scorecardresearch
 

न इंदिरा का तेज, न हिन्दुत्व की उत्तेजना, बंगाल में 34 सालों तक कैसे कायम रही लेफ्ट की गर्जना

आखिर क्या थी सीपीएम की नीतियां? ज्योति बसु, बुद्धदेब भट्टाचार्य जैसे कॉमरेडों ने लंबे समय तक कैसे बंगाल की जनता को साधने में सफल रहे? जो बीजेपी ममता बनर्जी के शासन में बंगाल में प्रचंड वेग से आगे बढ़ रही है, बीजेपी के उस रथ को ज्योति बसु ने आखिर किन नीतियों से रोक दिया था? 

Advertisement
X
पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु ने सीपीएम को जन जन की पार्टी बना दी (फोटो-jyotibasu.net)
पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु ने सीपीएम को जन जन की पार्टी बना दी (फोटो-jyotibasu.net)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बंगाल में 34 सालों तक कैसे निर्बाध शासन की सीपीएम
  • भूमि सुधार, पंचायत चुनाव ने समर्पित कैडरों का बेस तैयार किया
  • हिन्दुत्व और आरक्षण के तिलिस्म को तोड़ने में सफल रहे ज्योति बसु

आंदोलन, अस्थिरता और जन संघर्ष में तपकर उभरे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPM ने पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लगातार शासन किया. बंगाल में 1977 में  शुरू हुई सीपीएम की पारी 2011 में विराम पर आई. 34 साल के इस लंबे शासन के कालखंड में बंगाल और भारतवर्ष कई परिवर्तनों का साक्षी रहा. 

Advertisement

ये समय आजादी के बाद सत्ता के चरित्र से खिन्न हुए युवाओं के सशस्त्र संघर्ष का नक्सल 'क्रांति' दौर था. ये वो वक्त था जब बंगाल के अलावा देश के शेष हिस्से में इंदिरा और राजीव के व्यक्तित्व का जादू चलता था. लेकिन दिल्ली से निकली इनकी आभा बंगाल पहुंचकर मलिन हो जाती थी. लेफ्ट को अपने गढ़ में ये दो नेता कभी राजनीतिक रूप से प्रभावी चुनौती नहीं दे पाए.  इन दो प्रधानमंत्रियों की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति का कांग्रेस को भरपूर राजनीतिक लाभ मिला, लेकिन बंगाल में लेफ्ट के पितामह ज्योति बसु ने अपना 'लाल किला'  अपने रणनीतिक कौशल से अभेद्य रखा. 

हिन्दुत्व और आरक्षण के तिलिस्म को तोड़ने में सफल रहे ज्योति बसु

यही वो दौर था जब देश में हिन्दुत्व की राजनीति का उभार हुआ. फिर अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण के मुद्दे पर घमासान हुआ. धर्म और जाति के कलेवर में डूबी भारतीय राजनीति में वोटों की जबर्दस्त गोलबंदी देखने को मिली. इसे समाजशास्त्र की लोकप्रिय भाषा में मंडल-कमंडल की राजनीति कहा जाता है. लेकिन बंगाल का राजनीतिक नेतृत्व हिन्दी पट्टी के इन तमाम उथल-पुथल को अपने राजनीतिक समीकरणों से ध्वस्त करता रहा और निर्बाध रूप से सत्ता में बना रहा. 

Advertisement

34 साल के इस शासन के दौरान ही भारत ने वैश्वीकरण की राह पकड़ी, देश में विदेशी पूंजी और तकनीक के प्रवाह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. जिसका व्यापक सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक असर हुआ. लेकिन बंगाल में सीपीएम अपनी राह चलता रहा. वहां न उसे कोई चुनौती देने वाला था और न ही वहां के लोगों को वैकल्पिक राजनीतिक स्पेस मुहैया करा पा रहा था. 

आखिर क्या थी सीपीएम की नीतियां?

