पश्चिम बंगाल में खेला हो गया. 213 सीटें जीतकर टीएमसी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. लेकिन इस सियासी खेल की माहिर ममता बनर्जी के साथ भी एक खेला हो गया. वो ये कि नंदीग्राम की सीट पर बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी से उन्हें मुंह की खानी पड़ी है. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा की एक कटोरी खीर में कोई दो बूंद सरसो तेल डाल दे. या फिर दाल रोटी खा रहे हों और आख़िरी निवाले में कंकड़ पड़ जाए. ख़ैर एक बात तो थी नंदीग्राम में मामला था बड़ा दिलचस्प. कभी ममता आगे, तो कभी शुभेंदु आगे और एक वक़्त तक तो ममता की जीत भी घोषित हो ही गई थी लेकिन फिर चुनाव आयोग ने दलील देते हुए सुवेंदु के नाम पर जीत की मुहर लगा दी. अब ममता को अपनी हार पच नहीं रही. तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन कार्यालय, पश्चिम बंगाल को चिट्ठी लिखकर फिर से मतगणना की मांग की है. साथ ही चुनाव परिणाम के खिलाफ कोर्ट जाने की बात कही है. ममता ने कल इंडिया टुडे से भी बातचीत की और इस दौरान वे जमकर बीजेपी और मोदी शाह की जोड़ी पर बरसीं. उन्होंने कहा कि मोदी शाह की विचारधारा बिल्कुल अलग तरह की है. आप उन पर भरोसा नहीं कर सकते वे कुछ दंगा, ध्रुवीकरण कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन सवाल ये है कि राज्य में प्रचंड बहुमत के बावजूद नंदीग्राम में ममता बनर्जी ग़लती कहां कर गईं?
बंगाल का रण ममता को जिताने के पीछे प्रशांत किशोर की रणनीति काम आई ही गई. बीजेपी सीटों में दहाई के आंकड़े को पार नहीं सकी. सब जानते हैं कि पीके बहुत नपा तुला और बहुत सोच समझकर बोलते हैं. चुनाव नतीजों के दिन उनका और उनकी टीम आईपैक का पर्दे के पीछे किया गया काम बोलता है. कल जब आज तक से प्रशांत किशोर ने बात की और बीजेपी की चूक के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि बीजेपी अपना चुनाव पुरानी रणनीति पर ही लड़ती रही और इसलिए उसकी ये हालत हुई.
अच्छा जब प्रशांत किशोर ने ये कहा था कि बीजेपी 100 सीटें नहीं ला पाएगी बंगाल में, तो उन्होंने एक दावा और किया था. उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा हो गया तो वे चुनावी रणनीति का काम छोड़ देंगे लेकिन कल जब उनकी कही बात सच हो गई. बीजेपी..... पर सिमट गई. तब भी उन्होंने ऐलान किया है कि वो ये काम अब छोड़ रहे हैं. आख़िर क्यों? इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का बाज़ार गर्म है. इस पर भी बात होगी और जानेंगे कि पीके का अनुमान इतना सटीक बैठा इसका क्या कारण रहा?
देश में कोरोना की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है और रोजाना दर्ज़ किये जा रहे नम्बर्स एक नया रिकॉर्ड बना रहे हैं, कभी इन्फेक्टेड मरीज़ों की संख्या के लिहाज़ से तो कभी मृतकों की संख्या के हिसाब से पिछले 24 घंटे में भी देश में क़रीब 3 लाख 92 हज़ार के करीब संक्रमित मरीज सामने आये हैं. देश के ज़्यादातर राज्यों की स्थिति कमोबेश ख़राब ही है. और इस सिलसिले में राजधानी दिल्ली भी अछूती नहीं। कल दिल्ली में ऑक्सीजन की किल्लत के मसले पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि दिल्ली को ऑक्सीजन का अपना अलोटेड कोटा भी नहीं मिल रहा। दिल्ली सरकार की दलील और केंद्र की दलील सुनने के बाद HC ने कहा है कि दिल्ली को मिल रहे ऑक्सीजन सप्लाई पर केंद्र और दिल्ली सरकार के आंकड़ों के बीच ख़ामियां हैं। इसके अलावा हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को ये भी अस्योर करने को कहा कि कोई भी दवा या मेडिकल इक्विपमेंट MRP से अधिक दाम पर न बेचे जाएं.
वहीं जो बाइडेन प्रशासन के चीफ मेडिकल ऑफिसर और महामारी एक्सपर्ट डॉ. एंथनी फाउची ने भारत कोविड की चेन को तोड़ने के लिए कुछ दिन का शटडाउन करने का सुझाव दिया है. उन्होंने कहा है कि चीन की तरह यहां अस्थाई अस्पताल बनाने चाहिए और वैक्सीन तेज़ी से लगानी होगी. उधर कोविड से बिगड़ती स्थिति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक्सपर्ट्स के साथ कल बैठक भी हुई. बैठक में पीएम मोदी ने ऑक्सीजन किल्लत पर चर्चा की. साथ ही कुछ और हेल्थकेयर वर्कर्स से जुड़े दूसरे पहलुओं पर भी बात की. कहा जा रहा कि मीटिंग में इस बात पर सहमति बनी है कि MBBS के पास आउट छात्रों को भी कोविड ड्यूटी पर लगाया जा सकता है.
कोरोना की दूसरी लहर की जद में देश दिन ब दिन और जकड़ता जा रहा है. और इस चुनौती से लोगों को केवल वैक्सीन ही बचा सकती है. लेकिन क्या देश में पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन बन रही है ? जवाब है, नहीं. 1 मई से होने वाले टीकाकरण अभियान में ज्यादातर राज्यों ने हाथ खड़े कर दिए हैं. वजह सिर्फ एक ही वैक्सीन की कमी। तो इससे कैसे निपटा जाए? फिलहाल भारत में वैक्सीन बनाने का पेटेंट सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया और भारत बॉयोटेक के पास है लेकिन पेटेंट एक्ट 1970 के अंतर्गत सरकार compulsory licensing को अनुमति दे कर के वैक्सीन मेन्युफ़ैक्चरिंग की मुश्किल को हल कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को compulsory licensing का सुझाव दिया है और अब तो आरएसएस का स्वदेशी जागरण मंच भी इसकी मांग कर रहा है लेकिन क्या ये इतना आसान है और क्या सरकार इसे वास्तव में कर सकती है?पब्लिक पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम एक्पर्ट डॉ. चंद्रकांत लहरिया से जानेंगे.
इसके अलावा अख़बारों से सुर्ख़ियां होंगी.आज के दिन की इतिहास में अहमियत बताएंगे. तो सुनिए 'आज का दिन' अमन गुप्ता के साथ.