बिहार की सियासत में कांग्रेस के दिग्गज नेता सदानंद सिंह चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगे. उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे शुभानंद मुकेश को सौंप दिया है. कांग्रेस ने सदानंद सिंह की परंपरागत सीट कहलगांव से इस बार उनके बेटे शुभानंद मुकेश को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है. इस तरह से सदानंद सिंह ने चुनावी राजनीति से विश्राम ले लिया है.
सदानंद सिंह कांग्रेस के ऐसे दिग्गज नेता हैं, जो बिहार में 9 बार विधायक रहे हैं. प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री से लेकर प्रतिपक्ष के नेता की कुर्सी तक पर काबिज रह चुके हैं. 2015 के चुनाव में ही सदानंद सिंह ने कह दिया था कि यह उनका आखिरी चुनाव है. ऐसे में उन्होंने अपने वादे पर अमल करते हुए उन्होंने खुद को चुनावी मैदान से अलग कर लिया है और बेटे को आगे कर दिया है.
सदानंद सिंह का लंबा राजनीतिक सफर रहा है. बिहार में कांग्रेस का इस उम्र का कोई भी नेता नहीं बचा है. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव देखे, लेकिन कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा. सदानंद सिंह साल 1969 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे. हालांकि, 1985 में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया, जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था. 1977 में जनता पार्टी की लहर में भी सदानंद सिंह ने कहलगांव सीट से जीत दर्ज की थी.
सदानंद सिंह को 1990 और 1995 के चुनाव में जनता दल और 2005 में जेडीयू प्रत्याशी के सामने हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन साल 2000 में कांग्रेस की एक बार फिर यहां पर वापसी होती है. कांग्रेस के सदानंद सिंह ने 2000 और 2005 के चुनाव में जीत हासिल की. वह 9 मार्च 2000 से 28 जून 2005 तक विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे.
सदानंद सिंह 1990 से 93 तक जिला कांग्रेस कमेटी, भागलपुर के अध्यक्ष रह चुके हैं. वह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष से लेकर अध्यक्ष तक रहे हैं. वो बिहार में 10 साल से कांग्रेस के विधायक दल के नेता हैं. सदानंद सिंह बिहार सरकार में सिंचाई और ऊर्जा राज्यमंत्री रह चुके हैं. सदानंद सिंह 12 बार विधानसभा चुनाव लड़े और 9 बार जीत दर्ज की है. एक बार कांग्रेस के टिकट पर भागलपुर लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. सदानंद सिंह की पहचान बिहार में कांग्रेस के जमीनी नेता के तौर पर होती है.
बिहार में कांग्रेस के भीष्मपितामह कहे जाने वाले सदानंद सिंह ने इस बार का चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है. ऐसे में कांग्रेस ने उनके बेटे शुभानंद मुकेश को मैदान में उतारा है, जिनके सामने अपने पिता की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी है. ऐसे में शुभानंद कहते हैं कि पिता ने चुनावी विश्राम लिया है राजनीति से नहीं.