बिहार की सियासत में हर रोज एक राजनीतिक समीकरण बन रहा है. हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी ने दो सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुद को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जोड़ लिया है. मांझी को यह ऐलान किए हुए एक महीना होने जा रहा है, लेकिन अभी तक बीजेपी उन्हें एनडीए के सहयोगी के तौर पर स्वीकार नहीं कर सकी है. यही वजह है कि एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी के बीच ही सहमति बनाई जा रही है
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और बिहार के प्रभारी भूपेंद्र यादव ने बुधवार को एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर सहयोगी दलों की जिक्र किया तो तीन ही दलों का नाम लिया. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी तीनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे. जीतन राम मांझी की पार्टी ने भी जेडीयू को समर्थन दिया है. इससे साफ जाहिर है कि जीतनराम मांझी एनडीए के साथ नहीं बल्कि जेडीयू के सारथी के तौर पर शामिल हैं.
बता दें कि जीतनराम मांझी ने दो सितंबर को एनडीए में शामिल होने की जब घोषणा थी, तो उस समय न जेडीयू और न ही बीजेपी का ही कोई नेता उनके स्वागत के लिए मंच पर मौजूद था. हालांकि, उन्होंने उससे दो दिन पहले नीतीश कुमार से जरूर मुलाकात की थी और प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी कहा था कि वे जेडीयू के साथ मिल-जुलकर चुनाव लड़ेंगे. मांझी ने एनडीए के बजाय नीतीश के साथ हाथ मिलाया है. ऐसे में जेडीयू उन्हें अपने कोटे से ही सीट देगी.
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह कहते हैं कि एनडीए की ओर से जीतनराम मांझी को लेकर कोई बयान नहीं आया है. मांझी ने खुद ही से नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ गठबंधन करने की बात कही थी. जेडीयू और बीजेपी की ओर से किसी ने भी मांझी को एनडीए के पार्टनर के तौर पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है. इससे एनडीए में उनकी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि जीतन राम मांझी की जो राजनीतिक महत्वाकांक्षा है वो बढ़ गई है, लेकिन उस हिसाब से बिहार में उनका जनाधार नहीं बढ़ा है. 2015 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में यह साफ दिखाई दिया था. मांझी जिन भी दलों के साथ रहे हैं वो उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर सके हैं. 2015 में बीजेपी के साथ रहे हों या फिर 2019 में महागठबंधन के साथ, लेकिन मांझी अपने समुदाय का वोट अपने सहयोगी दलों को ट्रांसफर नहीं करा सके हैं. इसी वजह से मांझी को लेकर उनका मोहभंग हुआ है. इसीलिए अब जब वो महागठबंधन से नाता तोड़कर आए हैं तो बीजेपी उन्हें कोई खास अहमियत नहीं दे रही है.
दरअसल, जीतनराम मांझी महादलितों में जिस मुसहर जाति से आते हैं, बिहार में वो चार फीसदी के करीब है. मांझी अपने समुदाय का भी वोट अपने समर्थन वाली पार्टियों को नहीं दिला पाए. इसी वजह से तेजस्वी ने इन्हें छोड़ने का मन बना लिया था. वहीं, हाल में जेडीयू के कई दलित नेताओं ने भी नीतीश कुमार का साथ छोड़कर अलग हुए हैं. एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान लगातार नीतीश सरकार पर हमलावर हैं. ऐसे में मांझी और नीतीश दोनों को ही एक-दूसरे की जरूरत थी. ऐसे में मांझी जेडीयू के साथ जुड़कर खुद को एनडीए का हिस्सा मान रहे हैं.
माना जा रहा है कि बीजेपी के साथ नहीं जाने की एक वजह यह रही है कि जीतनराम मांझी ने अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा में सेक्युलर शब्द जोड़ लिया था. वहीं, बीजेपी उनकी राजनीतिक ताकत को माप चुकी है, जिसके चलते अब उन्हें खास तवज्जो नहीं दे रही है. मांझी एनडीए में सीटों को लेकर सौदेबाजी करने की हैसियत में नहीं हैं. वो जेडीयू के साथ मिले हैं. ऐसे में उन्हें बीजेपी के बजाय जेडीयू कोटे से मिलने वाली सीटों से उन्हें संतोष करना पड़ेगा.