माछ, पान और मखान यह मिथिला की शान है और पहचान भी, लेकिन समय के साथ दरभंगा अपनी इस पहचान को न सिर्फ खोता जा रहा है, बल्कि इन सभी चीजों पर अब दूसरे प्रदेशों द्वारा कब्जा होता जा रहा है. कहा जाए तो खुद मिथिला की पहचान खतरे में है. जरूरत है इस पहचान को बनाए रखने की. ताकि यहां के लोग न सिर्फ आत्मनिर्भर रहें, बल्कि आर्थिक रूप से सम्पन्न भी रहें. (इनपुट-प्रह्लाद कुमार)
बाढ़ का ग्रहण
मिथिला की इस पहचान पर बाढ़ का ग्रहण लग गया है. माछ (मछली), पान और मखान (मखाना) की खेती पर बाढ़ का विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. कोई किसान तालाब में मखाने की खेती करता है, तो कोई पान की, वहीं बड़ी संख्या में किसान मछली पालन भी करते हैं, लेकिन बाढ़ किसानों की सालभर की मेहनत को कुछ ही समय में बर्बाद कर देती है. किसान के हाथ में कुछ भी नहीं रहता है. लंबे समय से बाढ़ की समस्या से यहां के किसान जूझ रहे हैं. ज्यादातर किसानों ने माछ, पान और मखान से अपना ध्यान हटा लिया है.
खत्म होते तालाब
दरभंगा में तालाबों के अस्तित्व पर भी खतरा है. इस मामले में तालाब बचाओ अभियान के संरक्षक नारायण चौधरी से बात की, तो उन्होंने बताया कि 2013 के अनुसार पूरे जिले में करीबन 9,113 तालाब हुआ करते थे. सिर्फ दरभंगा शहर यानी नगर निगम इलाके में ही 350 तालाब थे, लेकिन तालाबों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. जमीन के दाम बढ़ने से भू माफियाओं की नजर तालाबों पर है.
सैकड़ों तालाबों को समाप्त कर वहां बड़ी बड़ी इमारतें बना दी गई हैं. कुछ तालाबों को मिट्टी से भरे जाने का क्रम अभी भी जारी है. नारायण चौधरी का आरोप है कि तालाबों को एक प्लान के तहत समाप्त किया जा रहा है. एक गुट सरकारी कार्यालय में जमीन के फर्जी कागज तैयार कराता है, दूसरा गुट ट्रैक्टर माफिया का है, जो रात में तालाब में मिट्टी भरता है और तीसरा गुट दबंगों का है, जो विरोध करने वाले लोगों को धमकाने का काम करता है. उन्होंने कहा कि तालाब बचाओ आंदोलन में उनके एक कार्यकर्ता हत्या तक कर दी गई थी.
दूसरे प्रदेशों की एंट्री
मछली, मखाने और पान की डिमांड बढ़ी, तो दूसरे प्रदेशों की घुसपैठ शुरू हो गई. बात करें तो मछली बाजार में आंध्र प्रदेश और बंगाल का कब्जा हो गया है, जबकि पान के बाजार में कोलकाता ने अपना दबदबा बना लिया है. वहीं मखाने की खेती पर से भी किसान का मन टूट गया है. दरभंगा थोक मछली विक्रेता संघ के अध्यक्ष उमेश सहनी ने बताया कि तालाबों की सफाई, प्रदूषित पानी और जलकर की समस्या को लेकर होने वाले आपसी विवाद के कारण मछली पालन प्रभावित हो रहा है.
वहीं, यहां मछली पालन का कोई वैज्ञानिक सुविधायें भी नहीं हैं. इससे मछली का व्यापार लगभग समाप्त होता जा रहा है. जहां दरभंगा से दूसरे प्रदेशों में मछली भेजी जा रही थी, तो वहीं अब यहां दूसरे राज्यों से मछली आती है. उन्होंने बताया कि दरभंगा जिले में रोज तकरीबन 8 टन मछली की खपत है, लेकिन दरभंगा ज़िले से मात्र 500 किलो तक ही मछली बाजार में पहुंच पाती है. रोजाना तकरीबन 2 से 3 टन मछली आंध्र प्रदेश से तो 4 से 5 टन मछली बंगाल से दरभंगा पहुंच रही है.
पान की खेती पर बड़ा असर
पान की खेती करने वाले चंदेश्वर भगत ने बताया कि पान की खेती तालाब के किनारे की जाती है. इसके लिए दोरस मिट्टी की जरूरत होती है. पान की खेती के लिए न ज्यादा पानी न ज्यादा धूप की जरूरत होती, लेकिन इतना पानी इसे हमेशा चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे. लेकिन अब पानी की खेती भी नहीं हो पा रही है, कारण है समाप्त होते जा रहे तालाब. अब बहुत कम लोग इस खेती से जुड़े हैं. नतीजा पान के बाजार पर कोलकाता के पान का कब्जा हो गया है. देसी पान के पत्ते के सामने कोलकाता के पान का पत्ता बड़ा होता है और देखने में भी खूबसूरत, जिसके चलते दुकानदार और ग्राहक की वह पहली पसंद है.
मखाने की खेती से भी हो रहा मोहभंग
मखाना की बात करें तो इसे सुपर फूड का दर्जा मिला है. कई तरह के कंपनियां अपने अपने नाम की ब्रांडिंग कर मोटी रकम कमा रही हैं, लेकिन तालाबों की कमी के कारण मखाना की खेती पर बड़ा असर दिखाई दे रहा है. किसान खेती कर मखाना तैयार करते हैं, लेकिन इसका कोई अपना बाजार नहीं होने के कारण कई समस्या उत्पन्न होती हैं. मखाना उत्पादन करने में बहुत मेहनत है. सभी लोग इस काम को नहीं कर सकते हैं.
कहा जाता है कि मल्लाह जाति के लोग ही मखाना की खेती करते हैं, लेकिन मेहनत के अनुसार उन्हें आमदनी नहीं होती है, इसलिए मखाने के खेती से इनका भी मोहभंग हो रहा है. हालांकि बिचौलिये इन किसानों का खूब फायदा उठाते हैं. मतलब साफ है कि अगर सिर्फ तालाबों को बचा लिया जाए, तो यहां की पहचान माछ,पान और मखान सभी को न सिर्फ बचाया जा सकता है, बल्कि हजारों लाखों लोगों को उनके घर मे ही रोजगार दिया जा सकता है. बिहार से पलायन को भी रोक जा सकता है.