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दलितों पर नीतीश कुमार का वो दांव जिसने समेट दी एलजेपी की राजनीति

बिहार में 16 फीसदी दलित मतदाता काफी अहम माना जाता है. रामविलास पासवान इन्हीं दलितों के सहारे एलजेपी की राजनीति खड़ी करना चाहते थे, लेकिन नीतीश कुमार ने 15 साल पहले सत्ता में आते ही महादलित का ऐसा दांव चला कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की राजनीति ही सिमट गई और अभी तक पार्टी उससे बाहर नहीं निकल सकी है. 

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चिराग पासवान और रामविलास पासवान
चिराग पासवान और रामविलास पासवान
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार में 16 फीसदी दलित मतदाता किंगमेकर
  • नीतीश ने 2005 में चला था महादलित का दांव
  • महादलित के फॉर्मूले से एलजेपी को झटका

बिहार चुनाव में पहले दौर का प्रचार खत्म होने में एक हफ्ते से भी कम का समय बचा है. अक्टूबर की शुरुआत में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन से सीधा मुकाबला माना जा रहा था लेकिन एनडीए की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने नीतीश के नेतृत्व के खिलाफ ऐसी बगावत की कि नीतीश तेजस्वी के अलावा चिराग पासवान के भी निशाने पर हैं. पासवान के नीतीश के खिलाफ ताल ठोकने की एक वजह नीतीश का 15 साल पुराना वो दांव भी है जिसने बिहार में उनकी पार्टी की राजनीति को हाशिए पर धकेल दिया था.

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बिहार चुनाव में भले ही मंच से विकास और रोजगार की बातें उठाई जा रही हों, लेकिन जमीन पर राजनीतिक दल जातिगत समीकरण बैठाने में ही जुटे हैं. बिहार में 16 फीसदी दलित मतदाता है. चिराग के पिता रामविलास पासवान इन्हीं दलितों के सहारे एलजेपी की राजनीति खड़ी करना चाहते थे, लेकिन नीतीश कुमार ने 15 साल पहले सत्ता में आते ही महादलित का ऐसा दांव चला कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की राजनीति सिमट गई और अभी तक पार्टी उससे बाहर नहीं निकल सकी है. 

नीतीश का बिहार में महादलित दांव

बता दें कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की तर्ज पर बिहार में भी दलित सियासत को स्थापित करने के लिए रामविलास पासवान ने जेडीयू से अलग होकर साल 2000 में एलजेपी का गठन किया था. फरवरी 2005 के चुनाव में पासवान बिहार में किंगमेकर बनकर उभरे, लेकिन उन्होंने किसी को भी अपना समर्थन नहीं दिया. इसके चलते बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा और छह महीने के बाद दोबारा विधानसभा चुनाव हुए, जिनमें नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. 

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बिहार में दलित समुदाय 1990-2000 तक लालू प्रसाद यादव के साथ था, और बाद में पासवान की एलजेपी के संग हो लिया. नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता में आते ही सबसे पहले महादलित योजना का सूत्रपात किया. नीतीश ने पासवान जाति को छोड़कर दलित मानी जाने वाली अन्य 21 उपजातियों के लिए 'महादलित' कैटगरी बनाकर उन्हें कई सहूलियतें दीं. महादलित जातियों के कल्याण के लिए एक आयोग का गठन भी किया गया.

महादलितों को मिलने वाली सुविधाएं

महादलित समुदाय से आने वाले को 3 डिसमिल लगभग 1300 वर्ग फीट जमीन की व्यवस्था, हर महादलित परिवार को रेडियो देना. इंदिरा आवास के लिए निर्धारित राशि में महादलित परिवारों के घर यदि पूरी तरह नहीं बन पाएंगे तो उनके लिए अलग से 15 हजार रुपये की व्यवस्था जैसी तमाम सुविधाएं दी गई.

नीतीश के लिए महादलित का दांव मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ इससे बिहार के दलितों की सियासी निष्ठा बदल गई. महादलित नीतीश के साथ हो गए और दुसाध समुदाय पासवान के वफादार रहे. इसका नतीजा यह हुआ कि 2009 के लोकसभा चुनाव में रामविलास हाशिए पर चले गए थे. पासवान खुद अपनी परंपरागत सीट हाजीपुर से चुनाव हार थे. 

