बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए में सीट बंटवारे के बाद बीजेपी ने अपने कोटे की 121 सीटों में से मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) को 11 सीटें दी हैं. इसके अलावा वीआईपी अध्यक्ष मुकेश सहनी को विधान परिषद भी भेजेगी. तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन से मुकेश सहनी नाता तोड़कर एनडीए में आए हैं. हालांकि, उन्होंने अपना सियासी सफर 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने के लक्ष्य के साथ शुरू किया था और बाद में 2018 में उन्होंने वीआईपी पार्टी का गठन किया था.
बता दें कि मुकेश सहनी का राजनीतिक इतिहास बहुत लंबा नहीं है. लेकिन राजनीतिक गठजोड़ की उनकी फेहरिस्त बहुत ही कम समय में काफी लंबी हो चुकी है. मुकेश 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी का चुनाव प्रचार किया. वो मल्लाह समुदाय से आते हैं और बिहार में अच्छी खासी आबादी है, जिसके चलते उन्होंने 2018 में अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन किया. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वो महागठबंधन में शामिल हो गए और तीन सीटों पर उनकी पार्टी ने चुनाव लड़ा था. वो खुद खगड़िया सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे.
बिहार में मल्लाह समुदाय की आबादी करीब 6 फीसदी है, जिसके तहत 10 जातियां आती हैं. बिहार में अति पिछड़ी जाती में आती है. ऐसे में मुकेश साहनी के एनडीए में एंट्री के बाद बीजेपी ने बिहार में अति पिछड़ा कार्ड खेला है. बीजेपी नेता और डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि एनडीए ने हमेशा अति पिछड़ा समुदाय को सम्मान देने का काम किया है जबकि आरजेडी ने हमेंशा उन्हें हाशिए पर रखा है.
सुशील मोदी ने कहा कि बीजेपी ने पिछले चुनाव में 25 अति पिछड़े समुदाय के लोगों को मैदान में उतारा था, जिनमें से 12 जीतकर आए थे. वहीं, आरजेडी ने महज पांच सीटें दी थी जबकि जेडीयू ने 16 अति पिछड़े समाज के प्रत्याशी उतारे थे. उन्होंने कहा कि आरजेडी ने हमेशा अति पिछड़े का हक मारने का काम किया है जबकि बिहार की कुल आबादी का 40 फीसदी अति पिछड़े समुदाय की संख्या है. वहीं, मुकेश सहनी ने कहा कि अति पिछड़े समुदाय से आने वाले नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है. ये हमारे और हमारे समाज के लिए सम्मान की बात है.
बता दें कि मुकेश सहनी का राजनीतिक इतिहास खासा लंबा नहीं है. मुकेश सहनी ने पैसों के दम पर बिहार की राजनीति में एंट्री मारी थी. 2013 की एक सुबह बिहार में लोगों ने अपने हाथों में अखबार (अंग्रेजी-हिंदी दोनों) उठाया तो उनका सामना 'सन ऑफ मल्लाह- मुकेश सहनी' के चेहरे से हुआ. यह ऐसा नाम था जिसके बारे में उन दिनों लोग कम ही जानते थे. उस विज्ञापन के बाद अखबारों में मुकेश का एक और विज्ञापन छपा जिसमें उनका मोबाइल नंबर भी शेयर किया गया था. इसके बाद अखबारों, सोशल मीडिया और बिहार की जनता के बीच 'सन ऑफ मल्लाह' छाता चला गया. यही नहीं मुकेश सहनी का ट्विटर हैंडल भी सन ऑफ मल्लाह के नाम से है.
इस वजह से बीजेपी को खास लगे थे मुकेश
माना जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले मुकेश सहनी की बढ़ती लोकप्रियता को मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भांप लिया था. दरअसल इसके पीछे सिर्फ उनकी लोकप्रियता ही नहीं जातीय फैक्टर भी था जिसने एनडीए को उन्हें अपने पक्ष में लाने के लिए मजबूर किया. आपको बता दें कि मुकेश मल्लाह जाति के हैं. बिहार में इस समय इनका कोई बड़ा नेता नहीं है. बिहार में मछुआरों व नाविकों की जाति में आने वाले मल्लाह, सहनी, निषाद, बिंद जैसी अति पिछड़ी जातियों की आबादी काफी ज्यादा है और राज्य की 10 से 15 लोकसभा सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं. लोकसभा चुनावों में मुकेश साहनी को एनडीए के पक्ष में वोट मांगते देखा गया.