आखिर क्या थी सीपीएम की नीतियां? ज्योति बसु, बुद्धदेब भट्टाचार्य जैसे कॉमरेडों और सीपीएम का पोलित ब्यूरो इतने लंबे समय तक कैसे बंगाल की जनता को साधने में सफल रहे? जो बीजेपी ममता बनर्जी के शासन में बंगाल में प्रचंड वेग से आगे बढ़ रही है, बीजेपी के उस रथ ( याद कीजिए आडवाणी की रथयात्रा और राम मंदिर आंदोलन की उत्तेजना) को ज्योति बसु ने आखिर किन नीतियों की मदद से रोक दिया था? 

पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम ज्योति बसु और बुद्धदेब भट्टाचार्य (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)

इन कारणों की पड़ताल करने से पहले तत्कालीन बंगाल की पृष्ठभूमि समझना बहुत जरूरी है. 

बंगाल में अविभाजित सीपीआई मु्ख्य विपक्षी पार्टी 1952 में ही बन चुकी थी, जबकि ज्योति बसु नेता विपक्ष थे. 1964 में सीपीआई में विचारधारा के मुद्दे पर विभाजन हुआ और सीपीएम क जन्म हुआ. ज्योति बसु इसी खेमे में थे. सीपीएम ने बांग्ला कांग्रेस के साथ 1967 और 1969 में छोटी अवधि तक चलने वाली दो सरकारें भी बनाई.  फिर आया 1972 का चुनाव .

Advertisement

तब तक भारत पाकिस्तान को युद्ध में ऐतिहासिक शिकस्त दे चुका था. देश में इंदिरा की लोकप्रियता आसमान छू रही थी. इसी समय इंदिरा के साथ थे बंगाल कांग्रेस के दिग्गज नेता सिद्धार्थ शंकर रे. इस चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई और पार्टी को 216 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत मिला. सिद्धार्थ शंकर रे मुख्यमंत्री बने. 

जिस सीपीएम ने 1977 में बंगाल में सरकार बनाई थी उस पार्टी को 1972 के चुनाव में मात्र 14 सीटें मिली थी और ज्योति बसु बड़ा नगर से चुनाव हार गए थे. जबकि सीपीआई के खाते में 35 सीटें आई थी. 

लेकिन मात्र 5 साल बाद 1977 में ज्योति बाबू ने बंगाल में लेफ्ट की वो नींव डाली जिसे 34 सालों तक कोई हिला नहीं सका. आपातकाल के बैकग्राउंड में हो रहे चुनाव के दौरान लोग इंदिरा से नाराज तो थे ही. ज्योति बसु अपने आंदोलन और जनप्रिय नीतियों की घोषणाकर बंगाल में अपनी पहचान बना चुके थे. 

इस चुनाव में वाम मोर्चा को 294 में से 231 सीटें मिली और सतगछिया सीट से जीते ज्योति बसु 21 जून 1977 को बंगाल के सीएम बने. 

ज्योति बसु ने आम जन को अधिकार संपन्न किया

सीपीएम का कहना है कि 1977 में उसे मिला बहुमत मजदूरों, किसानों, शिक्षकों, रिफ्यूजियों और छात्रों के असंतोष की आवाज थी. इस वर्ग समूह को सरकार से बड़ी उम्मीदें थी. ज्योति बसु ने सत्ता में आते ही कैबिनेट की पहली बैठक में आपातकाल के राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया. इसके बाद भूमि सुधार, पंचायती राज चुनाव, भोजन सुरक्षा, कृषि में आधुनिकीकरण से क्रांतिकारी कदम उठाए. वाम मोर्चे की इन जनोन्मुख नीतियों की वजह से गरीब गुरबों का तेजी से सशक्तिकरण हुआ. 

Advertisement

  
भूमि सुधार

भारत में हरित क्रांति के दौरान धनी और निर्धन की खाई और बढ़ गई थी. बंगाल इससे अछूता नहीं था. यहां पर बड़ी संख्या में भूमिहीन गरीब मजदूर थे जो जमींदारों की खेती में बेगारी, बंधुआ मजदूरी कर अपनी जिंदगी बमुश्किल चला रहे थे. इस काल खंड में लोगों का असंतोष बढ़ा और इसकी अभिव्यक्ति नक्सल आंदोलन के रूप में हुई. इसकी चपेट में बंगाल, अविभाजित बिहार, अविभाजित आंध्र प्रदेश के इलाके आए. 

