पश्चिम बंगाल विधानसभा की सियासी जंग फतह करने के लिए टीएमसी और बीजेपी के बीच शह-मात का खेल अभी से ही जारी है. ऐसे में चुनाव से पहले टीएमसी नेता और ममता बनर्जी के करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफा देने के बाद उन्हें मनाने की कवायद की जा रही है, लेकिन अभी तक वो बागी रुख अपनाए हुए हैं. ऐसे में बीजेपी शुभेंदु को अपने खेमे में लाने की कोशिशों में जुटी है. शुभेंदु को मोदी सरकार ने जे सुरक्षा दी है. ऐसे में शुभेंदु टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थामते हैं तो ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका होगा.
ममता बनर्जी साल 2011 से पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज हैं और अगले साल शुरुआत में होने वाले चुनाव में सत्ता की हैट्रिक लगाने की कोशिश में है, लेकिन उनकी राह में दो बड़ी चुनौतियां हैं. एक तरफ पश्चिम बंगाल की सियासत में बीजेपी का बढ़ता कद उनकी परेशान को बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ पार्टी में लगातार हो रही बगावत. इसमें एक ताजा नाम शुभेंदु अधिकारी का जुड़ गया है.
बता दें कि शुभेंदु अधिकारी ने पिछले दिनों पर्यटन मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. इससे पहले वो हुगली रिवर ब्रिज कमीशन (HRBC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके थे. शुभेंदु के टीएमसी छोड़कर बीजेपी में जाने की अटकलें तेज थीं, क्योंकि बीजेपी ने उनके लिए पार्टी में स्वागत के लिए दरवाजे खोल रखे थे. ऐसे में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने खुद उनसे मुलाकात कर उनकी नाराजगी को दूर करने की कवायद की है. इसके बावजूद अभी तक वो बागी रुख अपनाए हुए हैं.
नंदीग्राम आंदोलन से मशहूर हुए शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक रूप से इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि टीएमसी उन्हें मनाने की हरसंभव कोशिश में जुटी है. शुभेंदु अधिकारी पूर्वी मिदनापुर जिले के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं. उनके पिता शिशिर अधिकारी 1982 में कांथी दक्षिण से कांग्रेस के विधायक थे, वे टीएमसी को खड़ा करने वालों में से एक हैं.
शुभेंदु अधिकारी 2009 से ही कांथी सीट से तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं और उनके दूसरे भाई भी 2009 में विधायक रह चुके हैं. शिशिर अधिकारी तीसरी बार सांसद हैं और ऐसे में उनकी राजनीतिक प्रभाव को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. शुभेंदु की लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता इतनी है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा की करीब पचास से अधिक सीटों पर चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं. पश्चिम मिदनापुर, बांकुरा और पुरुलिया जिले में टीएमसी की सियासी जमीन तैयार करने में शुभेंदु अधिकारी की अहम भूमिका रही है. ममता बनर्जी भी इस बात को बखूबी समझती हैं, जिसके चलते वो किसी भी सूरत में उन्हें पार्टी से नहीं खोना चाहती हैं.
शुभेंदु की जंगल महल और पूर्वी मिदनापुर इलाके में जननेता के तौर पर पहचान है. 2016 में उनके प्रभाव वाले इलाके की 49 सीटों में से 36 सीटें टीएमसी ने जीत ली थीं. इसके अलावा दूसरे इलाके की सीटों पर भी उनका प्रभाव है, जहां टीएमसी ने बेहतर प्रदर्शन पिछले चुनाव में किया था. ऐसे में ममता के लिए शुभेंदु बेहद खास माने जाते हैं, ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी की वजह से लगातार अपने करीबियों को खोती जा रही हैं.
बंगाल की सियासत में मुकुल रॉय, अर्जुन सिंह, सौमित्र खान, अनुपम हजारा, शंकु देब पांडा.. ये वो नाम हैं जिन्होंने ममता बनर्जी को सत्ता का सिंहासन दिलाने के लिए जी जान लगा दिया था. लेकिन बाद में इन सारे नेताओं का टीएमसी से मोहभंग हो गया और उन्होंने पार्टी का दामन छोड़ दिया. ऐसे में क्या इस फेहरिश्त में शुभेंदु अधिकारी का ताजा नाम जुड़ने जा रहा है, क्योंकि एक महीने होने जा रहे हैं और अभी तक ममता बनर्जी उन्हें मनाने में सफल नहीं हो सकी हैं.