महादलित बहुल जिले और समीकरण

बिहार में ऐसे 7 जिले हैं (लगभग 40 सीटें) जहां महादलितों की आबादी 10% से ज्यादा है. ये जिले हैं गया (19%), नवादा (17.5%), जहानाबाद (17.3%), कैमूर (14.8%), औरंगाबाद (12.3%), मधेपुरा (10.6%) और जमुई (11.2%). 2015 में आरजेडी ने सबसे ज्यादा 14 दलित सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि, जेडीयू को 10, कांग्रेस को 5, बीजेपी को 5 और बाकी चार सीटें अन्य को मिली थी. इसमें 13 सीटें रविदास समुदाय के नेता जीते थे जबकि 11 पर पासवान समुदाय से आने वाले नेताओं ने कब्जा जमाया था. 

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महादलित के फॉर्मूले से एलजेपी को झटका

महादलित श्रेणी के बनने से एलजेपी के वोट शेयर में सेंध लगी. 2005 में उसे 11.1 फीसदी वोट मिले थे (इस चुनाव को वो अकेले लड़ी थी) जोकि 2010 में गिरकर 6.7 फीसदी हो गए (जब उसने आरजेडी से गठबंधन किया) और 2015 में इसमें और गिरावट आई थी और यह 5 फीसदी ही रह गए. (बीजेपी के साथ गठबंधन). इसके बाद 2017 में बिहार के राजनीतिक समीकरण बदले और नीतीश कुमार ने दोबारा एनडीए में वापसी की. इस दौरान उन्होंने पासवान समुदाय को भी महादलित का दर्जा देकर सभी 22 दलित समुदाय को महादलित बना दिया. 

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं, बिहार में रामविलास पासवान की गिनती शुरू में एक दलित नेता के तौर पर होने लगी थी, लेकिन धीरे-धीरे वो सिर्फ दुसाधों के सबसे बड़े नेता बनकर रह गए. इसके लिए उन्होंने कोई बहुत मेहनत नहीं की, कोई आंदोलन जैसा नहीं किया, मगर दुसाधों के वो पहले बड़े नेता थे और ये उनके लिए मददगार साबित हुआ, मंत्री बनने के साथ-साथ उनकी राजनीतिक हैसियत भी बड़ी होती गई और ये वोट बैंक मजबूत होता गया, लेकिन दलित समाज के नेता के तौर पर अपनी जगह बिहार में नहीं बना सके. 

2018 में दुसाध समुदाय को नीतीश ने महादलित में शामिल किया था. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस फैसले को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश पर आरोप लगाते हुए कहा था, 'जब मैं उपमुख्यमंत्री था तो चंपारण के एक कार्यक्रम में शामिल होने नीतीश कुमार के साथ गया था. इस दौरान हेलिकॉप्टर में दलित-महादलित का मुद्दा छिड़ने पर नीतीश जी ने मुझसे कहा कि पासवान जी दलित नेता बनने की कोशिश कर रहे थे और तब उन्हें केवल उनकी जाति तक सीमित रखने के लिए उन्होंने महादलित वर्ग का गठन किया था.' 

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बिहार में 22 अलग-अलग जातियों के महादलित हैं, जो कुल मतदाताओं के लगभग 16 प्रतिशत हैं. इनमें से महज 4 फीसदी के करीब दुसाध समुदाय है. ये परंपरागत तौर पर एलजेपी का वोट बैंक माना जाता है. चिराग इसी के सहारे बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को मात देने की कवायद में हैं. 

नीतीश का साथ देगा महादलित
वरिष्ठ पत्रकार संजीव चंदन कहते हैं कि महादलित का मुद्दा 2010 के चुनाव में तो चला और नीतीश को इसका फायदा मिला, लेकिन 2015 में काम नहीं आया, उस चुनाव में यदि वो लालू यादव के साथ नहीं जाते तो उनकी सरकार नहीं बच पाती. महादलित के दांव से एलजेपी की राजनीति भले ही सिमटी है, लेकिन उसका जमीनी स्तर पर महादलितों को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ है. इसीलिए इस बार के चुनाव में पासवान की पार्टी के अलग चुनावी मैदान में उतरकर उस वोट बैंक को वापस हासिल करना चाहती है जो उसके पास से खिसक रहा है. वह महादलितों के बीच अपने आधार को मजबूत करना चाहती है.


 

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