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Maharashtra Chunav 2024: प्याज, कॉटन और सोयाबीन... महाराष्ट्र में फसलों की कीमतें कैसे बन गईं चुनावी मुद्दा?

Maharashtra Vidhan Sabha Chunav 2024: किसानों के लिए सोयाबीन, इस बार घाटे का सौदा साबित हो रही है. किसानों का कहना है कि 2021 में सोयाबीन का भाव खुले बाजार में 9,000 से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल तक था, जबकि उस समय का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) केवल 3,950 रुपये प्रति क्विंटल था. अब, 2024 में MSP बढ़ाकर 4,892 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है.

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में फसलों की कीमतें बनीं मुद्दा (फाइल फोटो)
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में फसलों की कीमतें बनीं मुद्दा (फाइल फोटो)

Maharashtra Assembly Elections 2024: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसानों के मुद्दे ने राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं. राज्य में सोयाबीन, कपास और प्याज की कीमतों को लेकर किसान अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं. प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री, मुख्यमंत्री, और उपमुख्यमंत्री अपने-अपने तरीके से सफाई दे रहे हैं और किसानों को राहत देने के वादे कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल रहा है.

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सोयाबीन के दाम: MSP से भी कम कीमतों पर बेचने को मजबूर
किसानों के लिए सोयाबीन, इस बार घाटे का सौदा साबित हो रही है. किसानों का कहना है कि 2021 में सोयाबीन का भाव खुले बाजार में 9,000 से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल तक था, जबकि उस समय का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) केवल 3,950 रुपये प्रति क्विंटल था. अब, 2024 में MSP बढ़ाकर 4,892 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है, लेकिन खुले बाजार में दाम घटकर केवल 3,800 से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है. किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा खाद्य तेलों पर आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) को लगभग शून्य करना था, जिससे बाजार में कीमतें गिर गईं.

हालांकि, अब चुनावी माहौल में आयात शुल्क बढ़ाकर 27.5% कर दिया गया है, लेकिन किसानों का कहना है कि बाजार को स्थिर होने में समय लगेगा.

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कपास की कीमतों पर भी संकट
महाराष्ट्र, देश का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राज्य है, यहां किसानों को इस बार कपास की कीमतें भी निराश कर रही हैं. जनवरी 2022 में कपास का बाजार मूल्य 8,000 से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि MSP 6,025 रुपये प्रति क्विंटल थी. इस साल, कपास का MSP 7,521 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन बाजार में दाम केवल 7,100 रुपये तक हैं. किसानों का आरोप है कि केंद्र सरकार के कपास आयात के फैसले से बाजार में कीमतें गिरी हैं.

प्याज: चुनाव के बाद एक्सपोर्ट बैन का डर
प्याज का मामला भी राजनीतिक हथियार बन गया है. इस समय प्याज की कीमतें किसानों को राहत दे रही हैं, लेकिन किसान नेता आशंका जता रहे हैं कि चुनाव खत्म होते ही केंद्र सरकार प्याज के निर्यात पर दोबारा प्रतिबंध लगा सकती है. पूर्व सांसद और किसान नेता राजू शेट्टी ने आरोप लगाया कि जब प्याज का दाम 3,000 रुपये प्रति क्विंटल था, तब सरकार ने एक्सपोर्ट बैन लगा दिया था. अब जब दाम 4,000-5,000 रुपये प्रति क्विंटल है, तो सरकार चुनावी मजबूरी के कारण चुप है.

सरकारी नीतियों पर उठे सवाल
सरकारी नीतियों को लेकर किसानों में भारी आक्रोश है. कृषि मंत्रालय और उपभोक्ता मंत्रालय के बीच समन्वय की कमी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की बनाई  समिति के सदस्य रहे अनिल घनवट, ने कहा कि सरकारी हस्तक्षेप ने किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को नुकसान पहुंचाया है. उनका कहना है कि सरकार ने प्याज की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए किसानों को कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर किया. इस वजह से किसानों ने प्याज की खेती कम कर दी, जिससे उत्पादन घट गया और अब कीमतें आसमान छू रही हैं.

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किसानों का गणित: नुकसान कितना बड़ा?
राजू शेट्टी ने बताया कि 2022 में सोयाबीन का भाव 9,000 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि अब 3,800 से 4,200 रुपये के बीच है. इस तरह किसानों को 5,000 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो रहा है. औसतन एक एकड़ में 10 क्विंटल सोयाबीन की पैदावार होती है, जिससे किसानों को प्रति एकड़ 50,000 रुपये का नुकसान हो रहा है. सरकार की तरफ से किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के तहत सालाना 6,000 रुपये मिलते हैं, लेकिन यह राशि किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए नाकाफी है.

कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार ने सोयाबीन की खरीद के लिए नमी की सीमा 12% से बढ़ाकर 15% कर दी है. साथ ही, पाम ऑयल पर आयात शुल्क बढ़ाने और प्याज के निर्यात से प्रतिबंध हटाने जैसे कदम उठाए हैं. लेकिन किसान नेताओं का कहना है कि ये फैसले केवल चुनावी माहौल को देखते हुए लिए गए हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसान घाटे में थे, तब सरकारी खरीद क्यों नहीं की गई?

क्या सरकार किसानों का विश्वास जीत पाएगी?
महाराष्ट्र के किसानों का गुस्सा चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है. अब यह देखना बाकी है कि सरकार के वादे और दावे किसानों को भरोसा दिलाने में कामयाब होते हैं या नहीं. विपक्ष इन मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहा है, और किसानों की नाराजगी सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन सकती है. कुल मिलाकर, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसान और उनकी फसलें सबसे बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उभरी हैं.
 

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