ज्योति बसु (फाइल फोटो-इंडिया टुडे)

पश्चिम बंगाल में जब ज्योति बसु सत्ता में आए उन्होंने व्यापक लैंड रिफॉर्म्स की प्रक्रिया शुरू की. सीपीएम के अनुसार इस भूमि सुधार के तीन आयाम थे. 

1-पश्चिम बंगाल सरकार ने लैंड सीलिंग को लागू किया यानी की ये तय किया कि एक व्यक्ति अधिक से अधिक कितनी जमीन रख सकता है. सीमा से अधिक जमीन सरकार ले लेगी.

2-लैंड सीलिंग लागू करने से सरकार के पास लाखों एकड़ जमीन में आई, पहले ये जमीन जमींदारों के पास थी. इस जमीन को सरकार ने भूमिहीन किसानों को दे दिया. 

3- सरकार की तीसरा अहम कदम था आपरेशन बर्गा. इसके तहत बंटाईदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए गए.

सीपीएम ने जमींदारों से लिए अतिरिक्त जमीनों और खाली पड़े सरकारी जमीनों का मालिकाना हक दिया. 1977 से 80 के बीच 10 लाख एकड़ अतिरिक्त जमीन की पहचान की गई और इसे भूमिहीनों के बीच बांटा गया. सीपीएम की वेबसाइट में दावा किया गया है कि 2007 तक बंगाल में  28 लाख लोगों जमीनें बांटी गई. इससे कृषि उत्पादन का चक्र शुरू हुआ ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी दूर हुई. 

Advertisement

ऑपरेशन बर्गा की वजह से बंटाईदारों का अपनी खेती की जमीन पर दावा मजबूत हुआ. इसकी वजह से 15 लाख बंटाईदारों को फायदा हुआ और 11 लाख एकड़ जमीन बंटाईदारों के नियंत्रण में आ गई. ऑपरेशन बर्गा का मतलब ये था कि अगर कोई भूमिहीन किसी जमींदार के खेत पर साझे में खेती कर रहा है तो उसके हक को अचानक खारिज नहीं किया जा सकता है. अगर जमीन मालिक इस जमीन को बेचने जा रहा है तो उसे सबसे पहले इस जमीन को अपने बंटाईदार को ही बेचने की पेशकश करना पड़ेगी. अगर वो जमीन नहीं खरीदने की स्थिति में नहीं है और जमीन मालिक इस जमीन को बेचता है तो उसे इस जमीन को बेचने की स्थिति में एक निश्चित रकम अपने बंटाईदार को देनी पड़ेगी. 

क्यूबा के पूर्व प्रधानमंत्री फिदेल कास्त्रो के साथ ज्योति बसु (फोटो- इंडिया टुडे)

कोलकाता में एक निजी ऑफिस में काम करने वाले मोहन लाल कहते हैं कि मार्क्स-लेनिन की नीति थी कि ग्रामीण जनता को विश्वास में लो, उसका कल्याण करो, इसी नीति पर चलते हुए लेफ्ट ने बंगाल में सत्ता मिलतेही  ग्रामीण आबादी को योजनाओं का फायदा दिया और राज्य में अजेय बन गई. 

दलित-आदिवासी और मुस्लिम बने ब्लैंक चेक वोट बैंक

सीपीएम के अनुसार जमीन पुनर्वितरण की वजह से जिन लोगों को फायदा हुआ उनमें से 56 फीसदी दलित और आदिवासी थे. इसके अलावा बंटाईदारों में भी उनकी संख्या 41 प्रतिशत थी. 2007 तक 5.35 हजार महिलाओं को जमीन का संयुक्त पट्टा और 1.57 लाख महिलाओं को निजी पट्टा दिया गया. लेफ्ट सरकार के इन रेडिकल कदमों से राज्य में लेफ्ट का अटूट, अडिग और कट्टर वोटबैंक तैयार हुआ, जिसे दशकों तक हिला पाना असंभव हो गया. 1977 के बाद लेफ्ट की सरकार तो पहला चुनाव इन घोषणाओं के दम पर ही जीत गई. 

