पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम आ चुका है. टीएमसी को बहुमत मिला है. इस बार करीब 66 साल की उम्र में ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी जीत हासिल की है. उनके रास्ते में अड़चनें कम न थीं. एंटी इनकम्बेंसी, भ्रष्टाचार, साथी नेताओं का धोखा, तर्क-वितर्क...सब कुछ उनके खिलाफ जा रहे थे.
अपने पीछे एक मजबूत दीवार को देख ममता बनर्जी ने अपना पुराना आजमाया हुआ दांव खेला, एक ऐसा दांव जिसे खेलने में उन्हें महारत हासिल हो गई है, विक्टिम कार्ड यानी अपने को पीड़ित बताना. साल 1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर बंगाल की राजनीति में हलचल मचाने वाली ममता को इसके बाद हमेशा ही विक्टिम कार्ड का फायदा मिलता दिखा है. हाजरा में धक्कामुक्की, राइटर्स बिल्डिंग के सामने पिटाई, सिंगुर से बाहर निकालने या नंदीग्राम में घेराव, हर समय उन्होंने मसलों को भावनात्मक रूप से देकर जनता का समर्थन हासिल किया है.
मोदी और शाह के नेतृत्व वाले शक्तिशाली केंद्र से अकेले लड़ रही महिला की छवि ने काम और आसान कर दिया. टीएमसी के लिए ममता ही टीम थीं और ममता ही इसकी कप्तान. ममता जब आक्रामक हुईं तो टीम पीके के नेतृत्व में पार्टी ने उनकी इस छवि को भुनाने का पूरा अभियान चला दिया. पार्टी के आधिकारिक नारे 'बांग्ला निजेर मेकेई चाई' (बंगाल अपनी बेटी को चाहता है) के साथ प्रशांत किशोर ने ममता की नए सिरे से ब्रांडिंग बंगाल की बेटी के रूप में की, जबकि वह दीदी के नाम से लोकप्रिय हैं. इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बंगाल की जनता अपनी बेटी की रक्षा करेगी और 'बोहिरोगोतो' यानी बाहरी को दूर रखेगी.
लगातार रैली पर रैली करते हुए ममता बनर्जी ने जनता को यह संदेश दिया कि किस तरह से वह बंगाल में डेरा डाले हुए प्रधानमंत्री और यूपी के सीएम आदित्यनाथ जैसे बीजेपी नेताओं तथा कई केंद्रीय मंत्रियों, सभी से अकेले लड़ने वाली योद्धा हैं. बीजेपी जिसने भ्रष्टाचार पर वार करते हुए आक्रामक अभियान शुरू किया था और ममता के भतीजे को निशाना बना रही थी, जल्दी ही TMC के जाल में फंस गई. मोदी से लेकर दिलीप घोष तक सभी ने ममता पर सीधे हमला करना शुरू किया, जो कि वास्तव में चतुर ममता चाहती भी थीं.
नंदीग्राह की दुर्घटना के बाद उन्होंने एक-एक चोट को भुनाया और बीजेपी नेता तत्काल सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना में लग गए. जब तक वे समझ पाते कि उनसे गलती हुई है, जनभावना ममता के पक्ष में हो गई और बहुत से लोग ममता को लगी चोट के लिए बीजेपी को ही जिम्मेदार मानने लगे. व्हीलचेयर पर बैठी एक 66 वर्षीय महिला की ताकतवर छवि हमेशा भावनाओं को उत्तेजित करने का एक सक्षम हथियार साबित हुई. यही नहीं दिलीप घोष द्वारा उनकी साड़ी पर टिप्पणी करना और पीएम मोदी के 'दीदी-ओ-दीदी' जैसे तंज इस धारणा को और पुख्ता बना गए कि एक महिला के साथ गलत किया जा रहा है.
ममता ने जब चुनाव को सफलतापूर्वक अपने ऊपर केंद्रित कर लिया, तो बहनापे के उनके संदेश ने बड़ी संख्या में हर वर्ग की महिलाओं को टीएमसी से जोड़ा. बंगाल में मतदाताओं का करीब आधा हिस्सा महिलाओं का ही है और ममता बनर्जी भी उनमें से एक हैं-जो अपने जीवन यापन के लिए मुश्किलों से मुकाबला कर रही हैं.