2002 में 50  द्विपक्षीय सीटें थीं, 2008 में 49, और 2014 में 59 ऐसी सीटें थीं. 2008 और 2014 में लगभग एक तिहाई विधानसभा सीटों पर त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबला हुआ था.

क्लोज मुकाबले और त्रिशंकु फैसला

पिछले चुनावों में बहुकोणीय मुकाबले के कारण काफी क्लोज फाइट्स देखे गए थे. 2002 में जीत का औसत अंतर 21 प्रतिशत था, जो 2014 में घटकर 12 प्रतिशत रह गया. वोटों के हिसाब से 2002 में जीत का अंतर लगभग 20,000 वोटों का था, जबकि 2014 में यह घटकर लगभग महज 6,800 वोटों का रह गया.

2002 और 2008 में 44 सीटों पर दूसरे नंबर के उम्मीदवार को जीत के अंतर से अधिक वोट मिले थे. 2014 में यह संख्या बढ़कर 52 हो गई, जो कि विधानसभा की कुल सीटों का लगभग 60 प्रतिशत है. बड़ी संख्या में उम्मीदवार, करीबी मुकाबले, और तीसरे स्थान पर रहने वाली पार्टी की निर्णायक भूमिका, पिछले तीन चुनावों में त्रिशंकु विधानसभा का कारण बनीं.

निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका

जम्मू-कश्मीर के चुनाव में छोटी पार्टियों और निर्दलीयों ने पहले भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 2002 में उन्होंने 22 सीटों पर जीत दर्ज की और 30 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया. हालांकि 2014 में इनकी सीटों की संख्या घटकर 7 हो गई और वोट शेयर भी घटकर 15 प्रतिशत हो गया. 

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2002 में इन पार्टियों और उम्मीदवारों का 73 सीटों पर प्रभाव था, जो 2014 में घटकर 35 सीटों पर आ गया. हालांकि, यह अभी भी विधानसभा की करीब 40 प्रतिशत सीटें हैं. यहां प्रभाव का मतलब है कि किसी पार्टी ने उन सीटों पर जीत दर्ज की या वहां वह दूसरे या तीसरे स्थान पर रही.

अन्य पार्टियों की बात करें तो वे 2024 के लोकसभा चुनाव में एक सीट जीतकर और 24 प्रतिशत वोट शेयर दर्ज कर वापसी कर चुकी हैं. उन्होंने 90 विधानसभा क्षेत्रों में से 15 में बढ़त हासिल की थी. हालांकि यहां एक स्पष्ट पैटर्न यह सामने आ रहा है कि अन्य पार्टियों ने कश्मीर घाटी में तो बढ़त बनाई, लेकिन जम्मू में वो ऐसा करने में सफल नहीं हो सकी.

जम्मू में अन्य पार्टियों ने दो सीटों पर 5 से 9 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया. उन्होंने कश्मीर घाटी की तीन सीटों पर 22 से 46 प्रतिशत वोट हासिल किए. सज्जाद लोन, इंजीनियर राशिद और आपनी पार्टी मुख्य रूप से कश्मीर घाटी में सक्रिय हैं. अन्य पार्टियां नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी की संभावनाओं को घाटी में प्रभावित कर रही हैं. यही कारण है कि इन पार्टियों को लगता है कि भाजपा उनके उभरने के पीछे है.

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कश्मीर घाटी का एक वर्ग भाजपा से विशेष दर्जा समाप्त करने को लेकर नाराज है, और इस कारण वह अन्य पार्टियों की ओर झुक रहा है. यहां छोटी पार्टियां और निर्दलीय यह प्रचार कर रहे हैं कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की भाजपा के साथ दोस्ती है और उन्हें वोट नहीं दिया जाना चाहिए.

उमर अब्दुल्ला दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि महबूबा मुफ़्ती चुनाव नहीं लड़ रही हैं. इंजीनियर राशिद की पैरोल से उनकी पार्टी के अभियान को नई ताकत मिली है.

2014 में अन्य पार्टियों ने सात सीटों पर जीत हासिल की — एक लद्दाख में और छह जम्मू और कश्मीर में — और 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया.

अगर वे इस चुनाव में औसतन 20 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हैं, तो वे नई विधानसभा में 15 सीटें जीत सकते हैं, बशर्ते मतदाता 'जीतने वाले अन्य उम्मीदवार' की पक्ष में हो. अगर इन्हें 25 प्रतिशत वोट शेयर मिलता है, तो यह संख्या 16 सीट तक जा सकती है. 30 प्रतिशत वोट शेयर पर यह संख्या 24 सीटों तक जा सकती है. इन सभी परिदृश्यों में जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर त्रिशंकु विधानसभा देखने को मिल सकती है.

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