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14 जिले, दो दर्जन सीटें... झारखंड के कोयलाकर्मियों के प्रभाव वाली सीटों पर क्या हैं इस चुनाव के मुद्दे?

झारखंड चुनाव में कोल्हान और संथाल परगना की रोचक लड़ाई के बीच रीजन-कास्ट से हटकर कम्युनिटी पॉलिटिक्स पर भी नजरें टिकी हैं. सूबे के 14 जिलों की करीब दो दर्जन सीटों पर कोयलाकर्मी प्रभावी हैं. इन सीटों पर चुनावी मुद्दे क्या हैं?

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दो दर्जन सीटों पर कोयलाकर्मी प्रभावी (प्रतीकात्मक तस्वीर)
दो दर्जन सीटों पर कोयलाकर्मी प्रभावी (प्रतीकात्मक तस्वीर)

झारखंड के चुनावों में संथाल और कोल्हान रीजन मुख्य अखाड़ा बने हुए हैं. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के गृह क्षेत्र संथाल परगना में घुसपैठ के मुद्दे को धार देकर बीजेपी सेंध लगाने की कोशिश में जुटी है तो वहीं विपक्षी पार्टी की नजर कोल्हान रीजन पर भी है. कोल्हान टाईगर चंपाई सोरेन के दल बदलने के बाद बदली परिस्थितियों में कोल्हान की जनता किसपर भरोसा करती है, नजरें इस पर भी टिकी हैं लेकिन रीजन और कास्ट पॉलिटिक्स से हटकर कम्युनिटी पॉलिटिक्स की बात करें तो कोयलाकर्मियों के प्रभाव वाले जिलों और विधानसभा सीटें भी चर्चा में हैं.

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कोयलाकर्मियों का प्रभाव केवल कोयलांचल या धनबाद और झरिया विधानसभा सीट तक ही सीमित नहीं है. कोयलाकर्मियों का प्रभाव सूबे के 14 जिलों और करीब दो दर्जन सीटों पर है. झारखंड के 14 जिलों में कोयला खनन का काम होता है और इन जिलों में बड़ी तादाद उन कर्मचारियों की है जो कोयला खनन कंपनियों से संबंधित हैं या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कोयला खनन से जुड़े हैं.

कोयलाकर्मियों के प्रभाव वाली सीटों की बात करें तो इस लिस्ट में कोयलांचल की धनबाद और झरिया सीट के साथ ही रांची, कांके, रामगढ़, बाघमारा, सिंदरी, निरसा, गोमियो, टुंडी, बेरमो, मांडू, गिरिडीह, बड़कागांव, लातेहार, सिमरिया, चंदनकियारी, बोरियो, सारठ, पाकुड़ और महागामा विधानसभा सीट के नाम हैं.

कोलकर्मियों की स्ट्रेंथ कितनी

कोलकर्मियों की स्ट्रेंथ की बात करें तो सूबे में कोयला खनन का काम सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया की तीन कंपनियां करती हैं. इन तीन कंपनियों के साथ ही एनटीपीसी, पंजाब इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, वेस्ट बंगाल पॉवर कॉरपोरेशन जैसी बिजली कंपनियां और कई निजी कंपनियां भी खनन का काम करती हैं. खनन के क्षेत्र में काम कर रही इन कंपनियों में करीब एक लाख नियमित कर्मचारी हैं.

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इन कर्मचारियों के परिवार को भी जोड़ लें तो यह संख्या चार लाख के पार पहुंच जाती है. अनियमित कर्मचारियों और पूर्व कमर्चारियों के साथ ही उनके परिजनों को भी जोड़ लें तो कोयलाकर्मियों की स्ट्रेंथ और भी अधिक हो जाती है. 81 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा की करीब दो दर्जन सीटों पर जीत और हार तय करने में ये कोयलाकर्मी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

कोयलाकर्मियों को साधने के लिए किसने क्या दांव चला

कोयलाकर्मियों को अपने पाले में लाने के लिए राजनीतिक दल वादों की बौछार के साथ ही उनके बीच का उम्मीदवार उतारने पर फोकस किए हुए नजर आती हैं. झारखंड के चुनावी रण में करीब दर्जनभर् ऐसे उम्मीदवार ताल ठोक रहे हैं जो या तो कोयला मजदूर रहे हैं या फिर ट्रेड यूनियन की सियासत से नाता रखते हैं.

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झरिया विधानसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार रागिनीन सिंह ट्रेड यूनियन से जुड़ी हुई हैं तो वहीं बेरमो से कांग्रेस उम्मीदवार अनूप सिंह पार्टी के ट्रेड यूनियन इंटक के पदाधिकारी हैं. सारठ सीट से बीजेपी के विधायक रणधीर सिंह भी कोयलाकर्मियों के यूनियन से जुड़े रहे हैं. निरसा प्रत्याशी अरूप चटर्जी कोल इंडिया कर्मियों की आवाज बुलंद करते रहे हैं. ट्रेड यूनियन से जुड़े रहे उम्मीदवारों की लिस्ट में बाघमारा के कांग्रेस उम्मीदवार जलेश्वर महतो और बड़कागांव से बीजेपी के उम्मीदवार रोशन चौधरी के भी नाम हैं.

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इन इलाकों में मुद्दे क्या हैं?

कोयला खनन के लिए जिन जिलों और इलाकों में जमीन अधिग्रहण किया गया है, वह कोल बियरिंग एक्ट के तहत किया गया है. इस एक्ट के तहत अधिग्रहण में भारत सरकार शामिल है और कानूनी प्रावधान ऐसे हैं कि छोटे-छोटे काम कराने के लिए भी झारखंड सरकार को खनन का काम करा रही संबंधित कंपनी से बाकायदा इजाजत लेनी पड़ती है.

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इजाजत की ये प्रक्रिया इतनी लंबी है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी निधि से कोई विकास कार्य कराने से बचते नजर आते हैं. इसका नतीजा कहें या नीयती, झारखंड की सत्ता तय करने में करीब एक चौथाई भागीदारी रखने वाले इन इलाकों के लोगों को सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी  मशक्कत करनी पड़ती है. आवास और नाली जैसी सरकारी सुविधाएं तो जैसे इन इलाकों तक पहुंच ही नहीं पातीं.

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