राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए तमाम सियासी पार्टियों के साथ सारे गिले शिकवे भुलाकर महागठबंधन की बुनियाद रखी थी. लालू इसी महागठबंधन के दम पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को बिहार की सियासी रणभूमि में मात देने में सफल रहे थे. बिहार में वापसी के साथ ही लालू यादव ने बड़ी हसरत से अपने छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपी थी.
लालू यादव के राजनीतिक सपने को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी तेजस्वी यादव के कंधों पर है, लेकिन लालू की अनुपस्थिति में महागठबंधन ताश के पत्तों की तरह बिखरता जा रहा है. पिछले तीन सालों में महागठबंधन में शामिल एक के बाद एक पार्टियां तेजस्वी यादव का साथ छोड़ती जा रही हैं. हालत यह हो गई है कि अब कांग्रेस भी आरजेडी से नाराज दिखाई दे रही है. सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और आरजेडी के बीच दरार पड़ती नजर आ रही है.
बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए एकजुट नजर आ रहा है. हालांकि, एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान सीट शेयरिंग को लेकर नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, लेकिन बीजेपी उन्हें साधने की कवायद में लगी हुई है. वहीं, दूसरी ओर महागठबंधन में शामिल दल तेजस्वी यादव से अपना दामन लगातार छुड़ाते जा रहे हैं. हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के मुखिया जीतन राम मांझी और आरएलएसपी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा महागठबंधन का साथ छोड़ चुके हैं.
बता दें कि बिहार की सियासत में 10 साल तक सरकार से बाहर रहने के बाद लालू यादव ने 2015 में उसी नीतीश कुमार से हाथ मिलाया था, जिन्होंने 2005 में उन्हें सत्ता से देखल किया था. लालू ने नीतीश की जेडीयू और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन की नींव रखी थी. बिहार के चुनावी रण में यह फॉर्मूला कामयाब भी रहा, जिसके बाद सत्ता की कमान नीतीश को मिली और डिप्टी सीएम की कुर्सी पर तेजस्वी विराजमान हुए. महागठबंधन के साथ नीतीश कुमार बहुत ज्यादा दिन नहीं रुक सके और आरजेडी के साथ गठबंधन तोड़कर एनडीए के साथ वापसी कर गए.
नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद लालू यादव ने HAM के जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को साथ मिलाया. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव के साथ इन दोनों नेताओं की नहीं पटी और उन्होंने सीट शेयरिंग फॉर्मूले को लेकर साथ छोड़ दिया. जीतनराम मांझी महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश कुमार से जाकर मिल गए और एनडीए के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे. वहीं, उपेंद्र कुशवाहा ने भी मंगलवार को महागठबंधन से नाता तोड़कर बीएसपी के साथ गठबंधन कर लिया है.
महागठबंधन में फिलहाल आरजेडी, कांग्रेस और वीआईपी पार्टी बची हैं. वीआईपी ने भी तेजस्वी यादव को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है और हाल ही में कांग्रेस नेता अहमद पटेल से मुलाकात की थी. इसके बाद काफी समय से एक दूसरे के साथी रहे कांग्रेस और आरजेडी का गठबंधन टूटता हुआ नजर आ रहा है. तेजस्वी यादव के साथ सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस की सहमति नहीं बन रही है. कांग्रेस को मन मुताबिक सीटें नहीं मिल रही हैं, जिसके चलते मामला फंस गया है. ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने बिहार के नेताओं को वार्ता के लिए दिल्ली बुलाया है. ऐसे में अगर कांग्रेस भी महागठबंधन से अलग होने का फैसला करती है तो सिर्फ आरजेडी ही अकेले बचेगी.
बता दें कि सीटों को लेकर महागठबंधन में एक नतीजे तक पहुंचने का सफर कठिन होता जा रहा है. ऐसे में एक एक कर साथी भी छूटते जा रहे हैं. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भी महागठबंधन में सीट बंटवारे में देरी हुई थी. कांग्रेस ने इससे सीख लेते हुए कहा था कि विधानसभा चुनाव के समय देरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन पहले चरण के नामांकन गुरुवार से शुरू हो रहे हैं. इसके बावजूद सीट शेयरिंग को लेकर अभी तक सहमति नहीं बन सकी है. ऐसे में सवाल है कि लालू ने जिस महागठबंधन को बनाया था, तेजस्वी की अगुवाई में वो बिखरता जा रहा है.