scorecardresearch
 

झारखंड में कल्पना ने संभाली प्रचार की बागडोर, महाराष्ट्र में पवार परिवार की फैमिली फाइट... जानिए प्रचार के दौरान छाए रहे कौन से मुद्दे-नारे

महाराष्ट्र, झारखंड से यूपी तक चूुनाव प्रचार का शोर अब थम गया है. चुनाव प्रचार के दौरान महाराष्ट्र की बारामती सीट पर पवार परिवार की फैमिली फाइट चर्चा में रही तो वहीं झारखंड में जेएमएम के अभियान की अगुवाई कल्पना सोरेन ने की. जानिए कौन से नारे, मुद्दे और चेहरे चुनाव प्रचार के दौरान छाए रहे.

Advertisement
X
अजित पवार, शरद पवार और कल्पना सोरेन (फोटोः PTI)
अजित पवार, शरद पवार और कल्पना सोरेन (फोटोः PTI)

महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव के साथ ही यूपी, पंजाब और केरल में उपचुनाव भी हो रहे हैं. इन सीटों के लिए चुनाव प्रचार अब थम गया है. चुनाव प्रचार के दौरान कई नई चीजें देखने को मिलीं. विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों का शोर सुनाई दिया तो साथ ही कई राज्यों में एक ही नारे की गूंज भी. यूपी से लेकर महाराष्ट्र और झारखंड तक योगी आदित्यनाथ के नारे बंटेंगे तो कटेंगे की गूंज सुनाई दी. प्रचार के बाद और वोटिंग से पहले के साइलेंट पीरियड में भी सियासी दलों के नेताओं और समर्थकों के बीच नैरेटिव की लड़ाई जारी है. आइए, नजर डालते हैं महाराष्ट्र, झारखंड के चुनाव और यूपी उपचुनाव में प्रचार के दौरान छाए रहे नारों और मुद्दों पर.

Advertisement

1- छाए रहे ये नारे

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक नारा दिया था- बंटेंगे तो कटेंगे. यूपी से लेकर महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव प्रचार अभियान तक यूपी सीएम के नारे की गूंज प्रचार के अंतिम दौर तक सुनाई देती रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएम योगी के नारे को थोड़ा माइल्ड करते हुए कहा- एक हैं तो सेफ हैं. विपक्षी कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने बीजेपी पर समाज को बांटने का आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया.

राहुल गांधी ने तो चुनाव प्रचार के अंतिम दिन मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 'एक हैं तो सेफ हैं' लिखी तिजोरी के जरिये इस नारे का मतलब तक समझा दिया और इसे अडानी और धारावी से जोड़ दिया. सपा ने बंटेंगे तो कटेंगे को काउंटर करने के लिए पीडीए न बंटेगा, न कटेगा का नारा दिया. झारखंड में सत्ताधारी गठबंधन की अगुवाई कर रही जेएमएम भी अंतिम चरण में न बंटे थे, न बंटे हैं के नारे से अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करती नजर आई.

Advertisement

2- अनुच्छेद 370 का मुद्दा

विधानसभा चुनाव को लेकर ऐसा माना जाता है कि ये लोकल मुद्दों पर लड़े जाते हैं. आम चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दों का अधिक जोर रहता है लेकिन महाराष्ट्र से झारखंड के विधानसभा चुनाव तक प्रचार अभियान के दौरान राष्ट्रीय मुद्दों का शोर भी सुनाई दिया. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 बहाल करने की मांग वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस के एजेंडे को लेकर कठघरे में खड़ा करती नजर आई. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को यह कहना पड़ गया कि कांग्रेस के किस नेता ने कहा है कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 बहाल होना चाहिए, बताइए.

3- किसानों का मुद्दा

इस बार के विधानसभा चुनाव में स्थानीय समस्याओं की गूंज भी खूब सुनाई दी, खासकर महाराष्ट्र में. महाराष्ट्र में चुनाव में विपक्षी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) ने किसानों की समस्याओं को जोर-शोर से उठाया. लड़की बहन योजना जैसी महिलाओं के लिए डायरेक्ट कैश बेनिफिट स्कीम के बावजूद सत्ताधारी महायुति को किसानों का कर्जा माफ करने का वादा अपने संकल्प पत्र में करना पड़ा तो इसके पीछे कृषि समस्याओं को लेकर किसानों की नाराजगी ही वजह बताई जा रही.

4- गद्दार और इमोशनल कार्ड

महाराष्ट्र के चुनाव प्रचार में गद्दार का शोर भी खूब रहा. शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के एकनाथ शिंदे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के प्रमुख शरद पवार ने एनसीपी (एपी) के अजित पवार को पूरे प्रचार अभियान के दौरान बगावत को आधार बनाकर गद्दार बताते रहे. वहीं, चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को गद्दार बताते हुए कहा कि उनकी वजह से ही सभी शिवसेना छोड़ने को मजबूर हुए. वहीं, झारखंड चुनाव में प्रचार के अंतिम दिन जेएमएम ने शिबू सोरेन की तस्वीर के साथ अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापन देकर झारखंड राज्य गठन के लिए आंदोलन का जिक्र कर इमोशनल कार्ड चला.

Advertisement

5- माहिम और बारामती की फाइट

महाराष्ट्र चुनाव में माहिम और बारामती, दो सीटों की फाइट भी चर्चा में रही. माहिम सीट से राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सिंबल पर चुनाव मैदान में हैं. अमित के सामने महायुति की ओर से शिवसेना (एकनाथ शिंदे) के तीन बार के विधायक सदा सरवणकर की चुनौती है. बीजेपी इस सीट पर राज की पार्टी का समर्थन कर रही है. वहीं बारामती के मैदान में अजित पवार के सामने उनके ही भतीजे युगेंद्र पवार की चुनौती है. अजित पवार की ओर से प्रचार के लिए उनकी मां भी उतर आईं तो वहीं युगेंद्र के लिए शरद पवार की पत्नी के साथ ही सुप्रिया सुले ने बागडोर संभाली.

