बिहार में यदि लालू के सबसे अजीज और करीबी रहे किसी एक शख्स का नाम पूछा जाए तो वहां के लोग एक ही नाम लेंगे- रघुवंश प्रसाद सिंह. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख लालू के छात्र जीवन से शुरू हुई रघुवंश प्रसाद से दोस्ती करीब 46 साल तक चली. लंबी बीमारी के बाद रघुवंश प्रसाद ने बीते 13 सितंबर को आखिरी सांस ली तो लालू ने ट्वीट किया कि 'प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया?'. आज आपको बताते हैं लालू और स्वर्गीय रघुवंश प्रसाद के दोस्ती के कुछ अनकहे किस्से..
जेल में हुई थी दोनों की मुलाकात
लालू यादव और रघुवंश प्रसाद की दोस्ती करीब 46 पुरानी थी. बताते हैं कि जय प्रकाश नारायण के 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन के दौरान लालू और रघुवंश प्रसाद की पहली मुलाकात बांकीपुर जेल में हुई थी. उस वक्त लालू पटना यूनिवर्सिटी के छात्रनेता और रघुवंश प्रसाद जेपी मूवमेंट के कार्यकर्ता हुआ करते थे. जेल में दोनों की शुरू हुई दोस्ती 13 सिंतबर को रघुवंश प्रसाद की आखिरी सांस तक चलती रही.
लालू के लिए ठुकराया था पद
पार्टी से जुड़े वरिष्ठ लोगों के अनुसार 2009 में आरजेडी के 4 सांसद लोकसभा पहुंचे थे. इस दौरान रघुवंश प्रसाद सिंह को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जरिये संदेश भिजवाया कि वह उन्हें लोकसभा अध्यक्ष बनाना चाहती हैं. लेकिन रघुवंश प्रसाद ने मना कर दिया.
सोनिया रघुवंश के काम से थी प्रभावित
रघुवंश प्रसाद ने यूपीए-1 में केंद्रीय मंत्री के तौर पर खूब काम किया था. मनरेगा और गांवों में सड़कों के जाल बिछाने का जो काम रघुवंश प्रसाद सिंह ने किया था, उसकी बहुत तारीफ हुई थी. सोनिया भी उनकी मेहनत और समझ की मुरीद थीं. इसलिए उन्होंने यूपीए-2 में उन्हें लोकसभा अध्यक्ष पद ऑफर किया लेकिन रघुवंश प्रसाद अपने सिद्धातों और विचारों से पीछे नहीं हटे. लालू के प्रति अपनी दोस्ती को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी.
बिना राय लिए कोई काम नहीं करते थे लालू
दरअसल, लालू यादव और रघुवंश प्रसाद की रिश्ता राजनीतिक के साथ पारिवारिक भी था. लालू हर मौके पर रघुवंश प्रसाद सिंह से राय लिया करते हैं. रघुवंश प्रसाद के करीबी बताते हैं कि बिना रघुवंश बाबू के हामी के भरे लालू यादव कोई भी काम नहीं करते थे. फिर चाहे वह सियासत से जुड़ा हो या फिर पारिवार से संबंधित. जब चारा घोटाले में लालू यादव जेल गए तब भी रघुवंश बाबू ने मीडिया में बचाव से लेकर पटना से रांची तक संघर्ष किया.
आखिरी वक्त में टूट गए थे
रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कहते हैं कि रघुवंश ने लालू और राजद के प्रति जितनी आत्मीयता दिखाई, उसका उन्हें उतना सम्मान नहीं मिला. 2015 में बिहार में सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल गठन के दौरान लालू ने रघुवंश प्रसाद कोई राय नहीं ली. इसके बाद राज्यसभा चुनाव, जगदानंद सिंह का प्रदेश अध्यक्ष बनाना, सवर्ण आराक्षण का मुद्दा, आरजेडी में बाहुबली प्रवृति के लोगों की एंट्री, तेज प्रताप यादव द्वारा दिए गए बयान ने रघुवंश प्रसाद को तोड़ दिया था.
अंत में छलक ही गया दर्द
उन्होंने अपनी चुप्पी 10 सितंबर को एम्स में इलाज के दौरान बेड से 38 शब्दों में तोड़ दी और कहा, 'कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद 32 वर्षों तक आपके पीठ पीछे खड़ा रहा, लेकिन अब नहीं. पार्टी, नेता, कार्यकर्ता और आमजन ने बड़ा स्नेह दिया, क्षमा करें.' इसके बाद लालू ने जवाबी ट्वीट में आत्मीयता दिखाते हुए उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की. लेकिन 13 सितंबर को रघुवंश प्रसाद का निधन हो गया.