एक वक्त था आजादी के बाद का, जब बिहार में कांग्रेस पार्टी की तूती बोलती थी. लेकिन बदलते वक्त के साथ यहां क्षेत्रीय पार्टियों का प्रभाव बढ़ा. अब बिहार की लोकल पार्टियां केंद्र सरकार के गठन में निर्णायक की भूमिका में रहने लगीं. हाल के कुछ वर्षों दूसरे राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियों ने बिहार में जड़ें जमाने की कोशिश की, लेकिन बिहार के मतदाता चुनाव दर चुनाव लोकल पार्टियों पर वोकल हो रहे हैं.
राष्ट्रीय दलों के प्रदर्शन में भी सुधार है. लेकिन जनता का ज्यादा रूझान बिहार की लोकल पार्टियों की तरफ ही ज्यादा है. आइए देखते हैं पिछले दो विधानसभा चुनावों में पार्टियों के लेवल और ओरिजन के आधार पर क्या रहा मतदाताओं का रूख.
राष्ट्रीय दल बनाम राज्य स्तरीय पार्टियां
वर्ष 2010 और 2015 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों का वोट शेयर बढ़ा है. हालांकि फिर भी बिहार के राज्य स्तरीय पार्टियों की तुलना में राष्ट्रीय दल पीछे हैं. 2010 के चुनाव में राज्यस्तरीय दलों को 48.16 फीसद और राष्ट्रीय दलों को 32.29 फीसद मत मिले थे. इसके बाद 2015 में राज्यस्तरीय पार्टियों का वोट शेयर कमी के साथ 42.58 फीसद और राष्ट्रीय दलों का शेयर बढ़कर 35.60 फीसद हो गया. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों को प्रदर्शन बेहतर तो हुआ लेकिन राज्य स्तर की पार्टियों ने ज्यादा वोट खींचा.
बाहरी दलों को ज्यादा रिस्पॉन्स नहीं
पिछले दो चुनावों में दूसरे राज्यों की नौ राज्यस्तरीय पार्टियों ने बिहार में जगह बनाने की कोशिश की है. 2010 के चुनाव में दूसरे राज्यों की पार्टियों को 2.44 फीसदी मत मिले जबकि 2015 में मत प्रतिशत 2.13 फीसदी हो गया. एक वक्त था कि उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी यहां सीटें जीती थीं. लेकिन अब इन पार्टियों के साथ शिवसेना, एआईएमआईएम जैसी पार्टियां जगह बनाने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं.
चमकीं राज्य स्तरीय छोटी पार्टियां
बिहार में पंजीकृत राज्य स्तरीय छोटी पार्टियों की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है. पिछले दो चुनावों में इनका प्रदर्शन भी ध्यान आकर्षित करने वाला है. 2010 में कुल 72 छोटे दलों ने चुनाव में भाग लिया और 3.89 फीसद मत हासिल किया. 2015 में ऐसे दलों की संख्या 138 हो गई जिन्होंने 7.82 फीसद मत हासिल किया. इस तरह से छोटी पार्टियों के पक्ष में बीते चुनाव में करीब चार फीसदी मत बढ़ गए थे.
अब निराश हो रहे हैं निर्दल
पिछले कुछ चुनावों में वोटर्स का निर्दल प्रत्याशियों से मोहभंग नजर आ रहा है. यही वजह है कि न सिर्फ जीत हासिल करने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या कम हुई है बल्कि उनका वोट शेयर भी घटा है. 2010 में निर्दलीय के तौर पर 1342 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे थे. इन्हें 13.22 फीसद वोट मिले. 2015 में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या घट कर 1150 हुई और वोट शेयर भी घटकर 9.39 फीसद रह गया.
पिछले दो चुनावों में कुल वैध मतों में शेयरिंग
(कटेगरी) (वर्ष 2010) (वर्ष 2015)
राष्ट्रीय दल 32.29% 35.60%
राज्य स्तरीय दल 48.16% 42.58%
पंजीकृत छोटे दल 03.89% 07.82%
दूसरे राज्यों के दल 02.44% 02.13%
निर्दल उम्मीदवार 13.22% 09.23%