Advertisement

मुस्लिम समुदाय को भी मिला कल्याणकारी नीतियों का फायदा

सरकार की कल्याणकारी नीतियों का मुसलमानों को भी व्यापक रूप से मिला. उन्हें जमीन के पट्टे दिए गए और उनकी बंटाईदारी सुरक्षित की गई. बाद में ये मुस्लिम समुदाय 2006 तक सीपीएम का वोट बैंक और समर्पित कार्यकर्ता बना रहा. लेफ्ट सरकार ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भी बंगाल में उभरने नहीं दिया. इससे मुस्लिम समुदाय ने पूरे विश्वास के साथ ज्योति बसु को वोट दिया.

14 साल बाद पंचायत चुनाव

बंगाल की सत्ता में आते ही वाम मोर्चे ने पंचायतों को अधिकार देना शुरू किया. 1978 में 14 साल बाद राज्य में अंचल, ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत चुनाव कराए गए. पंचायतों ने ज्योति सरकार की भू सुधार नीति को आगे बढ़ाया. पंचायतों को सीलिंग से ज्यादा जमीन रखनेवालों के पहचान का अधिकार दिया गया, इसके अलावा पंचायत को बंटाईदारों और भूमिहीन मजदूरों को मिले जमीनों की रक्षा करने का कानूनी अधिकार दिया गया. 

साहूकारों, जमींदारों और सूदखोरों का वर्चस्व खत्म

दरअसल 1978 के पंचायत चुनाव में जिला, प्रखंड और पंतायत स्तर पर दलितों, गरीब गुरबों और शोषितों का एक नया नेतृत्व उभरा. ये नेतृत्व ज्योति बसु को चमत्कारी व्यक्तित्व की तरह देख रहा था और न सिर्फ राजनीतिक बल्कि संवैधानिक रूप से अपने आप को मजबूत महसूस कर रहा था.  इस चुनाव में साहूकारों, जमींदारों और सूदखोरों का वर्चस्व समाप्त हो गया.  इन चुनावों ने गांव, मोहल्लों, कस्बों और शहरों में सीपीएम का सॉलिड वोट बेस तैयार किया.

Advertisement

सरकार के इन कदमों की वजह से राज्य में नक्सल आंदोलन का प्रभाव कम हुआ, जिस जमीन पर मालिकाना हक की मांग को लेकर नक्सली कथित क्रांति का झंडा बुलंद कर रहे थे वाम सरकार ने उस मुद्दे को लैंड रिफॉर्म्स के जरिए अपने यहां काफी हद तक सफलतापूर्वक खत्म कर दिया. 

खाद्य सुरक्षा

भूमि सुधारों की वजह से राज्य में कृषि के क्षेत्र में समृद्धि आई. 1970-80 के बीच राज्य का औसत कृषि विकास दर 0.6 प्रतिशत तक जो 1980-90 के बीच 7 फीसदी हो गया. इस दौरान बंगाल खाद्य अनाजों के आयात से निर्यातक बन गया. इससे राज्य में समृद्धि तो आई ही राज्य की गरीब जनता की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई. अनाजों की कीमतें नियंत्रित रही और भोजन की उसकी चिंता दूर हुई. इसमें जनवितरण प्रणाली का अहम रोल रहा. 70-80 के दशक के भारत की बात करें तो पेट की चिंता से मुक्त बंगाल की जनता के लिए कोई कारण नहीं था कि वो उस राजनीतिक दल को वोट न देती जिसने उसके लिए ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार किया था.

बंगाल की क्लब संस्कृति
  
इसके अलावा बंगाल में वाम शासन ने क्लब संस्कृति विकसित की. राज्य के हर गली मोहल्ले में क्लब की स्थापना की गई. कहने के लिए तो ये क्लब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था, लेकिन इसके जरिए वामपंथी सरकार ने गांव गांव में अपनी पहुंच हासिल कर ली. इन क्लबों को राज्य सरकार कल्चरल और स्पोर्ट्स गतिविधियों के नाम पर पैसा देती थी, लेकिन इसके एवज में क्लब के हर सदस्य का राजनीतिक झुकाव सीपीएम सरकार की ओर होना जरूरी था. 

 

Advertisement
Advertisement