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पश्चिम बंगाल में एकबार फिर से टीएमसी का परचम लहराया है. बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की जीत से विपक्ष को ऑक्सीजन मिलता नजर आया है. कई राज्यों में गैर बीजेपी पार्टियों की सत्ता खिसकने के बाद बंगाल में भी कयास लगाए जा रहे थे कि शायद बीजेपी इस बार बंगाल की सत्ता अपने नाम कर ले लेकिन बंगाल की जनता ने दीदी को एक बार फिर सत्ता सौंपी है. ममता की इस जीत से उनका राजनीतिक कद भी बढ़ा है और विपक्ष के एकछत्र नेता के तौर पर उनकी दावेदारी मजबूत हुई है.
तीसरी बार पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतकर ममता ने ये साबित कर दिया कि राज्य में उनसे लोकप्रिय नेता कोई और नहीं है. लेकिन क्या बंगाल जीतकर अब ममता दिल्ली कूच करेंगी ? क्योंकि ममता ने तीसरी बार बहुमत हासिल कर एकाएक अपना कद राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ा लिया है.
ममता बनाम मोदी
इन चुनावों में ममता बनर्जी अगर तृणमूल का चेहरा थीं तो बीजेपी का चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे. नतीजों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या ममता अब मोदी विरोधी विपक्ष का भी देशभर में नेतृत्व करेंगी? ममता भी कहीं न कहीं ऐसा करना चाहती हैं. इसी सिलसिले में उन्होंने 31 मार्च 2021 को पश्चिम बंगाल चुनाव के बीच 15 दलों को चिट्ठी लिखकर एक जुट होने की अपील की थी. ममता बनर्जी ने लिखा था, मेरा मानना है कि लोकतंत्र और संविधान पर बीजेपी के हमलों के खिलाफ एकजुट और प्रभावी संघर्ष का समय आ गया है. ममता ने ये चिट्ठी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखी थी.
पहले भी की थी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश
मोदी विरोधियों को एकजुट करने की ये उनकी पहली कोशिश नहीं थी. इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनावों के समय उन्होंने 22 दलों के 24 नेताओं को एक मंच पर लाकर विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया था. ममता बनर्जी के बुलावे पर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और RJD नेता तेजस्वी यादव भी पहुंचे थे.
ममता बन सकती हैं विपक्ष की एकछत्र नेता ?
अब सवाल ये है कि पश्चिम बंगाल तीसरी बार जीतकर ममता अपने इस काम को और आगे बढ़ाएंगी. क्या विपक्ष की तरफ से वो मोदी को सीधे चुनौती देंगी क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ है. कांग्रेस आंतरिक मतभेदों में उलझी है. मौजूदा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राहुल गांधी की क्षमता पर गहरी चोट की है. शरद पवार हों या फिर मायावती-अखिलेश, उद्धव ठाकरे हों या फिर चंद्र बाबू नायडू, विपक्ष के किसी भी नेता में सीधे मोदी को टक्कर देने का सामर्थ्य नहीं है. ऐसे में ममता क्या विपक्ष की एकछत्र नेता बन सकती हैं. ये बड़ा सवाल है.
ज्योति बसु से ममता की तुलना
बंगाल में ममता की तुलना अब ज्योति बसु से हो रही है. जिनके नेतृत्व में लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल में 23 साल राज किया. लेफ्ट को सत्ता से खदेड़ने का असंभव काम करने वाली ममता ही थीं. जो साल 2011 से पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही हैं और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं.
बीजेपी को दी कड़ी चुनौती
बीजेपी ने बंगाल जीतने के लिए ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाए लेकिन ममता ने बंगाली गौरव और संस्कृति के हथियार से बीजेपी के ध्रुवीकरण करने के प्रयासों को बेकार कर दिया. ये दिखा दिया कि बीजेपी को सीधी टक्कर देने में उनका कोई सानी नहीं है. ऐसे में बाकी राज्यों में विपक्ष ममता की रणनीति और उनके नेतृत्व को स्वीकार कर सकता है. ये बात मजबूत होगी कि क्षेत्रीय दल ही बीजेपी को रोक सकते हैं. ऐसे में सवाल ये है कि क्या मोदी को हटाने के लिए कांग्रेस अपनी महत्वाकांक्षा को सीमित करेगी ?
बीजेपी की 2024 की तैयारियों को लग सकता है झटका
पिछले चुनावों में यूपी बिहार समेत उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की है. पार्टी को लगता है कि अगले चुनाव में यहां उसे सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा. इसीलिए बंगाल उसके केंद्र में था लेकिन विधानसभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना मुश्किल होगा क्योंकि जीत से उत्साहित तृणमूल कांग्रेस उसके खिलाफ पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक तेवर के साथ सामने आएगी जिससे बीजेपी की 2024 की तैयारियों को झटका लग सकता है.
(आजतक ब्यूरो)