शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के मजबूत सियासी परिवार से आते हैं. उनके पिता शिशिर अधिकारी 1982 में कांग्रेस के टिकट पर कांथी दक्षिण सीट से विधायक चुने गए, लेकिन बाद में उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी का गठन किया. शिशिर अधिकारी डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास राज्यमंत्री रहे और मौजूदा समय में वो तमलूक लोकसभा सीट से सांसद हैं और पूर्वी मेदिनीपुर के जिलाध्यक्ष भी हैं.
शुभेंदु के एक भाई दिव्येंदु अधिकारी कांथी लोकसभा सीट से टीएमसी के सांसद हैं जबकि उनके दूसरे भाई सौमेंदु अधिकारी कांथी नगरपालिका के टीएमसी से अध्यक्ष हैं. शुभेंदु के इन दोनों भाइयों ने टीएमसी नहीं छोड़ा है. टीएमसी नेता शुभेंदु पर राजनीतिक हमले तो कर रहे हैं, लेकिन उनके भाई और पिता को लेकर कोई कुछ बोलने को तैयार नही हैं.
शुभेंदु अधिकारी के भाई और पिता बीजेपी में शामिल होते हैं तो उनकी लोकसभा की सदस्यता खत्म हो जाएगी. उन्हें सांसद बने अभी डेढ़ साल ही हुए हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि फिलहाल सियासी नजाकत को देखते हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले या फिर नतीजे के बाद कोई फैसला ले सकते हैं. हालांकि, शुभेंदु अधिकारी के परिवार के सदस्यों को पार्टी से निष्कासित करती है, तो उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी, लेकिन ममता बनर्जी फिलहाल ऐसा कदम नहीं उठा रही हैं.
शुभेंदु की लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता इतनी है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा की 50 से अधिक सीटों पर चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं. पश्चिम मिदनापुर, बांकुरा और पुरुलिया जिले में टीएमसी की सियासी जमीन तैयार करने में शुभेंदु अधिकारी की अहम भूमिका रही है. पूर्वी मेदिनीपुर जिला में 16 विधानसभा सीटें हैं. अब शुभेंदु ने जब पार्टी छोड़ दी है और टीएमसी पर पूरी ताकत से हमला बोल दिया है, उनके परिवार के अन्य सदस्यों को पार्टी में मुश्किल आ सकती है.
हालांकि, शुभेंदु की जंगल महल और पूर्वी मिदनापुर इलाके में जननेता के तौर पर पहचान है. 2016 में उनके प्रभाव वाले इलाके की 49 सीटों में से 36 सीटें जीत ली थीं. इसके अलावा दूसरे इलाके की सीटों पर भी उनका प्रभाव है, जहां टीएमसी ने बेहतर प्रदर्शन पिछले चुनाव में किया था. अब ऐसे में देखना है कि वे इस बार क्या सियासी गुल खिलाते हैं.