निषाद नेता के तौर पर मुकेश सहनी की पहचान
इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनावों में मुकेश सहनी की राजनीतिक ताकत को पहली बार बड़ी पहचान मिली. उस वक्त उनका नाम एनडीए के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल था. बीजेपी को भरोसा था कि मुकेश सहनी 'सन ऑफ मल्लाह' की वजह से एनडीए को मल्लाहों का वोट जरूर मिलेगा. लालू-नीतीश की एकजुटता से घबराई बीजेपी को मुकेश से काफी आस थी. हालांकि चुनाव परिणाम एनडीए के पक्ष में नहीं आए जिसके बाद एनडीए से मुकेश की दूरियां बढ़ने लगीं. जिसके बाद उन्होंने एकबार फिर मुंबई पर फोकस किया लेकिन लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही फिर से बिहार में वापसी कर ली.
2018 में मुकेश ने बनाई अपनी पार्टी
मुकेश सहनी ने 2019 के लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ महीने पहले ही नवंबर 2018 में अपनी अलग पार्टी की घोषणा की थी. राजनीति में वीआईपी तरीके से एंट्री लेने वाले मुकेश ने अपनी पार्टी का नाम विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) रखा. मुकेश की पार्टी का चुनाव चिन्ह भी उनकी जाति के पेशे से काफी हद तक मेल खाता है. जी हां, पानी में तैरती नाव ही वीआईपी का चुनाव चिन्ह है.
2019 के चुनावों में पीएम मोदी के 'चाय पर चर्चा' की तरह ही मुकेश ने 'माछ पर चर्चा' कर सुर्खियां बटोरी थीं. उन दिनों मुकेश का नारा हुआ करता था 'माछ भात खाएंगे महागठबंधन को जिताएंगे'. 2019 में मुकेश ने खगड़िया लोकसभी सीट से किस्मत आजमाई थी लेकिन बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था.
सामाजिक जीवन में पहले ही कर चुके थे एंट्री
राजनीति में भले ही मुकेश सहनी की पहचान 2014 के लोकसभा चुनावों में बनी हो लेकिन सामाजिक जीवन में मुकेश सहनी ने 2010 में ही एंट्री कर ली थी. 2010 में मुकेश ने बिहार में साहनी समाज कल्याण संस्थान की स्थापना की थी. उन्होंने अपने दो ऑफिस भी खोले थे, एक दरभंगा में और दूसरा पटना में. इसका इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने अपने समाज के लोगों को एकजुट करने और युवाओं को बेहतर शिक्षा का मौका दिया. 2015 में मुकेश ने निषाद विकास संघ की स्थापना की. यह संगठन अपने समाज के लोगों को इकट्ठा करने के लिए जिलेवार काम करता है.
इस तरह मुकेश ने मुंबई में बनाई अपनी पहचान
19 साल की उम्र में मुकेश घर से भागकर कुछ बड़ा काम करने का सपना लेकर मुंबई चले गए थे. शुरुआत में मुकेश ने एक सेल्समैन की नौकरी भी की. इसी दौरान मुकेश के दिमाग में फिल्मों, टीवी सीरियल्स और शो के सेट बनाने के बिजनेस का आइडिया आया. मुकेश ने जब इस फील्ड में मेहनत की तो किस्मत ने भी उनकी मदद की. मुकेश के लिए सबसे बड़ा मौका उस वक्त आया जब, नितिन देसाई ने उनको 'देवदास' का सेट बनाने का काम दिया. इस धंधे में शुरुआती सफलताएं मिलने के बाद उन्होंने 'मुकेश सिनेवर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड' (एमसीपीएल) नाम की कंपनी भी बनाई. अपनी मेहनत के दम पर मुकेश ने महज कुछ ही समय में खूब नाम और पैसा कमाया. जिसके बाद उन्होंने राजनीति में हाथ आजमाने का निश्चिय किया.
मुकेश की पारिवारिक पृष्ठभूमि
जानकारी के मुताबिक मुकेश सहनी बिहार में दरभंगा जिले के सुपौल बाजार के रहने वाले हैं. मुकेश का जन्म 31 मार्च को हुआ था. मुकेश सहनी की शादी कविता सहनी से हुई है. कविता एक गृहणी हैं. मुकेश का एक बेटा रणवीर सहनी और एक बेटी मुस्कान सहनी हैं. मुकेश के भाई का नाम संतोष सहनी और उनकी बहन का नाम रिंकू सहनी है.