बात 90 के दशक की है. जब बिहार में लालू यादव की सरकार थी. लालू के शासन ने बड़े-बड़े राजनीतिक अपराध देखे थे. लेकिन 1991 का लोकसभा चुनाव बिहार में सबसे ज्यादा हिंसक था, जिसमें काफी खून बहा. राजनीतिक प्रतिद्वंदियों ने जमकर एक-दूसरे पर हमला किया. लोकसभा चुनाव में टिकट पाने के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने दिल्ली में लाइन लगा दी.
लेकिन 10 अप्रैल 1991 को अचानक गोपालगंज से पूर्व सांसद नगीना राय की हत्या हो गई. मामले में नाम आया कटेया विधानसभा क्षेत्र से विधायक बच्चा चौबे का. नगीना राय की हत्या से बिहार से लेकर दिल्ली तक हिल गई थी. इस हत्या की वजह नगीना राय और गोपालगंज से ही पूर्व सांसद रहे काली पांडे के बीच अदावत को माना गया.
कौन थे बच्चा चौबे
बिहार में जिला है गोपालगंज. लालू यादव का पैतृक जिला भी है. उसी का हिस्सा था कटेया. भारतीय परिसीमन आयोग के आदेशों के परिणामस्वरूप, 2010 में कटेया (विधानसभा क्षेत्र) का अस्तित्व समाप्त हो गया. इसी कटेया से विधायक थे बच्चा चौबे. बच्चा चौबे 1980 से 90 के दशक में चर्चित रहे. गोपालगंज की सियासत में अमरेंद्र उर्फ पप्पू पांडेय और काली पांडेय जैसे बाहुबलियों के साथ-साथ बच्चा चौबे का भी बोलबाला रहा. हालांकि उनके बारे में जानकारी बहुत सीमित है. उनका निधन भी हो चुका है.
इस मामले में आया नाम
जब नगीना राय की हत्या हुई तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. इसमें पता चला कि जिन लोगों ने नगीना राय की हत्या की थी, वो असल में बच्चा चौबे के बेहद करीबी थे. इस मामले में नगीना राय के ड्राइवर ओम प्रकाश ने एफआईआर दर्ज कराई थी. उन्होंने कहा कि बच्चा चौबे के दोनों बेटों ने पिता की मौजूदगी में नगीना राय पर गोलियां चलाईं. बाद में पुलिस ने बच्चा चौबे के घर पर छापेमारी भी की.
समर्थकों ने दावा किया कि 1990 के विधानसभा चुनाव में नगीना राय ने कटेया क्षेत्र से बच्चा चौबे के खिलाफ चुनाव लड़ा था. राय को चौबे ने 7 हजार वोटों से मात दी थी. इसके बाद नगीना राय ने पटना हाई कोर्ट में रिट दाखिल कर चौबे की जीत पर सवाल खड़े किए थे.
कैसा रहा बच्चा चौबे का करियर
साल 1980 में बच्चा चौबे बीजेपी के टिकट पर इस सीट से खड़े हुए. लेकन कांग्रेस के सिहासवर साही ने उन्हें मात दे दी. इसके बाद 1985 में जनता पार्टी के टिकट पर बच्चा चौबे फिर मैदान में उतरे. इस बार सामने थे जनता दल के नगीना राय. लेकिन बच्चा चौबे जीत गए. साल 1995 में बच्चा चौबे कांग्रेस के टिकट से उतरे लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और जनता दल के सिन्हेश्वर शाही ने उन्हें मात दे दी. इसी साल जनवरी में उनके बेटे विजय कुमार चौबे ने आरजेडी की सदस्यता ले ली थी. वे भारत सरकार में अपर सचिव के पद से रिटायर हुए हैं.