बिहार की सत्ता पर कांग्रेस ने लंबे समय तक राज किया है, लेकिन वक्त बदला और राजनीति ने ऐसी करवट ली कि आज कांग्रेस बैसाखी के सहारे के चुनावी मैदान में है. आजादी से बाद से लेकर 1990 के तक कांग्रेस बिहार की सत्ता में आती और जाती रही है, लेकिन मंडल की सियासत ने कांग्रेस की जमीन को बंजर बना दिया. इसके बाद से वो दोबारा से सत्ता में वापसी नहीं कर रही है. 1952 से लेकर 2015 तक बिहार में कुल 23 मुख्यमंत्री बने हैं, जिनमें से 18 कांग्रेस के रहे हैं. कांग्रेस के जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं, उनमें से महज एक ही सीएम पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सका है बाकी नहीं.
बिहार में पहला विधानसभा चुनाव साल 1952 में हुआ था. संयुक्त बिहार की कुल 324 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 239 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस के मुख्यमंत्री के तौर पर डॉ. श्रीकृष्ण सिन्हा ने सत्ता की कमान संभाली थी. हालांकि, श्रीकृष्ण सिन्हा 1946 में अंतरिम सरकार के गठन के दौरान सत्ता की कमान अपने हाथ में रखी थी. दूसरा विधानसभा चुनाव 1957 में हुआ तो भी श्रीकृष्ण सिन्हा मुख्यमंत्री बने. जनवरी, 1961 में उनका निधन हो गया. इस तरह से बिहार के पहले और आखिरी कांग्रेस नेता हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा किया है.
डॉ.श्रीकृष्ण सिन्हा के निधन के बाद कांग्रेस ने दीप नारायण सिंह मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन महज 18 दिन ही अपने पद पर रहे. इसके बाद कांग्रेस नेता विनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 को मुख्यमंत्री बने और 2 अक्टूबर 1963 तक रहे. इस तरह से वो दो साल 226 दिन तक ही सत्ता की कमान अपने हाथ में रख सके. इसके बाद कांग्रेस ने केबी सहाय को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया, जो कि 5 मार्च 1967 तक सत्ता पर काबिज रहे. केबी सहाय के नेतृत्व में 1967 में चुनाव हुए और पहली बार बिहार में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महामाया प्रसाद मुख्यमंत्री बने और एक साल का भी सफर पूरा नहीं कर सके और सरकार 28 जनवरी 1968 को गिर गई. इसके बाद सोशलिस्ट पार्टी के सतीश प्रसाद सिंह कुशवाहा और बीपी मंडल मुख्यमंत्री रहे, लेकिन वो भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके.
साल 1968 में बिहार का सियासी समीकरण ऐसा बना कि कांग्रेस ने सरकार बनाई. सत्ता की कमान दलित नेता भोला पासवान शास्त्री को सौंपी. 22 मार्च 1968 को भोला पासवान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन 29 जून 1968 को उनकी सरकार गिर गई. इस तरह भोला पासवान महज 100 दिन सत्ता में रहे. करीब पांच महीने के बाद विधानसभा चुनाव हुए कांग्रेस फिर सरकार बनाने में कामयाब रही. 1969 में कांग्रेस ने हरिहर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन इस बार भी सरकार नहीं चल सकी और गिर गई. एक बार फिर कांग्रेस ने भोला पासवान को सीएम बनाया, लेकिन 13 दिन के बाद उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा.
1970 में कांग्रेस ने वामपंथी दलों के जरिए सरकार बनाने की कवायद की और इस बार दरोगा प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल भी सफल नहीं रहा और उन्हें एक साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ गया. इसके बाद कांग्रेस ने भोला पासवान शास्त्री के नेतृत्व में 1971 में एक बार फिर सरकार बनाई. तीसरी बार भोला पासवान बिहार के मुख्यमंत्री बने, इस बार वो 222 दिनों तक सत्ता में बने रहे.
साल 1972 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए कांग्रेस 167 सीटें जीतकर सत्ता में आई. कांग्रेस के केदार पांडेय मुख्यमंत्री बने, लेकिन उन्हें भी जुलाई,1973 में कुर्सी छोड़नी पड़ गई. इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पौने दो साल के बाद 1975 में ऐसे परिस्थिति खड़ी हो गई कि उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ गया. इसके बाद डॉ. जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस से मुख्यमंत्री बने. यह आपातकाल का दौर था. वो 1975 में मुख्यमंत्री बने थे और 1977 तक रहे. इसके बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई.
हालांकि, कांग्रेस की सत्ता में तीन साल के बाद 1980 में एक बार फिर वापसी हुई. कांग्रेस 169 सीटों के साथ जीतकर आई और मुख्यमंत्री का ताज डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के सिर सजा. इस बार मिश्रा बहुत लंबी पारी नहीं खेल सके और उन्हें करीब 3 साल दो महीने के बाद इस्तीफा देना पड़ा. कांग्रेस ने उनकी जगह 14 अगस्त, 1983 को चंद्रशेखर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन उन्होंने भी करीब पौने दो साल तक सत्ता की कमान संभाली.
इसके बाद 1985 में विधानसभा चुनाव हुए. इस चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल की और 196 सीटों के साथ सत्ता में आई. कांग्रेस ने पांच साल में चार मुख्यमंत्री बदले. 1985 में पहले बिंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री बने, जिन्हें तीन साल पूरे होने से कुछ दिनों पहले ही इस्तीफा देना पड़ गया. इसके बाद भगवत आजाद झा मुख्यमंत्री बने, लेकिन वो भी 1 साल 24 दिन ही सत्ता में रह सके. भगवत झा के बाद सत्येंद्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बने, लेकिन 9 महीने के बाद उन्हें भी कुर्सी छोड़नी पड़ गई. ऐसे में कांग्रेस ने 6 दिसंबर 1989 को जगन्नाथ मिश्रा को एक फिर सत्ता की कमान सौंपी, वो इस बार महज 94 दिन तक सत्ता में रहे. उनके नेतृत्व में 1990 में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस ऐसा हारी कि दोबारा आजतक सत्ता में नहीं सकी. कांग्रेस पिछले तीन दशक से बिहार में सत्ता का वनवास झेल रही है.