जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजे आज घोषित होंगे. उससे पहले जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष रविंद्र रैना मंगलवार सुबह जम्मू के मां दुर्गा अष्टभवानी मंदिर में दर्शन-पूजन करने पहुंचे. यहां पत्रकारों ने उनसे चुनाव नतीजों के बारे में पूछा तो रविंद्र रैना में भरोसा जताया कि बीजेपी जम्मू रीजन में बेहतरीन प्रदर्शन करेगी और अपने दम पर 35 से अधिक सीटें जीतने में सफल होगी. उन्होंने कहा, 'मां दुर्गा ने राष्ट्रवादी शक्तियों को जम्मू-कश्मीर चुनाव में अपना आशीर्वाद दिया है. मुझे यकीन है कि यहां दैवीय शक्तियों की जीत होगी.' बता दें कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 90 सीटों के लिए क्रमशः 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को तीन चरणों में चुनाव संपन्न हुए थे.
रविंद्र रैना जम्मू डिवीजन के राजौरी जिले के नौशेरा सीट से चुनाव मैदान में हैं. उन्होंने 2014 के चुनाव में भी इस सीट से जीत हासिल की थी. रैना ने कहा कि उन्हें नौशेरा से एक बार फिर चुनाव जीतने की पूरी उम्मीद है. उन्होंने कहा कि भाजपा और उसके द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों व मित्र दलों की बड़े पैमाने पर जीत होने जा रही है. मुझे विश्वास है कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार बनेगी. एलजी द्वारा जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 5 सदस्यों को मनोनीत करने के मुद्दे पर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस काफी मुखर हैं और इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं.
इस बारे में पूछे जाने पर रविंद्र रैना ने कहा, 'जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एलजी द्वारा पांच विधायकों का मनोनयन संवैधानिक प्रक्रिया है. हमारे देश की संसद में 2023 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन संशोधन बिल पेश किया गया था, जिस पर दोनों सदनों में बहस हुई थी और यह बिल पास हुआ था. जब यह बिल पार्लियामेंट में रखा गया था और इसके प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा हुई थी, तब क्या कांग्रेस सो रही थी. कांग्रेस को आज याद आया है कि जम्मू-कश्मीर असेंबली में पांच नॉमिनेटेड मेंबर्स होंगे. संसद में जब यह बिल पेश हुआ था, तब फारूक अब्दुल्ला, राहुल गांधी वहां मौजूद थे. उस वक्त उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं जताई थी.'
रविंद्र रैना ने कहा कि जब जम्मू-कश्मीर में लंबे अंतराल के बाद नई सरकार का गठन होने जा रहा है, तब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 5 मनोनीत विधायकों का मुद्दा उठाना शुरू किया है. अगर जम्मू-कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है तो क्या बीजेपी पीडीपी या नेशनल कॉन्फ्रेंस से सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाएगी? इस सवाल के जवाब में रविंद्र रैना ने कहा, 'मुझे विश्वास है कि बीजेपी अपने दम पर 30 से 35 सीटें जीतने में सफल रहेगी. इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों में बीजेपी समर्थित 15 प्रत्याशी जीत दर्ज करेंगे, ऐसा मुझे लगता है. कुछ मित्र दलों के कैंडिडेट भी जीत दर्ज करेंगे. इन सभी के साथ बीजेपी सरकार बनाने में सफल होगी.'
क्या है मनोनीत विधायकों का नियम?
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को विधानसभा में पांच सदस्यों को नामित करने का अधिकार है. अगर पांच विधायकों को नामित किया जाता है, तो विधानसभा में सदस्यों की संख्या 95 हो जाएगी. इससे बहुमत का आंकड़ा भी 45 से बढ़कर 48 हो जाएगा. हालांकि, शुरू में पांच सदस्यों को नामित करने का अधिकार नहीं था. जम्मू-कश्मीर रिऑर्गनाइजेशन एक्ट 2019 में प्रावधान किया गया था कि अगर उपराज्यपाल को लगता है कि विधानसभा में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो वो दो सदस्यों को नामित कर सकते हैं.
हालांकि, इस कानून में 2023 में संशोधन किया गया. इसके बाद उपराज्यपाल को तीन और सदस्यों को नामित करने का अधिकार मिल गया. अब उपराज्यपाल दो कश्मीरी प्रवासियों और पीओके से विस्थापित एक सदस्य को नामित कर सकते हैं. दो कश्मीरी प्रवासियों में से एक महिला होगी. कश्मीरी प्रवासी उसे माना जाएगा जिसने 1 नवंबर 1989 के बाद घाटी या जम्मू-कश्मीर के किसी भी हिस्से से पलायन किया हो और उसका नाम रिलीफ कमीशन में रजिस्टर हो. वहीं, जो भी व्यक्ति 1947-48, 1965 या 1971 के बाद पीओके से आया होगा, उसे विस्थापित माना जाएगा.
