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बंगाल चुनाव: क्या कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन टीएमसी के लिए वोटकटवा साबित होगा?

टीएमसी के चुनाव पंडितों को लगता है कि बीजेपी को लोकसभा चुनाव में लेफ्ट के हिस्से का वोट मिला. उस समय कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन आज की तरह संरचित नहीं था. इसलिए टीएमसी नेताओं ने बंगाल के वामपंथी मतदाताओं से आह्वान दिया कि वे बीजेपी की 'सांप्रदायिकता' को रोकने के लिए टीएमसी को वोट दें. 

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ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पश्चिम बंगाल में चुनाव की जोर-शोर से तैयारी
  • बीजेपी और टीएमसी के बीच कड़ा मुकाबला
  • कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन से टीएमसी को नुकसान?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार का कार्यकाल 30 मई को खत्म होने जा रहा है. लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले सवाल है कि क्या बंगाल हरे से भगवा हो जाएगा. 2013 के बंगाल चुनावों में बीजेपी आज की तुलना में एक कमजोर पार्टी हुआ करती थी. लेकिन अब हालात बदले हुए हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके खाते में राज्य की 18 सीटें आईं. बीजेपी ने बंगाल में अपनी जमीन बनाई. इसे कोई नहीं नकार सकता. 

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2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की सीट 2 से बढ़कर 18 हुईं. यही नहीं उसके वोट शेयर में 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. राज्य की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी 12 सीटों पर चुनाव हार गई. वो 34 सीटों से सिमट कर 22 पर आ गई. उसके वोट शेयर में भी 12 फीसदी की गिरावट आई. 

टीएमसी के चुनाव पंडितों को लगता है कि बीजेपी को उस चुनाव में लेफ्ट के हिस्से का वोट मिला. उस समय कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन आज की तरह संरचित नहीं था. इसलिए टीएमसी नेताओं ने बंगाल के वामपंथी मतदाताओं से आह्वान दिया कि वे बीजेपी की "सांप्रदायिकता" को रोकने के लिए टीएमसी को वोट दें. बंगाल के चुनावी कुरुक्षेत्र में यह एक नया दिलचस्प मोड़ है. 

सौगत रॉय ने क्या कहा था

सौगत रॉय ने कहा था कि अगर लेफ्ट और कांग्रेस बीजेपी विरोधी ताकत हैं, तब उन्हें टीएमसी के साथ लग जाना चाहिए, क्योंकि वही एक पार्टी जो बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ लड़ रही है. सौगत रॉय से पहले टीएमसी के एक और नेता तपस रॉय ने भी यही बात कही थी. तो ऐसे में ये सौगत रॉय के निजी विचार नहीं. ये पार्टी का बयान है. 

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लेकिन क्यों. कोई महागठबंधन या ग्रैंड अलायंस नहीं है. पिछले चुनाव में ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ गठबंधन करने को इच्छुक नहीं थीं. उन्होंने सीट शेयरिंग पर कांग्रेस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. हालांकि एक समय कांग्रेस का एक वर्ग बंगाल में धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के रूप में सीट बंटवारे में दिलचस्पी रखता था. लेकिन सिर्फ अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्ती चुनाव पूर्व गठबंधन के इच्छुक नहीं थे. 

ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सीपीएम उनसे सिर्फ एक बार मिली. 9 जून, 2014 को सीपीएम के टॉप लीडर्स के एक प्रतिनिधिमंडल ने लेफ्ट पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार के खिलाफ एक ज्ञापन ममता बनर्जी को दिया था. ममता बनर्जी ने उस दिन शानदार मेजबानी की थी.

लेफ्ट पार्टियों के नेताओं को फिश फ्राई, केक, मिठाई और डार्जिलिंग टी पेश की गई थी. लेकिन ममता बनर्जी ने उस समय किसी कारण बीजेपी के प्रतिनिधमंडल से मुलाकात नहीं की थी. 31 मई, 2014 को बीजेपी नेताओं ने मुख्य सचिव से मुलाकात की. वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से नहीं मिले. 

फिश फ्राई डिप्लोमेसी के बाद, सीपीएम नेताओं का एक वर्ग नाखुश था. उन्होंने पार्टी नेतृत्व को बताया था कि बीजेपी हमारी मुख्य दुश्मन हो सकती है, लेकिन अगर हम टीएमसी और ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं लड़ते हैं तो हमारा राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो जाएगा. बंगाल कांग्रेस के नेताओं ने भी कहा था कि हमारी प्राथमिकता 2024 नहीं, 2021 है.

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लेकिन शरद पवार का इसपर अलग मत है. उन्होंने हाल ही में सीताराम येचुरी और सीपीआई नेता डी राजा से मुलाकात की थी. उन्होंने कम्युनिस्ट नेताओं को बताया था कि वो ऐसा कुछ भी ना करें जिससे बीजेपी को फायदा हो. लेफ्ट और कांग्रेस सरकार तो नहीं बना सकती लेकिन वो टीएमसी को बाहर रख सकती हैं. 

शरद पवार को लगता है कि अगर बीजेपी बंगाल में जीत हासिल करती है तो 2024 के चुनाव के लिए उसमें भारी उत्साह भर जाएगा. इससे मोदी को फायदा होगा. शरद पवार का मानना है कि अगर ममता सत्ता में वापसी कर लेती हैं तो मोदी विरोधी विपक्षी एकता बढ़ जाएगी. शरद पवार ममता बनर्जी से मुलाकात भी करते रहते हैं. किसानों के मुहिम को देखते हुए शरद पवार अचानक से एक्टिव भी हो गए हैं. 

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बीजेपी नेतृत्व कह रहा है कि टीएमसी को क्यों लगता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने लेफ्ट के ही वोट काटे. हमने टीएमसी के भी वोट काटे, जिससे वो इनकार कर रही है. विवाद को ममता बनर्जी अलग तरीके से लेती हैं. पहला वो सोचती हैं कि लोकसभा चुनाव के नतीजे फिर से नहीं दोहराए जाएंगे.

आमतौर, पर लोकसभा चुनाव के नतीजे विधानसभाओं में दोहराए नहीं जाते. दूसरा वो ये सोचती हैं कि लेफ्ट और कांग्रेस जीरो हैं. टीएमसी और बीजेपी में ही मुकाबला है. ऐसे में बीजेपी विरोधी मतदाताओं को टीएमसी को वोट करना चाहिए, ताकि उनका वोट बेकार ना जाए. यहां तक ​​कि लेफ्ट वोटर्स भी विचारधारा और बंगाली पहचान की राजनीति पर सोचते हैं. यह कहना गलत होगा कि दीदी डरी हुई हैं. ये बीजेपी के बंगाल मिशन की जवाबी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है. 

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(ये लेख जयंत घोषाल ने लिखा है जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मीडिया एडवाइजर हैं.)


 

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