6- झारखंड में फ्रंटफुट पर कल्पना सोरेन

झारखंड का मुख्यमंत्री रहते जब हेमंत सोरेन को जेल जाना पड़ा था तब मुख्यमंत्री के लिए उनकी पत्नी कल्पना सोरेन का नाम भी चर्चा में रहा था. उपचुनाव में गांडेय विधानसभा सीट से पहली बार विधायक निर्वाचित हुईं कल्पना सोरेन इस बार जेएमएम के प्रचार अभियान की अगुवाई करती नजर आईं. कल्पना सोरेन ने प्रचार थमने तक 98 रैलियां कीं. सीएम हेमंत रैलियों के मामले में 92 कार्यक्रमों के साथ पत्नी कल्पना के बाद दूसरे नंबर पर रहे.

Advertisement

7- झारखंड में बीजेपी के हिमंता ने संभाली कमान

बीजेपी की ओर से चुनाव अभियान की कमान असम के मुख्यमंत्री और सह चुनाव प्रभारी हिमंत बिस्व शर्मा ने संभाली. हिमंत ने कुल 53 चुनावी रैलियां कीं. वहीं, बीजेपी के झारखंड चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुल 48 जनसभाओं को संबोधित किया. बीजेपी के लोकल नेताओं की बात करें तो सबसे अधिक कार्यक्रम पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के हुए. चुनावी मौसम में जेएमएम छोड़ बीजेपी में आए पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने भी ताबड़तोड़ रैलियां कीं. पीएम मोदी की झारखंड में करीब आधा दर्जन रैलियां ही हुईं.

यह भी पढ़ें: 'झारखंड में बांग्लादेशियों की घुसपैठ केंद्र की विफलता', आजतक से बोलीं कल्पना सोरेन

8- घुसपैठ और डेमोग्राफी चेंज

झारखंड के चुनाव में घुसपैठ का मुद्दा चुनाव प्रचार की शुरुआत से अंत तक छाया रहा. बीजेपी ने संथाल परगना में घुसपैठियों की वजह से डेमोग्राफी चेंज का मुद्दा उठाते हुए जेएमएम और कांग्रेस गठबंधन की सरकार को खूब घेरा. संथाल परगना सीएम हेमंत सोरेन का गृह क्षेत्र है. जेएमएम इस इलाके में हेमंत की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ कार्रवाई को मुद्दा बनाकर आदिवासी अस्मिता की पिच पर बीजेपी को घेर रही थी. कोल्हान रीजन में आदिवासी अस्मिता की पिच पर जेएमएम की रणनीति को काउंटर करने के लिए चंपाई सोरेन को आगे कर दिया.

Advertisement

यह भी पढ़ें: 13% वोट, 3 फोकस्ड लोकल पार्टियां और नेशनल दलों का एजेंडा... फिर भी आंबेडकर के महाराष्ट्र में दलित पॉलिटिक्स हाशिए पर क्यों है?

9- आरक्षण और संविधान

राज्यों के चुनाव में आरक्षण और संविधान का शोर भी खूब सुनाई दिया. लोकसभा चुनाव में सीटें कम होने के बाद राज्यों के चुनाव में भी बीजेपी के नेता अपनी रैलियों में लगातार कांग्रेस को आरक्षण विरोधी बताते रहे, यह कहते रहे कि कांग्रेस आरक्षण समाप्त करने की बात करती है. झारखंड में प्रचार के अंतिम चरण में एनडीए की एक चुनावी जनसभा में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने तो यहां तक कहा कि जब तक जिंदा हूं, आरक्षण कोई समाप्त नहीं कर सकता.

यह भी पढ़ें: 'बंटेंगे तो कटेंगे' पर अजित पवार का मुखर विरोध क्या महायुति के लार्जर गेमप्लान का हिस्सा है?

10- विकास की बात

हर राज्य में सियासी दल विकास की बात करते भी नजर आए. महाराष्ट्र में महायुति ने ढाई साल के कार्यकाल में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में किए गए कार्य गिनाते हुए वोट मांगे. वहीं, एमवीए ने भी विकास के वादे किए. महाराष्ट्र में दोनों ही दलों ने अपने-अपने चुनाव अभियान का आगाज विकास के वादों के साथ किया था जो अंतिम चरण आते-आते गद्दार तक पहुंच गया. झारखंड में भी पक्ष-विपक्ष ने विकास के साथ-साथ रोटी-बेटी-माटी और आदिवासी अस्मिता को अपने प्रचार अभियान की धुरी बनाया.

Advertisement

यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र: जोड़-तोड़ की सियासत के बीच किसे मिलेगी सूबे की गद्दी? क्या कारगर होगा 'नारों का खेल'?

मतदान की घड़ी करीब आ गई है. चुनावी राज्यों की जनता अगले पांच साल के लिए अपनी नई सरकार चुनने, भाग्य विधाता चुनने के लिए 20 नवंबर को मतदान करेगी. जनता किन मुद्दों पर मुहर लगाती है, किसके वादों पर यकीन कर मतदान करती है, यह 23 नवंबर को मतगणना के बाद जब नतीजे आएंगे तभी साफ हो सकेगा.

Live TV

Advertisement
Advertisement