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CM रहते चुनाव हारे कॉमरेड भट्टाचार्य, बंगाल का इंडस्ट्रियल लैंडस्केप बदलने का बुद्धदेब विजन रहा फेल

कॉमरेड बुद्धदेब भट्टाचार्य वाम की धारा के विपरित चले, बंगाल में उन्होंने 'कोर्स करेक्शन' की पहल की. 'बिग इंडस्ट्री' और 'बिग कैपिटल' से मार्क्सवादियों का जो चिर-परिचित विरोध था उसे उन्होंने बदलने की कोशिश की थी.

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पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम बुद्धदेब भट्टाचार्य (फोटो-इंडिया टुडे)
पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम बुद्धदेब भट्टाचार्य (फोटो-इंडिया टुडे)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • औद्योगीकरण की कोशिश नाकाम रही, चुनाव भी हारे कॉमरेड
  • 10 साल से ज्यादा बंगाल के सीएम रहे बुद्धदेब भट्टाचार्य
  • सिंगुर और नंदीग्राम की हिंसा ने वामपंथ की लुटिया डुबोई

बुद्धदेब दा बंगाल के मुख्यमंत्री रहते जब उद्योगपतियों से मिलते तो उनसे अक्सर कहा करते कि ऑक्सफोर्ड की इंग्लिश डिक्शनरी में बंगाल का एक मात्र योगदान रहा है और ये है 'घेराव'. बुद्धदेब भट्टाचार्य लेफ्ट सरकार की इस छवि को तोड़ना चाहते थे. इसलिए वो कॉमरेड धारा के विपरित चले, बंगाल में उन्होंने 'कोर्स करेक्शन' की पहल की. 'बिग इंडस्ट्री' और 'बिग कैपिटल' से मार्क्सवादियों का जो चिर-परिचित विरोध था, उसे उन्होंने बदलने की कोशिश की थी. 

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बंगाल का इंडस्ट्रियल लैंडस्केप की मंशा

लेकिन तब तक बंगाल में ममता नाम की स्ट्रीट फाइटर धरने प्रदर्शनों में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराने लगी थी. सफेद धोती कुर्ता में दिखने वाले बंगाल के भद्रलोक पुरुष बुद्धदेब ने राज्य में औद्योगीकरण की मुनादी करवा दी. 2007-08 में सिंगुर और नंदीग्राम से राज्य का इंडस्ट्रियल लैंडस्केप बदलने वाला था, लेकिन तब तक जिस धरने प्रदर्शन को लेफ्ट ने छोड़ा था ममता ने इसे उठाने में तनिक भी देर नहीं लगाई. 

लेफ्ट के खाली किए गए स्पेस में फिट हो गईं ममता

'क्रांति', प्रदर्शन, मार्च, धरना, रैली, घेराव की राजनीतिक संस्कृति में पली बढ़ी जनता ने ममता को हाथों-हाथ लिया और सिर पर चढ़ाया. लेफ्ट ने जिस सोशल और पॉलिटिकल स्पेस को खाली किया ममता पूरी तरह उसमें फिट हो गईं और 34 साल...7 चुनाव के बाद 2011 में लेफ्ट का 'लाल किला' ढह गया. इस ऐतिहासिक जनादेश में सीएम बुद्धदेब भट्टाचार्य जादवपुर सीट से अपना भी चुनाव हार गए. बुद्धदेब भट्टाचार्य 24 सालों तक जादवपुर सीट से विधायक रहे, लेकिन 13 मई 2011 को जब जनता का जनादेश आया तो उनकी राजनीतिक आभा मलिन हो गई. 

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 2006 में सीपीएम ने हासिल किया था रिकॉर्ड बहुमत
 
2011 में अपना चुनाव हारने वाले बुद्धदेब भट्टाचार्य ने 2006 में रिकॉर्ड बहुमत हासिल किया था. लेफ्ट फ्रंट ने उनके नेतृत्व में 294 में से 233 सीटें जीतकर बंगाल में लाल परचम की बुनियाद और भी गहरी कर दी थी, तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि मात्र पांच साल बाद ये पार्टी बंगाल से बुरी तरह से बेदखल कर दी जाएगी.

बुद्धदेब भट्टाचार्य को सीएम की कुर्सी कॉमरेड ज्योति बसु से विरासत में मिली थी. 6 नवंबर 2000 को ज्योति बसु ने बंगाल के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी उन्हें सौंप दी थी. 6 महीने बाद ही यानी कि मई 2001 में विधानसभा चुनाव होने वाले थे. बंगाल में लेफ्ट की प्रयोगशाला में ये नए नेता की लोकप्रियता की परीक्षा थी. कॉमरेड भट्टाचार्य जनता की परीक्षा में शानदार वोटों से पास हुए. इस चुनाव में वाम गठबंधन ने 294 में से 196 सीटें जीतीं. 

औद्योगीकरण का असंतोष 2011 में ले डूबा

10 साल 188 दिनों तक पश्चिम बंगाल के सीएम रहने वाले बुद्धदेब भट्टाचार्य को राज्य के औद्योगीकरण की चाहत की कीमत अपनी सत्ता देकर चुकानी पड़ी. सिंगुर और नंदीग्राम में हिंसा से बंगाली भद्रलोक में जो असंतोष और गुस्सा पनपा उसे बुद्धदेब भट्टाचार्य समझ नहीं पाए, या फिर कहें तो बंगाल को कॉर्पोरेट इंडिया की ओर ले जाने का प्रयोग उन्हें प्रभावशाली जान पड़ा कि वे इस असंतोष को दरकिनार कर गए, उन्हें लगा कि अगर एक बार जनता औद्योगीकरण के फायदे का स्वाद चखेगी तो फिर इस तात्कालिक नाराजगी को भूला देगी. 

