पूर्णिया के लोग अब दाल-भात और भुजिया नहीं खा पा रहे हैं. क्योंकि आलू की कीमत आसमान छू रही है. इस बार बेमौसम भारी बारिश ने सब्जियों की फसल को नष्ट कर दिया है. इसका सीधा असर आलू की कीमत पर पड़ा है. आलू के दाम 50 के पार हो चुके हैं. बाजार में आलू बड़ी मात्रा में दिख रहा है. मगर थालियों से गायब है क्योंकि इतना महंगा आलू कैसे खाया जाए. कहा जा रहा है कि यह एक चुनावी मुद्दा बन सकता है. (रिपोर्टः संतोष नायक)
उत्पादन के मामले अगर बात करें तो पूर्णिया के आलू की अलग पहचान है. सिर्फ पूर्णिया जिले में तीन अलग-अलग किस्मों के करीब 1.25 लाख मीट्रिक टन आलू की पैदावार होती है. जिले के विभिन्न शीतगृह की क्षमता नब्बे हजार मैट्रिक्स टन की है. बिहार की आधी आबादी की जरूरत को पूरा करने के लिए इतना स्टॉक पर्याप्त है.
महंगाई के शिकार परिवार की थाली से आलू गायब है. पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे मध्यमवर्गीय एवं गरीब दोनों की लाज बचाने वाला आलू अब थाली से गायब होने लगा है. समोसा बनाने वाले भी आलू की ऊंची कीमत देख इसकी की जगह पनीर का इस्तेमाल कर रहे हैं.
पनीर के समोसे को शुगर फ्री के नाम पर मनमानी कीमत वसूलना शुरू कर दिया है. आलू की बढ़ी कीमत का फायदा किसानों को नहीं होता है. किसान शुरुआत में ही अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए फसल को व्यापारी तथा शीतगृह मालिकों के हाथों बेच देते हैं.