क्या एलजी अपने हिसाब से नामित कर सकते हैं?
जम्मू-कश्मीर के पूर्व लॉ सचिव मोहम्मद अशरफ मीर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जम्मू-कश्मीर रिऑर्गनेजाइशन एक्ट में प्रावधान है कि कानून से जुड़े मामलों में उपराज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करेंगे. लेकिन इसमें सदस्यों को नामित करने के लिए किसी की सलाह लेने की जरूरत नहीं है. इसके मतलब हुआ कि उपराज्यपाल अपने विवेक के आधार पर सदस्यों को नामित कर सकते हैं.
जबकि, एक और वकील शरीक रियाज का कहना है कि एलजी विधानसभा में सदस्यों को एकतरफा नामित नहीं कर सकते. ये संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत स्टेट लिस्ट में आता है, जिसके मुताबिक उपराज्यपाल मंत्रि परिषद की सलाह और सहायता पर काम करेंगे. पुडुचेरी जैसी ही विधानसभा होने के सवाल पर रियाज ने कहा कि पुडुचेरी हमेशा से केंद्र शासित प्रदेश था, जबकि जम्मू-कश्मीर एक राज्य था और उसे बाद में केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया. इतना ही नहीं, पुडुचेरी के कानून के मुताबिक, विधानसभा में सदस्यों को केंद्र सरकार नामित करेगी. जबकि, जम्मू-कश्मीर के मामले में ये अधिकार उपराज्यपाल को दिया गया है.
नामित सदस्यों को वोटिंग का अधिकार होगा?
जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन कानून के मुताबिक, विधानसभा में सदस्यों को नामित करने का अधिकार उपराज्यपाल के पास होगा, लेकिन क्या ये सदस्य सरकार गठन में भूमिका निभा सकते हैं और अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग कर सकते हैं? इसे पुडुचेरी के नामित सदस्यों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समझते हैं. पुडुचेरी में तीन सदस्यों को नामित किया जाता है और इनके पास भी वही सारे अधिकार होते हैं जो चुने हुए विधायकों के पास होते हैं.
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के तीन बीजेपी नेताओं को सदस्यों के रूप में नामित करने के फैसले को बरकरार रखने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. केंद्र सरकार ने 2018 में पुडुचेरी में तीन बीजेपी नेताओं को विधायकों के रूप में नामित किया था. इसे मद्रास हाईकोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि केंद्र ने ऐसा करने से पहले राज्य सरकार से सलाह नहीं ली थी. मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में कुछ भी गलत नहीं पाया था और मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि 1963 के कानून के तहत, केंद्र सरकार को पुडुचेरी विधानसभा में तीन सदस्यों को नामित करने से पहले राज्य सरकार की सलाह लेने की जरूरत नहीं है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि पुडुचेरी में नामित और चुने हुए विधायकों में कोई फर्क नहीं है. चुने हुए विधायकों की तरह ही नामित विधायक भी अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास प्रस्ताव और बजट पर वोटिंग कर सकते हैं.
J-K में क्या है पार्टियों का रुख?
जम्मू-कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता और वकील सुनील सेठी ने कहा कि ये कानून 2019 से ही बहुत साफ है. मनोनीत सदस्यों की शक्तियों पर आपत्ति जताने वालों ने न तो संविधान पढ़ा है और न ही जम्मू-कश्मीर रिऑर्गनाइजेशन एक्ट. अगर उन्हें इससे दिक्कत है तो उन्हें चुनाव में हिस्सा ही नहीं लेना चाहिए था. कांग्रेस महासचिव गुलाम अहम मीर ने कहा कि किसी पार्टी का पक्ष लेने के इरादे से विधायकों को नामित करना असंवैधानिक है और कोई भी अदालत इसकी इजाजत नहीं देगी. नामांकन प्रक्रिया गैर-राजनीतिक होनी चाहिए और हमेशा स्कॉलर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नामित किया जाना चाहिए. वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता रतन लाल गुप्ता ने कहा कि ये कदम असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है. विधायकों को नामित करने के अधिकार समेत सभी विधायी शक्तियां चुनाव के बाद सरकार के पास आ जाती हैं. जबकि, पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हमें अब तक नहीं पता है कि बहुमत हासिल करने के लिए 46 के आंकड़े तक पहुंचना होगा या 48 तक. ऐसा लगता है कि चुनाव नतीजों के आधार पर इसका इस्तेमाल करने की जानबूझकर कोशिश की जा रही है.