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आखिर लेफ्ट बंगाल में 34 सालों से शासन कर रही थी, पार्टी का कैडर गांव-गांव, शहर-शहर, कस्बों मोहल्लों और चौक चौराहों तक था. पार्टी को इस जनशक्ति पर भरोसा था. लेकिन तांत की साड़ी-कंधे पर थैला और हवाई चप्‍पल पहनने वाली ममता की भूख हड़ताल और आंदोलनों से बंगाल में बदलाव की जो बयार बही वो तूफान में तब्दील हो गई और इसमें लेफ्ट का जमा जमाया कैडर भी तिनके की तरह उड़ गया. 

ममता के परिवर्तन लहर में बह गया सीपीएम

13 मई 2011 को पश्चिम बंगाल की 15वीं विधानसभा के लिए चुनाव के नतीजे आए. इस नतीजे में लाल झंडे वाला CPM हरे झंडे वाले तृणमूल की पोरिबर्तन लहर में बह गया. चुनाव में सीपीएम को मात्र 40 सीटें मिली, जबकि लेफ्ट गठबंधन को 62 सीटें. ममता बनर्जी की टीएमसी को 190 सीटें मिलीं.

इतिहास के पन्नों में बुद्धदेब भट्टाचार्य का नाम वो सीएम के तौर पर भी जाना जाएगा, जिनके काल में लेफ्ट का सबसे मजबूत किला ढहा. वैसे बंगाल में सीपीएम के ढलान की शुरुआत 2009 लोकसभा चुनाव में हो गई थी. इस चुनाव में ममता ने अकेले दम पर 19 सीटें जीती थीं. लेकिन लेफ्ट नींद से नहीं जागी. 

बंगाल को खेती के अलावा और भी आय की जरूरत थी

खेती आज भी बंगाल के सरकारी आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है. 2006 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य को लगा कि राज्य को कृषि से मिलने वाला राजस्व पर्याप्त नहीं है, लिहाजा उद्योंगो की और ध्यान दिया जाना चाहिए. आत्मविश्वास से लबालब वामपंथी नेतृत्व ने राज्य में उद्योंगों की श्रृंखला लगाने की योजना बनाई. निश्चित रूप से सीएम रहने की वजह से बुद्धदेब भट्टाचार्य इसके अगुवा थे. उन्होंने देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक रतन टाटा को राज्य में फैक्ट्री खोलने के लिए बुलाया.  

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फ्लॉप हुआ सिंगुर में लखटकिया कार का सपना

कोलकाता के नजदीक सिंगुर में दुनिया की सबसे सस्ती लखटकिया कार बननी थी, नंदीग्राम में केमिकल प्लांट लगने वाला था और स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनने वाला था. इन महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत थी. सरकार पर आरोप लगा कि वो किसानों की उपजाऊ जमीन उद्योगपतियों को दे रही है.

ममता का मौका और मां, माटी और मानुष 

ममता बनर्जी ने इस मौके का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया. उन्होंने मां, माटी और मानुष के नारे को बुलंद किया और किसानों के संग खड़ी हो गईं. 2006 में ममता ने इसके खिलाफ विशाल प्रदर्शन किया. आखिरकार टाटा ने इस प्रोजेक्ट को बंगाल से हटा लिया और गुजरात शिफ्ट कर दिया. 

नंदीग्राम में हिंसा

2007 में नंदीग्राम में भी औद्योगीकरण का विरोध हुआ. 14 मार्च 2007 को यहां पर हालात को संभालने के बजाय पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर फायरिंग कर दी. इस घटना में 14 गांव वाले मारे गए. इस घटना से बुद्धदेब सरकार की खूब किरकिरी हुई. नंदीग्राम का गुस्सा पूरे बंगाल में फैल गया, ममता बनर्जी ने इसे राज्य प्रायोजित हिंसा बताया. 

इसके बाद बंगाल में हिंसा का चक्र सा चल पड़ा. कम्युनिस्ट सरकार हर बार आत्ममंथन करने की बात तो कही लेकिन इसका असर धरातल पर नहीं दिखा. बंगाल में माओवाद प्रभावित पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ में 2011 में स्थिति काफी बिगड़ गई थी. यहां हालात काबू में करने के लिए अर्द्धसैनिक बलों को उतारना पड़ा. 

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आरोप लगा कि 2011 जनवरी में मिदनापुर के एक गांव में कथित तौर पर सीपीएम कार्यकर्ताओं ने गांववालों पर गोलियां चलाई, जिसमें नौ की मौत हो गई. इसे नेताई गोलीकांड के नाम से जाना जाता है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए इस घटना से एक बड़ा जनमत सीपीएम के खिलाफ हो गया. 

इन घटनाओं ने बंगाल से सीपीएम की विदाई की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी. राज्य में अप्रैल-मई 2011 में चुनाव हुए तो बुद्धदेब भट्टाचार्य के साथ ही 34 साल से शासन कर रहे सीपीएम की इस राज्य से विदाई हो गई. 
 

 

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